महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1591, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यद्रवन्त रणे भीता विकीर्णायुधकेतनाः ॥ ८६ ॥ उस महिषासुरको आते देख इन्द्र आदि सब देवता भयभीत हो अपने अस्त्र-शस्त्र और ध्वजा फेंककर युद्धभूमिसे भागने लगे ॥ ८६ ॥ ततः स महिषः क्रुद्धस्तूर्णं रुद्ररथं ययौ । अभिद्रुत्य च जग्राह रुद्रस्य रथकूबरम् ॥ ८७ ॥ तब क्रोधमें भरा हुआ महिषासुर तुरंत ही भगवान् रुद्रके रथकी ओर दौड़ा और पास जाकर उनके रथका कूबर* पकड़ लिया ॥ ८७ ॥ यदा रुद्ररथं क्रुद्धो महिषः सहसा गतः । रेसतू रोदसी गाढं मुमुहुश्च महर्षयः ॥ ८८ ॥ जब क्रोधमें भरे हुए महिषासुरने सहसा भगवान् रुद्रके रथपर आक्रमण किया, उस समय पृथ्वी और आकाशमें भारी कोलाहल मच गया और महर्षिगण भी घबरा गये ॥ ८८ ॥ अनदंश्च महाकाया दैत्या जलधरोपमाः । आसीच्च निश्चितं तेषां जितमस्माभिरित्युत ॥ ८९ ॥ इधर विशालकाय दैत्य मेघोंके समान गम्भीर गर्जना करने लगे। उन्हें यह निश्चय हो गया कि 'हमारी जीत होगी' ॥ ८९ ॥ तथाभूते तु भगवान् नावधीन्महिषं रणे । सस्मार च तदा स्कन्दं मृत्युं तस्य दुरात्मनः ॥ ९० ॥ उस अवस्थामें भी भगवान् रुद्रने युद्धमें महिषासुरको स्वयं नहीं मारा किंतु उस दुरात्मा दानवकी मृत्यु जिनके हाथोंसे होनेवाली थी, उन कुमार कार्तिकेयका स्मरण किया ॥ ९० ॥ महिषोऽपि रथं दृष्ट्वा रौद्रो रुद्रस्य चानदत् । देवान् संत्रासयंश्चापि दैत्यांश्चापि प्रहर्षयन् ॥ ९१ ॥ भयानक महिषासुर रुद्रके रथको देखकर देवताओंको त्रास और दैत्योंको हर्ष प्रदान करता हुआ बार-बार सिंहनाद करने लगा ॥ ९१ ॥ ततस्तस्मिन् भये घोरे देवानां समुपस्थिते । आजगाम महासेनः क्रोधात् सूर्य इव ज्वलन् ॥ ९२ ॥ देवताओंके लिये वह घोर भयका अवसर उपस्थित था। इसी समय जगमगाते हुए सूर्यकी भाँति कुमार महासेन क्रोधमें भरे हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ ९२ ॥