महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
व्यद्रवन्त रणे भीता विकीर्णायुधकेतनाः ॥ ८६ ॥ उस महिषासुरको आते देख इन्द्र आदि सब देवता भयभीत हो अपने अस्त्र-शस्त्र और ध्वजा फेंककर युद्धभूमिसे भागने लगे ॥ ८६ ॥ ततः स महिषः क्रुद्धस्तूर्णं रुद्ररथं ययौ । अभिद्रुत्य च जग्राह रुद्रस्य रथकूबरम् ॥ ८७ ॥ तब क्रोधमें भरा हुआ महिषासुर तुरंत ही भगवान् रुद्रके रथकी ओर दौड़ा और पास जाकर उनके रथका कूबर* पकड़ लिया ॥ ८७ ॥ यदा रुद्ररथं क्रुद्धो महिषः सहसा गतः । रेसतू रोदसी गाढं मुमुहुश्च महर्षयः ॥ ८८ ॥ जब क्रोधमें भरे हुए महिषासुरने सहसा भगवान् रुद्रके रथपर आक्रमण किया, उस समय पृथ्वी और आकाशमें भारी कोलाहल मच गया और महर्षिगण भी घबरा गये ॥ ८८ ॥ अनदंश्च महाकाया दैत्या जलधरोपमाः । आसीच्च निश्चितं तेषां जितमस्माभिरित्युत ॥ ८९ ॥ इधर विशालकाय दैत्य मेघोंके समान गम्भीर गर्जना करने लगे। उन्हें यह निश्चय हो गया कि 'हमारी जीत होगी' ॥ ८९ ॥ तथाभूते तु भगवान् नावधीन्महिषं रणे । सस्मार च तदा स्कन्दं मृत्युं तस्य दुरात्मनः ॥ ९० ॥ उस अवस्थामें भी भगवान् रुद्रने युद्धमें महिषासुरको स्वयं नहीं मारा किंतु उस दुरात्मा दानवकी मृत्यु जिनके हाथोंसे होनेवाली थी, उन कुमार कार्तिकेयका स्मरण किया ॥ ९० ॥ महिषोऽपि रथं दृष्ट्वा रौद्रो रुद्रस्य चानदत् । देवान् संत्रासयंश्चापि दैत्यांश्चापि प्रहर्षयन् ॥ ९१ ॥ भयानक महिषासुर रुद्रके रथको देखकर देवताओंको त्रास और दैत्योंको हर्ष प्रदान करता हुआ बार-बार सिंहनाद करने लगा ॥ ९१ ॥ ततस्तस्मिन् भये घोरे देवानां समुपस्थिते । आजगाम महासेनः क्रोधात् सूर्य इव ज्वलन् ॥ ९२ ॥ देवताओंके लिये वह घोर भयका अवसर उपस्थित था। इसी समय जगमगाते हुए सूर्यकी भाँति कुमार महासेन क्रोधमें भरे हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ ९२ ॥
लोहिताम्बरसंवीतो लोहितस्रग्विभूषणः । लोहिताश्वो महाबाहुर्हिरण्यकवचः प्रभुः ॥ ९३ ॥ उन्होंने अपने शरीरको लाल वस्त्रोंसे आच्छादित कर रखा था। उनके हार और आभूषण भी लाल रंगके ही थे। उनके घोड़ेका रंग भी लाल था। उन महाबाहु भगवान् स्कन्दने सुवर्णमय कवच धारण किया था ॥ ९३ ॥
रथमादित्यसंकाशमास्थितः कनकप्रभम् । तं दृष्ट्वा दैत्यसेना सा व्यद्रवत् सहसा रणे ॥ ९४ ॥ वे सूर्यके समान तेजस्वी रथपर विराजमान थे। उनकी अंगकान्ति भी सुवर्णके समान ही उद्भासित हो रही थी। उन्हें सहसा संग्राममें उपस्थित देख दैत्योंकी सेना रणभूमिसे भाग चली ॥ ९४ ॥
स चापि तां प्रज्वलितां महिषस्य विदारिणीम् । मुमोच शक्तिं राजेन्द्र महासेनो महाबलः ॥ ९५ ॥ राजेन्द्र! महाबली महासेनने महिषासुरपर एक प्रज्वलित शक्ति चलायी, जो उसके शरीरको विदीर्ण करनेवाली थी ॥ ९५ ॥
सा मुक्ताभ्यहरत् तस्य महिषस्य शिरो महत् । पपात भिन्ने शिरसि महिषस्त्यक्तजीवितः ॥ ९६ ॥
कुमारके हाथसे छूटते ही उस शक्तिने महिषासुरके महान् मस्तकको काट गिराया। सिर कट जानेपर महिषासुर प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ९६ ॥ पतता शिरसा तेन द्वारं षोडशयोजनम् । पर्वताभेन पिहितं तदागम्यं ततोऽभवत् ॥ ९७ ॥ उसके पर्वत-सदृश विशाल मस्तकने गिरकर (उत्तर-पूर्व देशके) सोलह योजन लम्बे द्वारको बंद कर दिया। अतः वह देश सर्वसाधारणके लिये अगम्य हो गया ॥ ९७ ॥ उत्तराः कुरवस्तेन गच्छन्त्यद्य यथासुखम् । क्षिप्ताक्षिप्ता तु सा शक्तिर्हत्वा शत्रून् सहस्रशः ॥ ९८ ॥ स्कन्दहस्तमनुप्राप्ता दृश्यते देवदानवैः । उत्तर कुरुके निवासी अब उस मार्गसे सुखपूर्वक आते-जाते हैं। देवताओं और दानवोंने देखा, कुमार कार्तिकेय बार-बार शत्रुओंपर शक्तिका प्रहार करते हैं और वह सहस्रों योद्धाओंको मारकर पुनः उनके हाथमें लौट आती है ॥ ९८ १/२ ॥ प्रायः शरैर्विनिहता महासेनेन धीमता ॥ ९९ ॥ शेषा दैत्यगणा घोरा भीतास्त्रस्ता दुरासदैः । स्कन्दपारिषदैर्हत्वा भक्षिताश्च सहस्रशः ॥ १०० ॥ परम बुद्धिमान् महासेनने अपने बाणोंद्वारा अधिकांश दैत्योंको समाप्त कर दिया, बचे-खुचे भयंकर दैत्य भी भयभीत हो साहस खो चुके थे। स्कन्ददेवके दुर्धर्ष पार्षद उन सहस्रों दैत्योंको मारकर खा गये ॥ ९९-१०० ॥ दानवान् भक्षयन्तस्ते प्रपिबन्तश्च शोणितम् । क्षणान्निर्दानवं सर्वमकार्षुर्भृशहर्षिताः ॥ १०१ ॥ उन सबने अत्यन्त हर्षमें भरकर दानवोंको खाते और उनके रक्त पीते हुए क्षणभरमें सारी रणभूमिको दानवोंसे खाली कर दिया ॥ १०१ ॥ तमांसीव यथा सूर्यो वृक्षानग्निर्घनान् खगः । तथा स्कन्दोऽजयच्छत्रून् स्वेन वीर्येण कीर्तिमान् ॥ १०२ ॥ जैसे सूर्य अन्धकार मिटा देते हैं, आग वृक्षोंको जला डालती है और आकाशचारी वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, वैसे ही कीर्तिशाली कुमार कार्तिकेयने अपने पराक्रमद्वारा समस्त शत्रुओंको नष्ट करके उनपर विजय पायी ॥ १०२ ॥ सम्पूज्यमानस्त्रिदशैरभिवाद्य महेश्वरम् । शुशुभे कृत्तिकापुत्रः प्रकीर्णार्चिरिवांशुमान् ॥ १०३ ॥ उस समय देवतालोग कृत्तिकानन्दन स्कन्ददेवकी स्तुति और पूजा करने लगे। कुमार स्कन्द अपने पिता महेश्वरको प्रणाम करके सब ओर किरणें बिखेरनेवाले अंशुमाली सूर्यकी भाँति शोभा पाने लगे ॥ १०३ ॥ नष्टशत्रुर्यदा स्कन्दः प्रयातस्तु महेश्वरम् ।
तदाब्रवीन्महासेनं परिष्वज्य पुरंदरः ॥ १०४ ॥ शत्रुओंका नाश करके जब कुमार कार्तिकेय भगवान् महेश्वरके पास पहुँचे, उस समय इन्द्रने उनको हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा— ॥ १०४ ॥
ब्रह्मदत्तवरः स्कन्द त्वयायं महिषो हतः । देवास्तृणसमा यस्य बभूवुर्जयतां वर ॥ १०५ ॥ सोऽयं त्वया महाबाहो शमितो देवकण्टकः । शतं महिषतुल्यानां दानवानां त्वया रणे ॥ १०६ ॥ निहतं देवशत्रूणां यैर्वयं पूर्वतापिताः । तावकैर्भक्षिताश्चान्ये दानवाः शतसङ्घशः ॥ १०७ ॥ ‘विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ स्कन्द! इस महिषासुरको ब्रह्माजीने वरदान दिया था, जिसके कारण इसके सामने सब देवता तिनकोंके समान हो गये थे। आज तुमने इसे मार गिराया है। महाबाहो! यह देवताओंके लिये बड़ा भारी काँटा था, जिसे तुमने निकाल फेंका है। यही नहीं, आज रणभूमिमें इस महिषके समान पराक्रमी एक सौ देवद्रोही दानव और तुम्हारे हाथसे मारे गये हैं, जो पहले हमें बहुत कष्ट दे चुके हैं। तुम्हारे पार्षद भी सैकड़ों दानवोंको खा गये हैं ॥ १०५—१०७ ॥
अजेयस्त्वं रणेऽरीणामुमापतिरिव प्रभुः । एतत् ते प्रथमं देव ख्यातं कर्म भविष्यति ॥ १०८ ॥ त्रिषु लोकेषु कीर्तिश्च तवाक्षय्या भविष्यति । वशगाश्च भविष्यन्ति सुरास्तव महाभुज ॥ १०९ ॥ ‘देव! तुम भगवान् शंकरके समान ही युद्धमें शत्रुओंके लिये अजेय हो। यह तुम्हारा प्रथम पराक्रम सर्वत्र विख्यात होगा। तुम्हारी अक्षय कीर्ति तीनों लोकोंमें फैल जायगी। महाबाहो! सब देवता तुम्हारे वशमें रहेंगे’ ॥
एवमुक्त्वा महासेनं निवृत्तः सह दैवतैः । अनुज्ञातो भगवता त्र्यम्बकेण शचीपतिः ॥ ११० ॥ महासेनसे ऐसा कहकर शचीपति इन्द्र भगवान् शंकरकी आज्ञा ले देवताओंके साथ स्वर्गलोकको लौट गये ॥
गतो भद्रवटं रुद्रो निवृत्ताश्च दिवौकसः । उक्ताश्च देवा रुद्रेण स्कन्दं पश्यत मामिव ॥ १११ ॥ भगवान् रुद्र भद्रवटके समीप गये और देवता अपने-अपने स्थानको लौटने लगे। उस समय भगवान् शंकरने देवताओंसे कहा—‘तुम सब लोग कुमार कार्तिकेयको मेरे ही समान मानना’ ॥ १११ ॥
स हत्वा दानवगणान् पूज्यमानो महर्षिभिः । एकाह्नैवाजयत् सर्वं त्रैलोक्य वह्निन्दनः ॥ ११२ ॥
अग्निनन्दन स्कन्दने सब दानवोंको मारकर महर्षियोंसे पूजित हो एक ही दिनमें समूची त्रिलोकीको जीत लिया ॥ ११२ ॥ स्कन्दस्य य इदं विप्रः पठेज्जन्म समाहितः । स पुष्टिमिह सम्प्राप्य स्कन्दसालोक्यमाप्नुयात् ॥ ११३ ॥ जो ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो स्कन्ददेवके इस जन्मवृत्तान्तका पाठ करता है, वह संसारमें पुष्टिको प्राप्त हो अन्तमें भगवान् स्कन्दके लोकमें जाता है ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसे स्कन्दोत्पत्तौ महिषासुरवधे एकत्रिशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें अंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दकी उत्पत्ति तथा महिषासुरवधविषयक दो सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३१ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ११३ १/२ श्लोक हैं)
* रथका वह अग्रभाग जहाँ जूआ बाँधा जाता है, कूबर कहलाता है। ग्राम्य भाषामें उसे ‘नकेला’ या ‘सबुनी’ कहते हैं।
कार्तिकेयके प्रसिद्ध नामोंका वर्णन तथा उनका स्तवन
द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
कार्तिकेयके प्रसिद्ध नामोंका वर्णन तथा उनका स्तवन
युधिष्ठिर उवाच
भगवन् श्रोतुमिच्छामि नामान्यस्य महात्मनः ।
त्रिषु लोकेषु यान्यस्य विख्यातानि द्विजोत्तम ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भगवन्! विप्रवर! तीनों लोकोंमें महामना कार्तिकेयके जो-जो नाम विख्यात हैं, मैं उन्हें सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः पाण्डवेयेन महात्मा ऋषिसंनिधौ ।
उवाच भगवांस्तत्र मार्कण्डेयो महातपाः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके इस प्रकार कहनेपर महातपस्वी महात्मा भगवान् मार्कण्डेयने ऋषियोंके समीप इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
मार्कण्डेय उवाच
आग्नेयश्चैव स्कन्दश्च दीप्तकीर्तिरनामयः ।
मयूरकेतुर्धर्मात्मा भूतेशो महिषार्दनः ॥ ३ ॥
कामजित् कामदः कान्तः सत्यवाग् भुवनेश्वरः ।
शिशुः शीघ्रः शुचिश्चण्डो दीप्तवर्णः शुभाननः ॥ ४ ॥
अमोघस्त्वनघो रौद्रः प्रियश्चन्द्राननस्तथा ।
दीप्तशक्तिः प्रशान्तात्मा भद्रकृत् कूटमोहनः ॥ ५ ॥
षष्ठीप्रियश्च धर्मात्मा पवित्रो मातृवत्सलः ।
कन्याभर्ता विभक्तश्च स्वाहेयो रेवतीसुतः ॥ ६ ॥
प्रभुर्नेता विशाखश्च नैगमेयः सुदुश्चरः ।
सुव्रतो ललितश्चैव बालक्रीडनकप्रियः ॥ ७ ॥
खचारी ब्रह्मचारी च शूरः शरवणोद्भवः ।
विश्वामित्रप्रियश्चैव देवसेनाप्रियस्तथा ॥ ८ ॥
वासुदेवप्रियश्चैव प्रियः प्रियकृदेव तु ।
नामान्येतानि दिव्यानि कार्तिकेयस्य यः पठेत् ।
स्वर्गं कीर्तिं धनं चैव स लभेन्नात्र संशयः ॥ ९ ॥
**मार्कण्डेयजी बोले—**राजन्! आग्नेय, स्कन्द, दीप्तकीर्ति, अनामय, मयूरकेतु, धर्मात्मा, भूतेश, महिषमर्दन, कामजित्, कामद, कान्त, सत्यवाक्, भुवनेश्वर, शिशु, शीघ्र,
शुचि, चण्ड, दीप्तवर्ण, शुभानन, अमोघ, अनघ, रौद्र, प्रिय, चन्द्रानन, दीप्तशक्ति, प्रशान्तात्मा, भद्रकृत्, कूटमोहन, षष्ठीप्रिय, धर्मात्मा, पवित्र, मातृवत्सल, कन्याभर्ता, विभक्त, स्वाहेय, रेवतीसुत, प्रभु, नेता, विशाख, नैगमेय, सुदुश्चर, सुव्रत, ललित, बाल-क्रीडनकप्रिय, आकाशचारी, ब्रह्मचारी, शूर, शंखणोद्भव, विश्वामित्रप्रिय, देवसेनाप्रिय, वासुदेवप्रिय, प्रिय और प्रियकृत्—ये कार्तिकेयजीके दिव्य नाम हैं। जो इनका पाठ करता है, वह धन, कीर्ति तथा स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं है ।। ३—९ ।।
स्तोष्यामि देवैर्ऋषिभिश्च जुष्टं
शक्त्या गुहं नामभिरप्रमेयम् ।
षडाननं शक्तिधरं सुवीरं
निबोध चैतानि कुरुप्रवीर ।। १० ।।
कुरुकुलके प्रमुख वीर युधिष्ठिर! अब मैं देवताओं तथा ऋषियोंसे सेवित, असंख्य नामों तथा अनन्त शक्तिसे सम्पन्न, शक्ति नामक अस्त्र धारण करनेवाले वीरवर षडानन गुहकी स्तुति करता हूँ, तुम ध्यान देकर सुनो ।।
ब्रह्मण्यो वै ब्रह्मजो ब्रह्मविच्च
ब्रह्मेशयो ब्रह्मवतां वरिष्ठः ।
ब्रह्मप्रियो ब्राह्मणसंव्रती त्वं
ब्रह्मज्ञो वै ब्राह्मणानां च नेता ।। ११ ।।
स्कन्ददेव! आप ब्राह्मणहितैषी, ब्रह्मात्मज, ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, ब्राह्मणप्रिय, ब्राह्मणोंके समान व्रतधारी, ब्रह्मज्ञ तथा ब्राह्मणोंके नेता हैं ।। ११ ।।
स्वाहा स्वधा त्वं परमं पवित्रं
मन्त्रस्तुतस्त्वं प्रथितः षडर्चिः ।
संवत्सरस्त्वमृतवश्च षड् वै
मासार्धमासावयनं दिशश्च ।। १२ ।।
आप स्वाहा, स्वधा, परम पवित्र, मन्त्रोंद्वारा प्रशंसित और सुप्रसिद्ध षडर्चि (छः ज्वालाओंसे युक्त) अग्नि हैं। आप ही संवत्सर, छः ऋतुएँ, पक्ष, मास, अयन और दिशाएँ हैं ।। १२ ।।
त्वं पुष्कराक्षस्त्वरविन्दवक्त्रः
सहस्रवक्त्रोऽसि सहस्रबाहुः ।
त्वं लोकपालः परमं हविश्च
त्वं भावनः सर्वसुरासुराणाम् ।। १३ ।।
आप कमलनयन, कमलमुख, सहस्रवदन और सहस्रबाहु हैं। आप ही लोकपाल, सर्वोत्तम हविष्य तथा सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंके पालक हैं ।। १३ ।।
त्वमेव सेनाधिपतिः प्रचण्डः
प्रभुर्विभुश्चाप्यथ शत्रुजेता । सहस्रभूस्त्वं धरणी त्वमेव सहस्रतुष्टिश्च सहस्रभुक् च ॥ १४ ॥ आप ही सेनापति, अत्यन्त कोपवान्, प्रभु, विभु और शत्रुविजयी हैं। आप ही सहस्रभू और पृथ्वी हैं। आप ही सहस्रों प्राणियोंको संतोष देनेवाले तथा सहस्रभोक्ता हैं ॥ १४ ॥
सहस्रशीर्षस्त्वमनन्तरूपः सहस्रपात् त्वं गुह शक्तिधारी । गङ्गासुतस्त्वं स्वमतेन देव स्वाहामहीकृत्तिकानां तथैव ॥ १५ ॥ आपके सहस्रों मस्तक हैं। आपके रूपका कहीं अन्त नहीं है। आपके सहस्रों चरण हैं। गुह! आप शक्ति धारण करते हैं। देव! आप अपने इच्छानुसार गंगा, स्वाहा, पृथ्वी तथा कृत्तिकाओंके पुत्ररूपसे प्रकट हुए हैं ॥ १५ ॥
त्वं क्रीडसे षण्मुख कुक्कुटेन यथेष्टनानाविधकामरूपी । दीक्षासि सोमो मरुतः सदैव धर्मोऽसि वायुरचलेन्द्र इन्द्रः ॥ १६ ॥ षडानन! आप मुर्गेसे खेलते हैं तथा इच्छानुसार नाना प्रकारके कमनीय रूप धारण करते हैं। आप सदा ही दीक्षा, सोम, मरुद्गण, धर्म, वायु, गिरिराज तथा इन्द्र हैं ॥ १६ ॥
सनातनानामपि शाश्वतस्त्वं प्रभुः प्रभूणामपि चोग्रधन्वा । ऋतस्य कर्ता दितिजान्तकस्त्वं जेता रिपूणां प्रवरः सुराणाम् ॥ १७ ॥ आप सनातनोंमें भी सनातन हैं। प्रभुओंके भी प्रभु हैं। आपका धनुष भयंकर है। आप सत्यके प्रवर्तक, दैत्योंका संहार करनेवाले, शत्रुविजयी तथा देवताओंमें श्रेष्ठ हैं ॥ १७ ॥
सूक्ष्मं तपस्तत् परमं त्वमेव परावरज्ञोऽसि परावरस्त्वम् । धर्मस्य कामस्य परस्य चैव त्वत्तेजसा कृत्स्नमिदं महात्मन् ॥ १८ ॥ जो सर्वोत्कृष्ट सूक्ष्म तप है, वह आप ही हैं। आप ही कार्य-कारण-तत्त्वके ज्ञाता तथा कार्यकारणस्वरूप हैं। धर्म, काम तथा इन दोनोंसे परे जो मोक्षतत्त्व है, उसके भी आप ही ज्ञाता हैं। महात्मन्! यह सम्पूर्ण जगत् आपके तेजसे प्रकाशित होता है ॥ १८ ॥
व्याप्तं जगत् सर्वसुरप्रवीर शक्त्या मया संस्तुत लोकनाथ ।
नमोऽस्तु ते द्वादशनेत्रबाहो
अतः परं वेद्मि गतिं न तेऽहम् ॥ १९ ॥
समस्त देवताओंके प्रमुख वीर! आपकी शक्तिसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। लोकनाथ! मैंने यथाशक्ति आपका स्तवन किया है। बारह नेत्रों और भुजाओंसे सुशोभित देव! आपको नमस्कार है। इससे परे आपका जो स्वरूप है, उसे मैं नहीं जानता ॥ १९ ॥
स्कन्दस्य य इदं विप्रः पठेज्जन्म समाहितः ।
श्रावयेद् ब्राह्मणेभ्यो यः शृणुयाद् वा द्विजेरितम् ॥ २० ॥
धनमायुर्यशो दीप्तं पुत्राञ्छत्रुजयं तथा ।
स पुष्टितुष्टी सम्प्राप्य स्कन्दसालोक्यमाप्नुयात् ॥ २१ ॥
जो ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो स्कन्ददेवके इस जन्म-वृत्तान्तको पढ़ता है, ब्राह्मणोंको सुनाता है अथवा स्वयं ब्राह्मणके मुखसे सुनता है, वह धन, आयु, उज्ज्वल यश, पुत्र, शत्रुविजय तथा तुष्टि-पुष्टि पाकर अन्तमें स्कन्दके लोकमें जाता है ॥ २०-२१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसे कार्तिकेयस्तवे
द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें कार्तिकेयस्तुतिविषयक दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३२ ॥
द्रौपदी-सत्यभामा-संवाद
द्रौपदी-सत्यभामा-संवाद
(द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्व)
(द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्व)
त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना
वैशम्पायन उवाच
उपासीनेषु विप्रेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
द्रौपदी सत्यभामा च विविशाते तदा समम् ॥ १ ॥
जाहस्यमाने सुप्रीते सुखं तत्र निषीदतुः ।
चिरस्य दृष्ट्वा राजेन्द्र तेऽन्योन्यस्य प्रियंवदे ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब महात्मा पाण्डव तथा ब्राह्मणलोग आस-
पास बैठकर धर्मचर्चा कर रहे थे, उसी समय द्रौपदी और सत्यभामा भी एक ओर जाकर
एक ही साथ सुखपूर्वक बैठीं और अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक परस्पर हास्य-विनोद करने लगीं।
राजेन्द्र! दोनोंने एक-दूसरीको बहुत दिनों बाद देखा था, इसलिये परस्पर प्रिय लगनेवाली
बातें करती हुई वहाँ सुखपूर्वक बैठी रहीं ॥ १-२ ॥
कथयामासतुश्चित्राः कथाः कुरुयदूत्थिताः ।
अथाब्रवीत् सत्यभामा कृष्णस्य महिषी प्रिया ॥ ३ ॥
सत्राजिती याज्ञसेनीं रहसीदं सुमध्यमा ।
केन द्रौपदि वृत्तेन पाण्डवानधितिष्ठसि ॥ ४ ॥
लोकपालोपमान् वीरान् पुनः परमसंहतान् ।
कथं च वशगास्तुभ्यं न कुप्यन्ति च ते शुभे ॥ ५ ॥
कुरुकुल और यदुकुलसे सम्बन्ध रखनेवाली अनेक विचित्र बातें उनकी चर्चाकी विषय
थीं। भगवान् श्रीकृष्णकी प्यारी पटरानी सत्राजित्कुमारी सुन्दरी सत्यभामाने एकान्तमें
द्रौपदीसे इस प्रकार पूछा—'शुभे! द्रुपदकुमारि! किस बर्तावसे तुम हृष्ट-पुष्ट अंगोंवाले तथा
लोकपालोंके समान वीर पाण्डवोंके हृदयपर अधिकार रखती हो? किस प्रकार तुम्हारे
वशमें रहते हुए वे कभी तुमपर कुपित नहीं होते? ॥ ३—५ ॥
तव वश्या हि सततं पाण्डवाः प्रियदर्शने ।
मुखप्रेक्षाश्च ते सर्वे तत्त्वमेतद् ब्रवीहि मे ॥ ६ ॥
'प्रियदर्शने! क्या कारण है कि पाण्डव सदा तुम्हारे अधीन रहते हैं और सब-के-सब
तुम्हारे मुँहकी ओर देखते रहते हैं? इसका यथार्थ रहस्य मुझे बताओ ॥ ६ ॥
व्रतचर्या तपो वापि स्नानमन्त्रौषधानि वा । विद्यावीर्यं मूलवीर्यं जपहोमागदास्तथा ॥ ७ ॥ ममाद्याचक्ष्व पाञ्चालि यशस्यं भगदैवतम् । येन कृष्णे भवेन्नित्यं मम कृष्णो वशानुगः ॥ ८ ॥ ‘पाञ्चालकुमारी कृष्णे! आज मुझे भी कोई ऐसा व्रत, तप, स्नान, मन्त्र, औषध, विद्या-शक्ति, मूल-शक्ति (जड़ी-बूटीका प्रभाव) जप, होम या दवा बताओ, जो यश और सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला हो तथा जिससे श्यामसुन्दर सदा मेरे अधीन रहें’ ॥ ७-८ ॥ एवमुक्त्वा सत्यभामा विरराम यशस्विनी । पतिव्रता महाभागा द्रौपदी प्रत्युवाच ताम् ॥ ९ ॥ ऐसा कहकर यशस्विनी सत्यभामा चुप हो गयी। तब पतिपरायणा महाभागा द्रौपदीने उसे इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ९ ॥
असत्स्त्रीणां समाचारं सत्ये मामनुपृच्छसि । असदाचरिते मार्गे कथं स्यादनुकीर्तनम् ॥ १० ॥ ‘सत्ये! तुम मुझसे जिसके विषयमें पूछ रही हो, वह साध्वी स्त्रियोंका नहीं, दुराचारिणी और कुलटा स्त्रियोंका आचरण है। जिस मार्गका दुराचारिणी स्त्रियोंने अवलम्बन किया है उसके विषयमें हमलोग कोई चर्चा कैसे कर सकती हैं? ॥ १० ॥
अनुप्रश्नः संशयो वा नैतत् त्वय्युपपद्यते । तथा ह्युपेता बुद्ध्या त्वं कृष्णस्य महिषी प्रिया ॥ ११ ॥ ‘इस प्रकारका प्रश्न अथवा स्वामीके स्नेहमें संदेह करना तुम्हारे-जैसी साध्वी स्त्रीके लिये कदापि उचित नहीं है; चूँकि तुम बुद्धिमती होनेके साथ ही श्यामसुन्दरकी प्रियतमा पटरानी हो ॥ ११ ॥
यदैव भर्ता जानीयान्मन्त्रमूलपरां स्त्रियम् । उद्विजेत तदैवास्याः सर्पाद् वेश्मगतादिव ॥ १२ ॥ ‘जब पतिको यह मालूम हो जाय कि उसकी पत्नी उसे वशमें करनेके लिये किसी मन्त्र-तन्त्र अथवा जड़ी-बूटीका प्रयोग कर रही है तो वह उससे उसी प्रकार उद्विग्न हो उठता है जैसे अपने घरमें घुसे हुए सर्पसे लोग शंकित रहते हैं’ ॥ १२ ॥
उद्विग्नस्य कुतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् । न जातु वशगो भर्ता स्त्रियाः स्यान्मन्त्रकर्मणा ॥ १३ ॥ ‘उद्विग्नको शान्ति कैसी? और अशान्तको सुख कहाँ? अतः मन्त्र-तन्त्र करनेसे पति अपनी पत्नीके वशमें कदापि नहीं हो सकता ॥ १३ ॥
अमित्रप्रहितांश्चापि गदान् परमदारुणान् । मूलप्रचारैर्हि विषं प्रयच्छन्ति जिघांसवः ॥ १४ ॥ ‘इसके सिवा, ऐसे अवसरोंपर धोखेसे शत्रुओं-द्वारा भेजी हुई ओषधियोंको खिलाकर कितनी ही स्त्रियाँ अपने पतियोंको अत्यन्त भयंकर रोगोंका शिकार बना देती हैं। किसीको मारनेकी इच्छावाले मनुष्य उसकी स्त्रीके हाथमें यह प्रचार करते हुए विष दे देते हैं कि ‘यह पतिको वशमें करनेवाली जड़ी-बूटी है’ ॥ १४ ॥
जिह्वया यानि पुरुषस्त्वचा वाप्युपसेवते । तत्र चूर्णानि दत्तानि हन्युः क्षिप्रमसंशयम् ॥ १५ ॥ ‘उनके दिये हुए चूर्ण ऐसे होते हैं कि उन्हें पति यदि जिह्वा अथवा त्वचासे भी स्पर्श कर ले, तो वे निःसंदेह उसी क्षण उसके प्राण ले लें ॥ १५ ॥
जलोदरसमायुक्ताः श्वित्रिणः पलितास्तथा । अपुमांसः कृताः स्त्रीभिर्जडान्धबधिरास्तथा ॥ १६ ॥ ‘कितनी ही स्त्रियोंने अपने पतियोंको (वशमें करनेकी आशासे हानिकारक दवाएँ खिलाकर उन्हें) जलोदर और कोढ़का रोगी, असमयमें ही वृद्ध, नपुंसक, अंधा, गूँगा और बहरा बना दिया है ॥ १६ ॥
पापानुगास्तु पापास्ताः पतीनुपसृजन्त्युत । न जातु विप्रियं भर्तुः स्त्रिया कार्यं कथंचन ॥ १७ ॥ ‘इस प्रकार पापियोंका अनुसरण करनेवाली वे पापिनी स्त्रियाँ अपने पतियोंको अनेक प्रकारकी विपत्तियोंमें डाल देती हैं। अतः साध्वी स्त्रीको चाहिये कि वह कभी किसी प्रकार
भी पतिका अप्रिय न करे ॥ १७ ॥
वर्ताम्यहं तु यां वृत्तिं पाण्डवेषु महात्मसु ।
तां सर्वां शृणु मे सत्यां सत्यभामे यशस्विनि ॥ १८ ॥
'यशस्विनी सत्यभामे! मैं स्वयं महात्मा पाण्डवोंके साथ जैसा बर्ताव करती हूँ, वह सब सच-सच सुनाती हूँ; सुनो ॥ १८ ॥
अहंकारं विहायाहं कामक्रोधौ च सर्वदा ।
सदारान् पाण्डवान् नित्यं प्रयतोपचराम्यहम् ॥ १९ ॥
'मैं अहंकार और काम-क्रोधको छोड़कर सदा पूरी सावधानीके साथ सब पाण्डवोंकी और उनकी अन्यान्य स्त्रियोंकी भी सेवा करती हूँ ॥ १९ ॥
प्रणयं प्रतिसंहृत्य निधायात्मानमात्मनि ।
शुश्रूषुर्निरहंमाना पतीनां चित्तरक्षिणी ॥ २० ॥
अपनी इच्छाओंका दमन करके मनको अपने-आपमें ही समेटे हुए केवल सेवाकी इच्छासे ही अपने पतियोंका मन रखती हूँ। अहंकार और अभिमानको अपने पास नहीं फटकने देती ॥ २० ॥
दुर्व्याहृताच्छङ्कमाना दुःस्थिताद् दुरवेक्षितात् ।
दुरासिताद् दुर्व्रजितादिङ्गिताध्यासितादपि ॥ २१ ॥
'कभी मेरे मुखसे कोई बुरी बात न निकल जाय, इसकी आशंकासे सदा सावधान रहती हूँ। असभ्यकी भाँति कहीं खड़ी नहीं होती। निर्लज्जकी तरह सब ओर दृष्टि नहीं डालती। बुरी जगहपर नहीं बैठती। दुराचारसे बचती तथा चलने-फिरनेमें भी असभ्यता न हो जाय, इसके लिये सतत सावधान रहती हूँ। पतियोंके अभिप्रायपूर्ण संकेतका सदैव अनुसरण करती हूँ ॥ २१ ॥
सूर्यवैश्वानरसमान् सोमकल्पान् महारथान् ।
सेवे चक्षुर्हणः पार्थानुग्रवीर्यप्रतापिनः ॥ २२ ॥
'कुन्तीदेवीके पाँचों पुत्र ही मेरे पति हैं। वे सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी, चन्द्रमाके समान आह्लाद प्रदान करनेवाले, महारथी, दृष्टिमात्रसे ही शत्रुओंको मारनेकी शक्ति रखनेवाले तथा भयंकर बल-पराक्रम एवं प्रतापसे युक्त हैं। मैं सदा उन्हींकी सेवामें लगी रहती हूँ ॥ २२ ॥
देवो मनुष्यो गन्धर्वो युवा चापि स्वलंकृतः ।
द्रव्यवानभिरूपो वा न मेऽन्यः पुरुषो मतः ॥ २३ ॥
'देवता, मनुष्य, गन्धर्व, युवक, बड़ी सजधजवाला धनवान् अथवा परम सुन्दर कैसा ही पुरुष क्यों न हो, मेरा मन पाण्डवोंके सिवा और कहीं नहीं जाता ॥ २३ ॥
नाभुक्तवति नास्नाते नासंविष्टे च भर्तरि ।
न संविशामि नाश्नामि सदा कर्मकरेष्वपि ॥ २४ ॥
'पतियों और उनके सेवकोंको भोजन कराये बिना मैं कभी भोजन नहीं करती, उन्हें नहलाये बिना कभी नहाती नहीं हूँ तथा पतिदेव जबतक शयन न करें, तबतक मैं सोती भी नहीं हूँ ॥ २४ ॥
क्षेत्राद् वनाद् वा ग्रामाद् वा भर्तारं गृहमागतम् ।
अभ्युत्थायाभिनन्दामि आसनेनोदकेन च ॥ २५ ॥
'खेतसे, वनसे अथवा गाँवसे जब कभी मेरे पति घर पधारते हैं, उस समय मैं खड़ी होकर उनका अभिनन्दन करती हूँ; तथा आसन और जल अर्पण करके उनके स्वागत-सत्कारमें लग जाती हूँ ॥ २५ ॥
प्रमृष्टभाण्डा मृष्टान्ना काले भोजनदायिनी ।
संयता गुप्तधान्या च सुसम्मृष्टनिवेशना ॥ २६ ॥
'मैं घरके बर्तनोंको माँज-धोकर साफ रखती हूँ। शुद्ध एवं स्वादिष्ट रसोई तैयार करके सबको ठीक समयपर भोजन कराती हूँ। मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर घरमें गुप्तरूपसे अनाजका संचय रखती हूँ और घरको झाड़-बुहार, लीप-पोतकर सदा स्वच्छ एवं पवित्र बनाये रखती हूँ ॥ २६ ॥
अतिरस्कृतसम्भाषा दुःस्त्रियो नानुसेवती ।
अनुकूलवती नित्यं भवाम्यनलसा सदा ॥ २७ ॥
'मैं कोई ऐसी बात मुँहसे नहीं निकालती, जिससे किसीका तिरस्कार होता हो। दुष्ट स्त्रियोंके सम्पर्कसे सदा दूर रहती हूँ। आलस्यको कभी पास नहीं आने देती और सदा पतियोंके अनुकूल बर्ताव करती हूँ ॥ २७ ॥
अनर्म चापि हसितं द्वारि स्थानमभीक्ष्णशः ।
अवस्करे चिरस्थानं निष्कुटेषु च वर्जये ॥ २८ ॥
'पतिके किये हुए परिहासके सिवा अन्य समयमें मैं नहीं हँसा करती, दरवाजेपर बार-बार नहीं खड़ी होती, जहाँ कूड़े-करकट फेंके जाते हों, ऐसे गंदे स्थानोंमें देरतक नहीं ठहरती और बगीचोंमें भी बहुत देरतक अकेली नहीं घूमती हूँ ॥ २८ ॥
(अन्त्यालापमसंतोषं परव्यापारसंकथाम् ।
अतिहासातिरोषौ च क्रोधस्थानं च वर्जये ।
निरताहं सदा सत्ये भर्तॄणामुपसेवने ॥ २९ ॥
'नीच पुरुषोंसे बात नहीं करती, मनमें असंतोषको स्थान नहीं देती और परायी चर्चासे दूर रहती हूँ। न अधिक हँसती हूँ और न अधिक क्रोध करती हूँ। क्रोधका अवसर ही नहीं आने देती। सदा सत्य बोलती और पतियोंकी सेवामें लगी रहती हूँ ॥ २९ ॥
सर्वथा भर्तृरहितं न ममेष्टं कथंचन ।
यदा प्रवसते भर्ता कुटुम्बार्थेन केनचित् ॥ ३० ॥
सुमनोवर्णकापेता भवामि व्रतचारिणी ।
'पतिदेवके बिना किसी भी स्थानमें अकेली रहना मुझे बिलकुल पसंद नहीं है। मेरे स्वामी जब कभी कुटुम्बके कार्यसे कभी परदेश चले जाते हैं, उन दिनों मैं फूलोंका शृंगार नहीं धारण करती, अंगराग नहीं लगाती और निरन्तर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करती हूँ ।। ३० १/२ ।।
यच्च भर्ता न पिबति यच्च भर्ता न सेवते ।। ३१ ।। यच्च नाश्नाति मे भर्ता सर्वं तद् वर्जयाम्यहम् । 'मेरे पतिदेव जिस चीजको नहीं खाते, नहीं पीते अथवा नहीं सेवन करते, वह सब मैं भी त्याग देती हूँ ।। ३१ १/२ ।।
यथोपदेशं नियता वर्तमाना वराङ्गने ।। ३२ ।। स्वलंकृता सुप्रयता भर्तुः प्रियहिते रता । ये च धर्माः कुटुम्बेषु श्वश्र्वा मे कथिताः पुरा ।। ३३ ।। (अनुतिष्ठामि तत् सर्वं नित्यकालमतन्द्रिता ।।) 'सुन्दरी! शास्त्रोंमें स्त्रियोंके लिये जिन कर्तव्योंका उपदेश किया गया है, उन सबका मैं नियमपूर्वक पालन करती हूँ। अपने अंगोंको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित रखकर पूरी सावधानीके साथ मैं पतिके प्रिय एवं हित-साधनमें संलग्न रहती हूँ। मेरी सासने अपने परिवारके लोगोंके साथ बर्तावमें लानेयोग्य जो धर्म पहले मुझे बताये थे, उन सबका मैं निरन्तर आलस्यरहित होकर पालन करती हूँ ।। ३२-३३ ।।
भिक्षाबलिश्राद्धमिति स्थालीपाकांश्च पर्वसु । मान्यानां मानसत्कारा ये चान्ये विदिता मम ।। ३४ ।। तान् सर्वाननुवर्तेऽहं दिवारात्रमतन्द्रिता । विनयान् नियमांश्चैव सदा सर्वात्मना श्रिता ।। ३५ ।। 'मैं दिन-रात आलस्य त्यागकर भिक्षा-दान, बलिवैश्वदेव, श्राद्ध, पर्वकालोचित स्थालीपाकयज्ञ, मान्य पुरुषोंका आदर-सत्कार, विनय, नियम तथा अन्य जो-जो धर्म मुझे ज्ञात हैं, उन सबका सब प्रकारसे उद्यत होकर पालन करती हूँ ।। ३४-३५ ।।
मृदून् सतः सत्यशीलान् सत्यधर्मानुपालिनः । आशीविषानिव क्रुद्धान् पतीन् परिचराम्यहम् ।। ३६ ।। 'मेरे पति बड़े ही सज्जन और मृदुल स्वभावके हैं। सत्यवादी तथा सत्यधर्मका निरन्तर पालन करनेवाले हैं; तथापि क्रोधमें भरे हुए विषैले सर्पोंसे जिस प्रकार लोग डरते हैं, उसी प्रकार मैं अपने पतियोंसे डरती हुई उनकी सेवा करती हूँ ।। ३६ ।।
पत्याश्रयो हि मे धर्मो मतः स्त्रीणां सनातनः । स देवः सा गतिर्नान्या तस्य का विप्रियं चरेत् ।। ३७ ।। 'मैं यह मानती हूँ कि पतिके आश्रयमें रहना ही स्त्रियोंका सनातन धर्म है। पति ही उनका देवता है और पति ही उनकी गति है। पतिके सिवा नारीका दूसरा कोई सहारा नहीं
है, ऐसे पतिदेवताका भला कौन स्त्री अप्रिय करेगी? ।। ३७ ।। अहं पतीन् नातिशये नात्यश्ने नातिभूषये । नापि श्वश्रूं परिवदे सर्वदा परियन्त्रिता ॥ ३८ ॥ 'पतियोंके शयन करनेसे पहले मैं कभी शयन नहीं करती, उनसे पहले भोजन नहीं करती, उनकी इच्छाके विरुद्ध कोई आभूषण नहीं पहनती, अपनी सासकी कभी निन्दा नहीं करती और अपने-आपको सदा नियन्त्रणमें रखती हूँ ।। ३८ ।। अवधानेन सुभगे नित्यमुत्थिततयैव च । भर्तारो वशगा मह्यं गुरुशुश्रूषयैव च ॥ ३९ ॥ 'सौभाग्यशालिनी सत्यभामे! मैं सावधानीसे सर्वदा सबेरे उठकर समुचित सेवाके लिये सन्नद्ध रहती हूँ। गुरुजनोंकी सेवा-शुश्रूषासे ही मेरे पति मेरे अनुकूल रहते हैं ।। ३९ ।। नित्यमार्यामहं कुन्तीं वीरसूं सत्यवादिनीम् । स्वयं परिचराम्येतां पानाच्छादनभोजनैः ॥ ४० ॥ 'मैं वीरजननी सत्यवादिनी आर्या कुन्तीदेवीकी भोजन, वस्त्र और जल आदिसे सदा स्वयं सेवा करती रहती हूँ ।। ४० ।। नैतामतिशये जातु वस्त्रभूषणभोजनैः । नापि परिवदे चाहं तां पृथां पृथिवीसमाम् ॥ ४१ ॥ 'वस्त्र, आभूषण और भोजन आदिमें मैं कभी सासकी अपेक्षा अपने लिये कोई विशेषता नहीं रखती। मेरी सास कुन्तीदेवी पृथ्वीके समान क्षमाशील हैं। मैं कभी उनकी निन्दा नहीं करती ।। ४१ ।। अष्टावग्रे ब्राह्मणानां सहस्राणि स्म नित्यदा । भुञ्जते रुक्मपात्रीषु युधिष्ठिरनिवेशने ॥ ४२ ॥ 'पहले महाराज युधिष्ठिरके महलमें प्रतिदिन आठ हजार ब्राह्मण सोनेकी थालियोंमें भोजन किया करते थे ।। ४२ ।। अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः । त्रिंशद्दासीक एकैको यान् बिभर्ति युधिष्ठिरः ॥ ४३ ॥ 'महाराज युधिष्ठिरके यहाँ अठासी हजार ऐसे स्नातक गृहस्थ थे, जिनका वे भरण-पोषण करते थे। उनमेंसे प्रत्येककी सेवामें तीस-तीस दासियाँ रहती थीं ।। ४३ ।। दशान्यानि सहस्राणि येषामन्नं सुसंस्कृतम् । ह्रियते रुक्मपात्रीभिर्यतीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ४४ ॥ 'इनके सिवा दूसरे दस हजार और ऊर्ध्वरेता यति उनके यहाँ रहते थे, जिनके लिये सुन्दर ढंगसे तैयार किया हुआ अन्न सोनेकी थालियोंमें परोसकर पहुँचाया जाता था ।। ४४ ।। तान् सर्वानग्रहारेण ब्राह्मणान् वेदवादिनः ।
यथार्हं पूजयामि स्म पानाच्छादनभोजनैः ॥ ४५ ॥ ‘मैं उन सब वेदवादी ब्राह्मणोंको अग्रहार (बलिवैश्वदेवके अन्तमें अतिथिको दिये जानेवाले प्रथम अन्न)-का अर्पण करके भोजन, वस्त्र और जलके द्वारा उनकी यथायोग्य पूजा करती थी’ ॥ ४५ ॥
शतं दासीसहस्राणि कौन्तेयस्य महात्मनः । कम्बुकेयूरधारिण्यो निष्ककण्ठ्यः स्वलङ्कृताः ॥ ४६ ॥ ‘कुन्तीनन्दन महात्मा युधिष्ठिरके एक लाख दासियाँ थीं, जो हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ, भुजाओंमें बाजूबंद और कण्ठमें सुवर्णके हार पहनकर बड़ी सजधजके साथ रहती थीं’ ॥ ४६ ॥
महार्हमाल्याभरणाः सुवर्णाश्चन्दनोक्षिताः । मणीन् हेम च बिभ्रत्यो नृत्यगीतविशारदाः ॥ ४७ ॥ ‘उनकी मालाएँ तथा आभूषण बहुमूल्य थे, अंगकान्ति बड़ी सुन्दर थी। वे चन्दनमिश्रित जलसे स्नान करती और चन्दनका ही अंगराग लगाती थीं, मणि तथा सुवर्णके गहने पहना करती थीं। नृत्य और गीतकी कलामें उनका कौशल देखने ही योग्य था’ ॥ ४७ ॥
तासां नाम च रूपं च भोजनाच्छादनानि च । सर्वासामेव वेदाहं कर्म चैव कृताकृतम् ॥ ४८ ॥ ‘उन सबके नाम, रूप तथा भोजन-आच्छादन आदि सभी बातोंकी मुझे जानकारी रहती थी। किसने क्या काम किया और क्या नहीं किया? यह बात भी मुझसे छिपी नहीं रहती थी’ ॥ ४८ ॥
शतं दासीसहस्राणि कुन्तीपुत्रस्य धीमतः । पात्रीहस्ता दिवारात्रमतिथीन् भोजयन्त्युत ॥ ४९ ॥ ‘बुद्धिमान् कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी पूर्वोक्त एक लाख दासियाँ हाथोंमें (भोजनसे भरी हुई) थाली लिये दिन-रात अतिथियोंको भोजन कराती थीं’ ॥ ४९ ॥
शतमश्वसहस्राणि दशनागायुतानि च । युधिष्ठिरस्यानुयात्रमिन्द्रप्रस्थनिवासिनः ॥ ५० ॥ एतदासीत् तदा राज्ञो यन्महीं पर्यपालयत् । येषां संख्याविधिं चैव प्रदिशामि शृणोमि च ॥ ५१ ॥ ‘जिन दिनों महाराज युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थमें रहकर इस पृथ्वीका पालन करते थे, उस समय प्रत्येक यात्रामें उनके साथ एक लाख घोड़े और एक लाख हाथी चलते थे। मैं ही उनकी गणना करती, आवश्यक वस्तुएँ देती और उनकी आवश्यकताएँ सुनती थी’ ॥ ५०-५१ ॥
अन्तःपुराणां सर्वेषां भृत्यानां चैव सर्वशः । आगोपालाविपालेभ्यः सर्वं वेद कृताकृतम् ॥ ५२ ॥
'अन्तःपुरके, नौकरोंके तथा ग्वालों और गड़रियोंसे लेकर समस्त सेवकोंके सभी कार्योंकी देखभाल मैं ही करती थी और किसने क्या काम किया अथवा कौन काम अधूरा रह गया—इन सब बातोंकी जानकारी भी रखती थी ।। ५२ ।।
सर्वं राज्ञः समुदायमायं च व्ययमेव च ।
एकाहं वेद्मि कल्याणि पाण्डवानां यशस्विनि ।। ५३ ।।
'कल्याणी एवं यशस्विनी सत्यभामे! महाराज तथा अन्य पाण्डवोंको जो कुछ आय, व्यय और बचत होती थी, उस सबका हिसाब मैं अकेली ही रखती और जानती थी ।। ५३ ।।
मयि सर्वं समासज्य कुटुम्बं भरतर्षभाः ।
उपासनरताः सर्वे घटयन्ति वरानने ।। ५४ ।।
'वरानने! भरतश्रेष्ठ पाण्डव कुटुम्बका सारा भार मुझपर ही रखकर उपासनामें लगे रहते और तदनुरूप चेष्टा करते थे ।। ५४ ।।
तमहं भारमासक्तमनाधृष्यं दुरात्मभिः ।
सुखं सर्वं परित्यज्य रात्र्यहानि घटामि वै ।। ५५ ।।
'मुझपर जो भार रखा गया था, उसे दुष्ट स्वभावके स्त्री-पुरुष नहीं उठा सकते थे। परंतु मैं सब प्रकारका सुख-भोग छोड़कर रात-दिन उस दुर्बह भारको वहन करनेकी चेष्टा किया करती थी ।। ५५ ।।
अधृष्यं वरुणस्येव निधिपूर्णमिवोदधिम् ।
एकाहं वेद्मि कोशं वै पतीनां धर्मचारिणाम् ।। ५६ ।।
'मेरे धर्मात्मा पतियोंका भरा-पूरा खजाना वरुणके भण्डार और परिपूर्ण महासागरके समान अक्षय एवं अगम्य था। केवल मैं ही उनके विषयकी ठीक जानकारी रखती थी ।। ५६ ।।
अनिशायां निशायां च सहा या क्षुत्पिपासयोः ।
आराधयन्त्याः कौरव्यांस्तुल्या रात्रिरहश्च मे ।। ५७ ।।
'रात हो या दिन, मैं सदा भूख-प्यासके कष्ट सहन करके निरन्तर कुरुकुलरत्न पाण्डवोंकी आराधनामें लगी रहती थी। इससे मेरे लिये दिन और रात समान हो गये थे ।। ५७ ।।
प्रथमं प्रतिबुध्यामि चरमं संविशामि च ।
नित्यकालमहं सत्ये एतत् संवननं मम ।। ५८ ।।
'सत्ये! मैं प्रतिदिन सबसे पहले उठती और सबसे पीछे सोती थी। यह पतिभक्ति और सेवा ही मेरा वशीकरण मन्त्र है ।। ५८ ।।
एतज्जानाम्यहं कर्तुं भर्तृसंवननं महत् ।
असत्स्त्रीणां समाचारं नाहं कुर्यां न कामये ।। ५९ ।।
‘पतिको वशमें करनेका यही सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय मैं जानती हूँ। दुराचारिणी स्त्रियाँ जिन उपायोंका अवलम्बन करती हैं, उन्हें न तो मैं करती हूँ और न चाहती ही हूँ’ ॥ ५९ ॥
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा धर्मसहितं व्याहृतं कृष्णया तदा ।
उवाच सत्या सत्कृत्य पाञ्चालीं धर्मचारिणीम् ॥ ६० ॥
अभिपन्नास्मि पाञ्चालि याज्ञसेनि क्षमस्व मे ।
कामकारः सखीनां हि सोपहासं प्रभाषितम् ॥ ६१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! द्रौपदीकी ये धर्मयुक्त बातें सुनकर सत्यभामाने उस धर्मपरायणा पाञ्चालीका समादर करते हुए कहा—‘पाञ्चालराजकुमारी! याज्ञसेनी! मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ; (मैंने जो अनुचित प्रश्न किया है), उसके लिये मुझे क्षमा कर दो। सखियोंमें परस्पर स्वेच्छापूर्वक ऐसी हास-परिहासकी बातें हो जाया करती हैं’ ॥ ६०-६१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वणि
त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीसत्यभामा-संवादपर्वमें दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६२ श्लोक हैं)