भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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(द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्व)

त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना

वैशम्पायन उवाच

उपासीनेषु विप्रेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।

द्रौपदी सत्यभामा च विविशाते तदा समम् ॥ १ ॥

जाहस्यमाने सुप्रीते सुखं तत्र निषीदतुः ।

चिरस्य दृष्ट्वा राजेन्द्र तेऽन्योन्यस्य प्रियंवदे ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब महात्मा पाण्डव तथा ब्राह्मणलोग आस-

पास बैठकर धर्मचर्चा कर रहे थे, उसी समय द्रौपदी और सत्यभामा भी एक ओर जाकर

एक ही साथ सुखपूर्वक बैठीं और अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक परस्पर हास्य-विनोद करने लगीं।

राजेन्द्र! दोनोंने एक-दूसरीको बहुत दिनों बाद देखा था, इसलिये परस्पर प्रिय लगनेवाली

बातें करती हुई वहाँ सुखपूर्वक बैठी रहीं ॥ १-२ ॥

कथयामासतुश्चित्राः कथाः कुरुयदूत्थिताः ।

अथाब्रवीत् सत्यभामा कृष्णस्य महिषी प्रिया ॥ ३ ॥

सत्राजिती याज्ञसेनीं रहसीदं सुमध्यमा ।

केन द्रौपदि वृत्तेन पाण्डवानधितिष्ठसि ॥ ४ ॥

लोकपालोपमान् वीरान् पुनः परमसंहतान् ।

कथं च वशगास्तुभ्यं न कुप्यन्ति च ते शुभे ॥ ५ ॥

कुरुकुल और यदुकुलसे सम्बन्ध रखनेवाली अनेक विचित्र बातें उनकी चर्चाकी विषय

थीं। भगवान् श्रीकृष्णकी प्यारी पटरानी सत्राजित्कुमारी सुन्दरी सत्यभामाने एकान्तमें

द्रौपदीसे इस प्रकार पूछा—'शुभे! द्रुपदकुमारि! किस बर्तावसे तुम हृष्ट-पुष्ट अंगोंवाले तथा

लोकपालोंके समान वीर पाण्डवोंके हृदयपर अधिकार रखती हो? किस प्रकार तुम्हारे

वशमें रहते हुए वे कभी तुमपर कुपित नहीं होते? ॥ ३—५ ॥

तव वश्या हि सततं पाण्डवाः प्रियदर्शने ।

मुखप्रेक्षाश्च ते सर्वे तत्त्वमेतद् ब्रवीहि मे ॥ ६ ॥

'प्रियदर्शने! क्या कारण है कि पाण्डव सदा तुम्हारे अधीन रहते हैं और सब-के-सब

तुम्हारे मुँहकी ओर देखते रहते हैं? इसका यथार्थ रहस्य मुझे बताओ ॥ ६ ॥

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