महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्व)
त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना
वैशम्पायन उवाच
उपासीनेषु विप्रेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
द्रौपदी सत्यभामा च विविशाते तदा समम् ॥ १ ॥
जाहस्यमाने सुप्रीते सुखं तत्र निषीदतुः ।
चिरस्य दृष्ट्वा राजेन्द्र तेऽन्योन्यस्य प्रियंवदे ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब महात्मा पाण्डव तथा ब्राह्मणलोग आस-
पास बैठकर धर्मचर्चा कर रहे थे, उसी समय द्रौपदी और सत्यभामा भी एक ओर जाकर
एक ही साथ सुखपूर्वक बैठीं और अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक परस्पर हास्य-विनोद करने लगीं।
राजेन्द्र! दोनोंने एक-दूसरीको बहुत दिनों बाद देखा था, इसलिये परस्पर प्रिय लगनेवाली
बातें करती हुई वहाँ सुखपूर्वक बैठी रहीं ॥ १-२ ॥
कथयामासतुश्चित्राः कथाः कुरुयदूत्थिताः ।
अथाब्रवीत् सत्यभामा कृष्णस्य महिषी प्रिया ॥ ३ ॥
सत्राजिती याज्ञसेनीं रहसीदं सुमध्यमा ।
केन द्रौपदि वृत्तेन पाण्डवानधितिष्ठसि ॥ ४ ॥
लोकपालोपमान् वीरान् पुनः परमसंहतान् ।
कथं च वशगास्तुभ्यं न कुप्यन्ति च ते शुभे ॥ ५ ॥
कुरुकुल और यदुकुलसे सम्बन्ध रखनेवाली अनेक विचित्र बातें उनकी चर्चाकी विषय
थीं। भगवान् श्रीकृष्णकी प्यारी पटरानी सत्राजित्कुमारी सुन्दरी सत्यभामाने एकान्तमें
द्रौपदीसे इस प्रकार पूछा—'शुभे! द्रुपदकुमारि! किस बर्तावसे तुम हृष्ट-पुष्ट अंगोंवाले तथा
लोकपालोंके समान वीर पाण्डवोंके हृदयपर अधिकार रखती हो? किस प्रकार तुम्हारे
वशमें रहते हुए वे कभी तुमपर कुपित नहीं होते? ॥ ३—५ ॥
तव वश्या हि सततं पाण्डवाः प्रियदर्शने ।
मुखप्रेक्षाश्च ते सर्वे तत्त्वमेतद् ब्रवीहि मे ॥ ६ ॥
'प्रियदर्शने! क्या कारण है कि पाण्डव सदा तुम्हारे अधीन रहते हैं और सब-के-सब
तुम्हारे मुँहकी ओर देखते रहते हैं? इसका यथार्थ रहस्य मुझे बताओ ॥ ६ ॥