महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1602, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्रतचर्या तपो वापि स्नानमन्त्रौषधानि वा । विद्यावीर्यं मूलवीर्यं जपहोमागदास्तथा ॥ ७ ॥ ममाद्याचक्ष्व पाञ्चालि यशस्यं भगदैवतम् । येन कृष्णे भवेन्नित्यं मम कृष्णो वशानुगः ॥ ८ ॥ ‘पाञ्चालकुमारी कृष्णे! आज मुझे भी कोई ऐसा व्रत, तप, स्नान, मन्त्र, औषध, विद्या-शक्ति, मूल-शक्ति (जड़ी-बूटीका प्रभाव) जप, होम या दवा बताओ, जो यश और सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला हो तथा जिससे श्यामसुन्दर सदा मेरे अधीन रहें’ ॥ ७-८ ॥ एवमुक्त्वा सत्यभामा विरराम यशस्विनी । पतिव्रता महाभागा द्रौपदी प्रत्युवाच ताम् ॥ ९ ॥ ऐसा कहकर यशस्विनी सत्यभामा चुप हो गयी। तब पतिपरायणा महाभागा द्रौपदीने उसे इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ९ ॥
असत्स्त्रीणां समाचारं सत्ये मामनुपृच्छसि । असदाचरिते मार्गे कथं स्यादनुकीर्तनम् ॥ १० ॥ ‘सत्ये! तुम मुझसे जिसके विषयमें पूछ रही हो, वह साध्वी स्त्रियोंका नहीं, दुराचारिणी और कुलटा स्त्रियोंका आचरण है। जिस मार्गका दुराचारिणी स्त्रियोंने अवलम्बन किया है उसके विषयमें हमलोग कोई चर्चा कैसे कर सकती हैं? ॥ १० ॥