महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1608, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथार्हं पूजयामि स्म पानाच्छादनभोजनैः ॥ ४५ ॥ ‘मैं उन सब वेदवादी ब्राह्मणोंको अग्रहार (बलिवैश्वदेवके अन्तमें अतिथिको दिये जानेवाले प्रथम अन्न)-का अर्पण करके भोजन, वस्त्र और जलके द्वारा उनकी यथायोग्य पूजा करती थी’ ॥ ४५ ॥
शतं दासीसहस्राणि कौन्तेयस्य महात्मनः । कम्बुकेयूरधारिण्यो निष्ककण्ठ्यः स्वलङ्कृताः ॥ ४६ ॥ ‘कुन्तीनन्दन महात्मा युधिष्ठिरके एक लाख दासियाँ थीं, जो हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ, भुजाओंमें बाजूबंद और कण्ठमें सुवर्णके हार पहनकर बड़ी सजधजके साथ रहती थीं’ ॥ ४६ ॥
महार्हमाल्याभरणाः सुवर्णाश्चन्दनोक्षिताः । मणीन् हेम च बिभ्रत्यो नृत्यगीतविशारदाः ॥ ४७ ॥ ‘उनकी मालाएँ तथा आभूषण बहुमूल्य थे, अंगकान्ति बड़ी सुन्दर थी। वे चन्दनमिश्रित जलसे स्नान करती और चन्दनका ही अंगराग लगाती थीं, मणि तथा सुवर्णके गहने पहना करती थीं। नृत्य और गीतकी कलामें उनका कौशल देखने ही योग्य था’ ॥ ४७ ॥
तासां नाम च रूपं च भोजनाच्छादनानि च । सर्वासामेव वेदाहं कर्म चैव कृताकृतम् ॥ ४८ ॥ ‘उन सबके नाम, रूप तथा भोजन-आच्छादन आदि सभी बातोंकी मुझे जानकारी रहती थी। किसने क्या काम किया और क्या नहीं किया? यह बात भी मुझसे छिपी नहीं रहती थी’ ॥ ४८ ॥
शतं दासीसहस्राणि कुन्तीपुत्रस्य धीमतः । पात्रीहस्ता दिवारात्रमतिथीन् भोजयन्त्युत ॥ ४९ ॥ ‘बुद्धिमान् कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी पूर्वोक्त एक लाख दासियाँ हाथोंमें (भोजनसे भरी हुई) थाली लिये दिन-रात अतिथियोंको भोजन कराती थीं’ ॥ ४९ ॥
शतमश्वसहस्राणि दशनागायुतानि च । युधिष्ठिरस्यानुयात्रमिन्द्रप्रस्थनिवासिनः ॥ ५० ॥ एतदासीत् तदा राज्ञो यन्महीं पर्यपालयत् । येषां संख्याविधिं चैव प्रदिशामि शृणोमि च ॥ ५१ ॥ ‘जिन दिनों महाराज युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थमें रहकर इस पृथ्वीका पालन करते थे, उस समय प्रत्येक यात्रामें उनके साथ एक लाख घोड़े और एक लाख हाथी चलते थे। मैं ही उनकी गणना करती, आवश्यक वस्तुएँ देती और उनकी आवश्यकताएँ सुनती थी’ ॥ ५०-५१ ॥
अन्तःपुराणां सर्वेषां भृत्यानां चैव सर्वशः । आगोपालाविपालेभ्यः सर्वं वेद कृताकृतम् ॥ ५२ ॥