भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1607

है, ऐसे पतिदेवताका भला कौन स्त्री अप्रिय करेगी? ।। ३७ ।। अहं पतीन् नातिशये नात्यश्ने नातिभूषये । नापि श्वश्रूं परिवदे सर्वदा परियन्त्रिता ॥ ३८ ॥ 'पतियोंके शयन करनेसे पहले मैं कभी शयन नहीं करती, उनसे पहले भोजन नहीं करती, उनकी इच्छाके विरुद्ध कोई आभूषण नहीं पहनती, अपनी सासकी कभी निन्दा नहीं करती और अपने-आपको सदा नियन्त्रणमें रखती हूँ ।। ३८ ।। अवधानेन सुभगे नित्यमुत्थिततयैव च । भर्तारो वशगा मह्यं गुरुशुश्रूषयैव च ॥ ३९ ॥ 'सौभाग्यशालिनी सत्यभामे! मैं सावधानीसे सर्वदा सबेरे उठकर समुचित सेवाके लिये सन्नद्ध रहती हूँ। गुरुजनोंकी सेवा-शुश्रूषासे ही मेरे पति मेरे अनुकूल रहते हैं ।। ३९ ।। नित्यमार्यामहं कुन्तीं वीरसूं सत्यवादिनीम् । स्वयं परिचराम्येतां पानाच्छादनभोजनैः ॥ ४० ॥ 'मैं वीरजननी सत्यवादिनी आर्या कुन्तीदेवीकी भोजन, वस्त्र और जल आदिसे सदा स्वयं सेवा करती रहती हूँ ।। ४० ।। नैतामतिशये जातु वस्त्रभूषणभोजनैः । नापि परिवदे चाहं तां पृथां पृथिवीसमाम् ॥ ४१ ॥ 'वस्त्र, आभूषण और भोजन आदिमें मैं कभी सासकी अपेक्षा अपने लिये कोई विशेषता नहीं रखती। मेरी सास कुन्तीदेवी पृथ्वीके समान क्षमाशील हैं। मैं कभी उनकी निन्दा नहीं करती ।। ४१ ।। अष्टावग्रे ब्राह्मणानां सहस्राणि स्म नित्यदा । भुञ्जते रुक्मपात्रीषु युधिष्ठिरनिवेशने ॥ ४२ ॥ 'पहले महाराज युधिष्ठिरके महलमें प्रतिदिन आठ हजार ब्राह्मण सोनेकी थालियोंमें भोजन किया करते थे ।। ४२ ।। अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः । त्रिंशद्दासीक एकैको यान् बिभर्ति युधिष्ठिरः ॥ ४३ ॥ 'महाराज युधिष्ठिरके यहाँ अठासी हजार ऐसे स्नातक गृहस्थ थे, जिनका वे भरण-पोषण करते थे। उनमेंसे प्रत्येककी सेवामें तीस-तीस दासियाँ रहती थीं ।। ४३ ।। दशान्यानि सहस्राणि येषामन्नं सुसंस्कृतम् । ह्रियते रुक्मपात्रीभिर्यतीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ४४ ॥ 'इनके सिवा दूसरे दस हजार और ऊर्ध्वरेता यति उनके यहाँ रहते थे, जिनके लिये सुन्दर ढंगसे तैयार किया हुआ अन्न सोनेकी थालियोंमें परोसकर पहुँचाया जाता था ।। ४४ ।। तान् सर्वानग्रहारेण ब्राह्मणान् वेदवादिनः ।