महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1726, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रविवेश पुरं हृष्टः स्ववेश्म च नराधिपः । भरतश्रेष्ठ! सुहृदोंकी ये सुन्दर बातें सुनता हुआ राजा दुर्योधन प्रसन्नतापूर्वक नगरमें प्रवेश करके अपने राजभवनमें गया ॥ ६ १/२ ॥ अभिवाद्य ततः पादौ मातापित्रोर्विशाम्पते ॥ ७ ॥ भीष्मद्रोणकृपादीनां विदुरस्य च धीमतः । अभिवादितः कनीयोभिर्भ्रातृभिर्भ्रातृनन्दनः ॥ ८ ॥ महाराज! उसने सबसे पहले अपने माता-पिताके चरणोंमें प्रणाम किया। तत्पश्चात् क्रमशः भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदिको तथा बुद्धिमान् विदुरजीको भी मस्तक झुकाया। तदनन्तर छोटे भाइयोंने आकर भ्राताओंका आनन्द बढ़ानेवाले दुर्योधनको प्रणाम किया ॥ ७-८ ॥ निशसादासने मुख्ये भ्रातृभिः परिवारितः । तमुत्थाय महाराजं सूतपुत्रोऽब्रवीद् वचः ॥ ९ ॥ इसके बाद सब भाइयोंसे घिरा हुआ अपने प्रमुख राजसिंहासनपर विराजमान हुआ। उस समय सूतपुत्र कर्णने उठकर महाराज दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ ९ ॥ दिष्ट्या ते भरतश्रेष्ठ समाप्तोऽयं महाक्रतुः । हतेषु युधि पार्थेषु राजसूये तथा त्वया ॥ १० ॥ आहृतेऽहं नरश्रेष्ठ त्वां सभाजयिता पुनः । ‘भरतश्रेष्ठ! सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा यह महान् यज्ञ सकुशल समाप्त हुआ। नरश्रेष्ठ! जब युद्धमें पाण्डव मारे जायँगे, उस समय तुम्हारे द्वारा आयोजित राजसूययज्ञकी समाप्तिपर मैं पुनः इसी प्रकार तुम्हारा अभिनन्दन करूँगा' ॥ १० १/२ ॥ तमब्रवीन्महाराजो धार्तराष्ट्रो महायशाः ॥ ११ ॥ सत्यमेतत् त्वयोक्तं हि पाण्डवेषु दुरात्मसु । निहतेषु नरश्रेष्ठ प्राप्ते चापि महाक्रतौ ॥ १२ ॥ राजसूये पुनर्वीर त्वमेवं वर्धयिष्यसि । तब महायशस्वी महाराज दुर्योधनने उससे इस प्रकार कहा—'वीर! तुम्हारा यह कथन सत्य है। नरश्रेष्ठ! जब दुरात्मा पाण्डव मारे जायँगे, उस समय महायज्ञ राजसूयके समाप्त होनेपर तुम पुनः इसी प्रकार मेरा अभिनन्दन करोगे' ॥ ११-१२ १/२ ॥ एवमुक्त्वा महाराज कर्णमाश्लिष्य भारत ॥ १३ ॥ राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं चिन्तयामास कौरवः । भरतकुलभूषण! महाराज! ऐसा कहकर दुर्योधनने कर्णको छातीसे लगा लिया और क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका चिन्तन करने लगा ॥ १३ १/२ ॥ सोऽब्रवीत् कौरवांश्चापि पार्श्वस्थान् नृपसत्तमः ॥ १४ ॥ कदा तु तं क्रतुवरं राजसूयं महाधनम् ।