महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 176, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकविंशोऽध्यायः
श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुनः सजग होना
वासुदेव उवाच
एवं स पुरुषव्याघ्र शाल्वराजो महारिपुः । युध्यमानो मया संख्ये वियदभ्यगमत् पुनः ॥ १ ॥ **भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—**पुरुषसिंह! इस प्रकार मेरे साथ युद्ध करनेवाला महाशत्रु शाल्वराज पुनः आकाशमें चला गया ॥ १ ॥
ततः शतघ्नीश्च महागदाश्च दीप्तांश्च शूलान् मुसलानसींश्च । चिक्षेप रोषान्मयि मन्दबुद्धिः शाल्वो महाराज जयाभिकाङ्क्षी ॥ २ ॥ महाराज! वहाँसे विजयकी इच्छा रखनेवाले मन्दबुद्धि शाल्वने क्रोधमें भरकर मेरे ऊपर शतघ्नियां, बड़ी-बड़ी गदाएँ, प्रज्वलित शूल, मुसल और खड्ग फेंके ॥ २ ॥
तानाशुगैरापततोऽहमाशु निवार्य हन्तुं खगमान् ख एव । द्विधा त्रिधा चाच्छिदमाशुमुक्तै- स्ततोऽन्तरिक्षे निनदो बभूव ॥ ३ ॥ उनके आते ही मैंने तुरंत शीघ्रगामी बाणोंद्वारा उन्हें रोककर उन गगनचारी शत्रुओंको आकाशमें ही मार डालनेका निश्चय किया और शीघ्र छोड़े हुए बाणोंद्वारा उन सबके दो-दो तीन-तीन टुकड़े कर डाले। इससे अन्तरिक्षमें बड़ा भारी आर्त्तनाद हुआ ॥ ३ ॥
ततः शतसहस्रेण शराणां नतपर्वणाम् । दारुकं वाजिनश्चैव रथं च समवाकिरत् ॥ ४ ॥ तदनन्तर शाल्वने झुकी हुई गाँठोंवाले लाखों बाणोंका प्रहार करके मेरे सारथि दारुक, घोड़ों तथा रथको आच्छादित कर दिया ॥ ४ ॥
ततो मामब्रवीद् वीर दारुको विह्वलन्निव । स्थातव्यमिति तिष्ठामि शाल्वबाणप्रपीडितः । अवस्थातुं न शक्नोमि अङ्गं मे व्यवसीदति ॥ ५ ॥ वीरवर! तब दारुक व्याकुल-सा होकर मुझसे बोला—'प्रभो! युद्धमें डटे रहना चाहिये' इस कर्तव्यका स्मरण करके ही मैं यहाँ ठहरा हुआ हूँ; किंतु शाल्वके बाणोंसे अत्यन्त