महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 177, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंपीड़ित होनेके कारण मुझमें खड़े रहनेकी भी शक्ति नहीं रह गयी है। मेरा अंग शिथिल होता जा रहा है' ॥ ५ ॥ इति तस्य निशम्याहं सारथेः करुणं वचः । अवेक्षमाणो यन्तारमपश्यं शरपीडितम् ॥ ६ ॥ सारथिका यह करुण वचन सुनकर मैंने उसकी ओर देखा। उसे बाणोंद्वारा बड़ी पीड़ा हो रही थी ॥ ६ ॥ न तस्योरसि नो मूर्ध्नि न काये न भुजद्वये । अन्तरं पाण्डवश्रेष्ठ पश्याम्यनिचितं शरैः ॥ ७ ॥ स तु बाणवरोत्पीडाद् विस्रवत्यसृगुल्बणम् । अभिवृष्टे यथा मेघे गिरिर्गैरिकधातुमान् ॥ ८ ॥ पाण्डवश्रेष्ठ! उसकी छातीमें, मस्तकपर, शरीरके अन्य अवयवोंमें तथा दोनों भुजाओंमें थोड़ा-सा भी ऐसा स्थान नहीं दिखायी देता था, जिसमें बाण न चुभे हुए हों। जैसे मेघके वर्षा करनेपर गेरू आदि धातुओंसे युक्त पर्वत लाल पानीकी धारा बहाने लगता है, वैसे ही वह बाणोंसे छिदे हुए अपने अंगोंसे भयंकर रक्तकी धारा बहा रहा था ॥ ७-८ ॥ अभीषु हस्तं तं दृष्ट्वा सीदन्तं सारथिं रणे । अस्तम्भयं महाबाहो शाल्वबाणप्रपीडितम् ॥ ९ ॥ महाबाहो! उस युद्धमें हाथमें बागडोर लिये सारथिको शाल्वके बाणोंसे पीड़ित होकर कष्ट पाते देख मैंने उसे ढाढ़स बँधाया ॥ ९ ॥ अथ मां पुरुषः कश्चिद् द्वारकानिलयोऽब्रवीत् । त्वरितो रथमभ्येत्य सौहृदादिव भारत ॥ १० ॥ आहुकस्य वचो वीर तस्यैव परिचारकः । विषण्णः सन्नकण्ठेन तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ११ ॥ भरतवंशी वीरवर! इतनेमें ही कोई द्वारकावासी पुरुष आकर तुरंत मेरे रथपर चढ़ गया और सौहार्द दिखाता हुआ-सा बोला। वह राजा उग्रसेनका सेवक था और दुःखी होकर उसने गद्गदकण्ठसे उनका जो संदेश सुनाया, उसे बताता हूँ, सुनिये ॥ १०-११ ॥ द्वारकाधिपतिर्वीर आह त्वामाहुको वचः । केशवैहि विजानीष्व यत् त्वां पितृसखोऽब्रवीत् ॥ १२ ॥ (दूत बोला—) 'वीर! द्वारकानरेश उग्रसेनने आपको यह एक संदेश दिया है। केशव! वे आपके पिताके सखा हैं; उन्होंने आपसे कहा है कि यहाँ आ जाओ और जान लो ॥ १२ ॥ उपायायाद्य शाल्वेन द्वारकां वृष्णिनन्दन । विषक्ते त्वयि दुर्धर्ष हतः शूरसुतो बलात् ॥ १३ ॥