महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें'दुर्धर्ष वृष्णिनन्दन! आपके युद्धमें आसक्त होनेपर शाल्वने अभी द्वारकापुरीमें आकर शूरनन्दन वसुदेवजीको बलपूर्वक मार डाला है ।। १३ ।। तदलं साधु युद्धेन निवर्तस्व जनार्दन । द्वारकामेव रक्षस्व कार्यमेतन्महत् तव ।। १४ ।। 'जनार्दन! अब युद्ध करके क्या लेना है? लौट आओ। द्वारकाकी ही रक्षा करो। तुम्हारे लिये यही सबसे महान् कार्य है' ।। १४ ।। इत्यहं तस्य वचनं श्रुत्वा परमदुर्मनाः । निश्चयं नाधिगच्छामि कर्तव्यस्येतरस्य च ।। १५ ।। दूतका यह वचन सुनकर मेरा मन उदास हो गया। मैं कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें कोई निश्चय नहीं कर पाता था ।। १५ ।। सात्यकिं बलदेवं च प्रद्युम्नं च महारथम् । जगर्हे मनसा वीर तच्छ्रुत्वा महदप्रियम् ।। १६ ।। वीर युधिष्ठिर! वह महान् अप्रिय वृत्तान्त सुनकर मैं मन-ही-मन सात्यकि, बलरामजी तथा महारथी प्रद्युम्नकी निन्दा करने लगा ।। १६ ।। अहं हि द्वारकायाश्च पितुश्च कुरुनन्दन । तेषु रक्षां समाधाय प्रयातः सौभपातने ।। १७ ।। कुरुनन्दन! मैं द्वारका तथा पिताजीकी रक्षाका भार उन्हीं लोगोंपर रखकर सौभविमानका नाश करनेके लिये चला था ।। १७ ।। बलदेवो महाबाहुः कच्चिज्जीवति शत्रुहा । सात्यकी रौक्मिणेयश्च चारुदेष्णश्च वीर्यवान् ।। १८ ।। साम्बप्रभृतयश्चैवेत्यहमासं सुदुर्मनाः । एतेषु हि नरव्याघ्र जीवत्सु न कथंचन ।। १९ ।। शक्यः शूरसुतो हन्तुमपि वज्रभृता स्वयम् । हतः शूरसुतो व्यक्तं व्यक्तं चैते परासवः ।। २० ।। बलदेवमुखाः सर्व इति मे निश्चिता मतिः । सोऽहं सर्वविनाशं तं चिन्तयानो मुहुर्मुहुः । अविह्वलो महाराज पुनः शाल्वमयोधयम् ।। २१ ।। क्या शत्रुहन्ता महाबली बलरामजी जीवित हैं? क्या सात्यकि, रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न, महाबली चारुदेष्ण तथा साम्ब आदि जीवन धारण करते हैं? इन बातोंका विचार करते-करते मेरा मन बहुत उदास हो गया। नरश्रेष्ठ! इन वीरोंके जीते-जी साक्षात् इन्द्र भी मेरे पिता वसुदेवजीको किसी प्रकार मार नहीं सकते थे। अवश्य ही शूरनन्दन वसुदेवजी मारे गये और यह भी स्पष्ट है कि बलरामजी आदि सभी प्रमुख वीर प्राणत्याग कर चुके हैं—यह मेरा