भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 179

निश्चित विचार हो गया। महाराज! इस प्रकार सबके विनाशका बारंबार चिन्तन करके भी मैं व्याकुल न होकर राजा शाल्वसे पुनः युद्ध करने लगा ।। १८-२१ ।। ततोऽपश्यं महाराज प्रपतन्तमहं तदा । सौभाच्छूरसुतं वीर ततो मां मोह आविशत् ।। २२ ।। वीर महाराज! इसी समय मैंने देखा, सौभविमानसे मेरे पिता वसुदेवजी नीचे गिर रहे हैं। इससे शाल्वकी मायासे मुझे मूर्च्छा-सी आ गयी ।। २२ ।। तस्य रूपं प्रपतः पितुर्मम नराधिप । ययातेः क्षीणपुण्यस्य स्वर्गादिव महीतलम् ।। २३ ।। नरेश्वर! उस विमानसे गिरते हुए मेरे पिताका स्वरूप ऐसा जान पड़ता था, मानो पुण्यक्षय होनेपर स्वर्गसे पृथ्वीतलपर गिरनेवाले राजा ययातिका शरीर हो ।। २३ ।। विशीर्णमलिनोष्णीषः प्रकीर्णाम्बरमूर्धजः । प्रपतन् दृश्यते ह स्म क्षीणपुण्य इव ग्रहः ।। २४ ।। उनकी मलिन पगड़ी बिखर गयी थी, शरीरके वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये थे और बाल बिखर गये थे। वे गिरते समय पुण्यहीन ग्रहकी भाँति दिखायी देते थे ।। २४ ।। ततः शार्ङ्गं धनुःश्रेष्ठं करात् प्रपतितं मम । मोहापन्नश्च कौन्तेय रथोपस्थ उपाविशम् ।। २५ ।। कुन्तीनन्दन! उनकी यह अवस्था देख धनुषोंमें श्रेष्ठ शार्ङ्ग मेरे हाथसे छूटकर गिर गया और मैं शाल्वकी मायासे मोहित-सा होकर रथके पिछले भागमें चुपचाप बैठ गया ।। २५ ।। ततो हाहाकृतं सर्वं सैन्यं मे गतचेतनम् । मां दृष्ट्वा रथनीडस्थं गतासुमिव भारत ।। २६ ।। भारत! फिर तो मुझे रथके पिछले भागमें प्राणरहितके समान पड़ा देख मेरी सारी सेना हाहाकार कर उठी। सबकी चेतना लुप्त-सी हो गयी ।। २६ ।। प्रसार्य बाहू पततः प्रसार्य चरणावपि । रूपं पितुर्मे विबभौ शकुनेः पततो यथा ।। २७ ।। हाथों और पैरोंको फैलाकर गिरते हुए मेरे पिताका शरीर मरकर गिरनेवाले पक्षीके समान जान पड़ता था ।। २७ ।। तं पतन्तं महाबाहो शूलपट्टिशपाणयः । अभिघ्नन्तो भृशं वीर मम चेतो ह्यकम्पयन् ।। २८ ।। वीरवर महाबाहो! गिरते समय शत्रु-सैनिक हाथोंमें शूल और पट्टिश लिये उनके ऊपर बारंबार प्रहार कर रहे थे। उनके इस क्रूर कृत्यने मेरे हृदयको कम्पित-सा कर दिया ।। २८ ।। ततो मुहूर्तात् प्रतिलभ्य संज्ञा- महं तदा वीर महाविमर्दे ।

महाभारत (खंड २) - वन पर्व · पृष्ठ 179, कुल 2580 में से · BharatKosha