भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1768

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चतुःषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

जयद्रथका द्रौपदीको देखकर मोहित होना और उसके पास कोटिकास्यको भेजना

वैशम्पायन उवाच

तस्मिन् बहुमृगेऽरण्ये अटमाना महारथाः।
काम्यके भरतश्रेष्ठा विजह्रुस्ते यथामराः॥ १॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! काम्यकवनमें नाना प्रकारके वन्य पशु रहते थे। वहाँ भरतकुलभूषण महारथी पाण्डव सब ओर घूमते हुए देवताओंके समान विहार करते थे॥ १॥

प्रेक्षमाणा बहुविधान् वनोद्देशान् समन्ततः।
यथर्तुकालरम्याश्च वनराजीः सुपुष्पिताः॥ २॥
वे चारों ओर घूम-घूमकर नाना प्रकारके वन्य प्रदेशों तथा ऋतुकालके अनुसार भलीभाँति खिले हुए फूलोंसे सुशोभित रमणीय वनश्रेणियोंकी शोभा देखते थे॥ २॥

पाण्डवा मृगयाशीलाश्चरन्तस्तन्महद् वनम्।
विजह्रुरिन्द्रप्रतिमाः कञ्चित् कालमरिंदम॥ ३॥
शत्रुदमन जनमेजय! पाण्डवलोग बाघ-चीते आदि हिंसक पशुओंका शिकार किया करते थे। देवराज इन्द्रके समान वे उस महान् वनमें विचरते हुए कुछ कालतक विहार करते रहे॥ ३॥

ततस्ते यौगपद्येन ययुः सर्वे चतुर्दिशम्।
मृगयां पुरुषव्याघ्रा ब्राह्मणार्थे परंतपाः॥ ४॥
द्रौपदीमाश्रमे न्यस्य तृणबिन्दोरनुज्ञया।
महर्षेर्दीप्ततपसो धौम्यस्य च पुरोधसः॥ ५॥
एक दिनकी बात है, शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह पाँचों पाण्डव उद्दीप्त तपस्वी पुरोहित धौम्य तथा महर्षि तृणबिन्दुकी आज्ञासे द्रौपदीको अकेली ही आश्रममें रखकर ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये हिंसक पशुओं-को मारने एक साथ चारों दिशाओंमें (अलग-अलग) चले गये॥ ४-५॥

ततस्तु राजा सिन्धूनां वार्द्धक्षत्रिर्महायशाः।
विवाहकामः शाल्वेयान् प्रयातः सोऽभवत् तदा॥ ६॥
महता परिबर्हेण राजयोग्येन संवृतः।
राजभिर्बहुभिः सार्धमुपायात् काम्यकं च सः॥ ७॥