महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1769, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसी समय सिंधुदेशका महायशस्वी राजा जयद्रथ, जो वृद्धक्षत्रका पुत्र था, विवाहकी इच्छासे शाल्वदेशकी ओर जा रहा था। वह बहुमूल्य राजोचित ठाट-बाटसे सुसज्जित था। अनेक राजाओंके साथ यात्रा करता हुआ वह काम्यकवनमें आ पहुँचा ।। ६-७ ।। तत्रापश्यत् प्रियां भार्या पाण्डवानां यशस्विनीम् । तिष्ठन्तीमाश्रमद्वारे द्रौपदीं निर्जने वने ॥ ८ ॥ वहाँ उसने पाण्डवोंकी प्यारी पत्नी यशस्विनी द्रौपदीको दूरसे देखा, जो निर्जन वनमें अपने आश्रमके दरवाजेपर खड़ी थी ।। ८ ।। विभ्राजमानां वपुषा बिभ्रतीं रूपमुत्तमम् । भ्राजयन्तीं वनोद्देशं नीलाभ्रमिव विद्युसम् ॥ ९ ॥ वह परम सुन्दर रूप धारण किये अपनी अनुपम कान्तिसे उद्भासित हो रही थी और जैसे विद्युत् अपनी प्रभासे नीले मेघसमूहको प्रकाशित करती है, उसी प्रकार वह सुन्दरी अपनी अङ्गच्छटासे उस वनप्रान्तको सब ओरसे देदीप्यमान कर रही थी ।। ९ ।। अप्सरा देवकन्या वा माया वा देवनिर्मिता । इति कृत्वाञ्जलिं सर्वे ददृशुस्तामनिन्दिताम् ॥ १० ॥ जयद्रथ और उसके सभी साथियोंने उस अनिन्द्य सुन्दरीकी ओर देखा और वे हाथ जोड़कर मन-ही-मन यह विचार करने लगे—'यह कोई अप्सरा है या देवकन्या अथवा देवताओंकी रची हुई माया है?' ।। १० ।। ततः स राजा सिन्धूनां वार्द्धक्षत्रिजर्यद्रथः । विस्मितस्त्वनवद्याङ्गीं दृष्ट्वा तां दुष्टमानसः ॥ ११ ॥ निर्दोष अंगोंवाली उस सुन्दरीको देखकर वृद्धक्षत्र-कुमार सिन्धुराज जयद्रथ चकित रह गया। उसके मनमें दूषित भावनाका उदय हुआ ।। ११ ।। स कोटिकास्यं राजानमब्रवीत् काममोहितः । कस्य त्वेषानवद्याङ्गी यदि वापि न मानुषी ॥ १२ ॥ उसने काममोहित होकर राजा कोटिकास्यसे कहा—'कोटिक! जरा जाकर पता तो लगाओ, यह सर्वांगसुन्दरी किसकी स्त्री है? अथवा यह मनुष्यजातिकी स्त्री है भी या नहीं? ।। १२ ।। विवाहार्थो न मे कश्चिदिमां प्राप्यातिसुन्दरीम् । एतामेवाहमादाय गमिष्यामि स्वमालयम् ॥ १३ ॥ 'इस अत्यन्त सुन्दरी रमणीको पाकर मुझे और किसीसे विवाह करनेकी आवश्यकता ही नहीं रह जायगी। इसीको लेकर मैं अपने घर लौट जाऊँगा ।। १३ ।। गच्छ जानीहि सौम्येमां कस्य वात्र कुतोऽपि वा । किमर्थमागता सुभ्रूरिदं कण्टकितं वनम् ॥ १४ ॥