महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1770, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें‘सौम्य! जाओ, पता लगाओ, यह किसकी स्त्री है और कहाँसे इस वनमें आयी है? यह सुन्दर भौंहोंवाली युवती काँटोंसे भरे हुए इस जंगलमें किसलिये आयी है? ।। १४ ।।
अपि नाम वरारोहा मामेषा लोकसुन्दरी ।
भजेद्द्यायतापाङ्गी सुदती तनुमध्यमा ॥ १५ ॥
‘क्या यह मनोहर कटिप्रदेशवाली विश्वसुन्दरी मुझे अंगीकार करेगी? इसके नेत्रप्रान्त कितने विशाल हैं, दाँत कैसे सुन्दर हैं और शरीरका मध्यभाग कितना सूक्ष्म है? ।। १५ ।।
अप्यहं कृतकामः स्यामिमां प्राप्य वरस्त्रियम् ।
गच्छ जानीहि को न्वस्या नाथ इत्येव कोटिक ॥ १६ ॥
स कोटिकास्यस्तच्छ्रुत्वा रथात् प्रस्कन्द्य कुण्डली ।
उपेत्य पप्रच्छ तदा क्रोष्टा व्याघ्रवधूमिव ॥ १७ ॥
‘यदि मैं इस सुन्दरीको पा जाऊँ तो कृतार्थ हो जाऊँगा। कोटिक! जाओ और पता लगाओ कि इसका पति कौन है?’ जयद्रथका यह वचन सुनकर कुण्डलमण्डित कोटिकास्य रथसे उतर पड़ा और जैसे गीदड़ बाघकी स्त्रीसे बात करे, उसी प्रकार उसने द्रौपदीके पास जाकर पूछा ।। १६-१७ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि जयद्रथागमने चतुःषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें जयद्रथका आगमनविषयक दो सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २६४ ।।