भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1844

अद्य पुष्यो निशि ब्रह्मन् पुण्यं योगमुपैष्यति । सम्भाराः सम्भ्रियन्तां मे रामश्चोपनिमन्त्र्यताम् ॥ १५ ॥ राजन्! तुम्हारा भला हो। महातेजस्वी तथा परम पराक्रमी राजा दशरथ श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका स्मरण करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ पुरोहितसे बोले—'ब्रह्मन्! आज पुष्य नक्षत्र है। रातमें इसे परम पवित्र योग प्राप्त होनेवाला है। आप राज्याभिषेककी सामग्री तैयार कीजिये और श्रीरामको भी इसकी सूचना दे दीजिये' ॥ १४-१५ ॥ इति तद् राजवचनं प्रतिश्रुत्याथ मन्थरा । कैकेयीमभिगम्येदं काले वचनमब्रवीत् ॥ १६ ॥ राजाकी यह बात मन्थराने भी सुन ली। वह ठीक समयपर कैकेयीके पास जाकर यों बोली— ॥ १६ ॥

अद्य कैकेयि दौर्भाग्यं राज्ञा ते ख्यापितं महत् । आशीविषस्त्वां संक्रुद्धश्चण्डो दशत दुर्भगे ॥ १७ ॥ 'केकयनन्दिनि! आज राजाने तुम्हारे लिये महान् दुर्भाग्यकी घोषणा की है। खोटे भाग्यवाली रानी! इससे अच्छा तो यह होता कि तुम्हें क्रोधमें भरा हुआ प्रचण्ड विषधर सर्प डँस लेता ॥ १७ ॥ सुभगा खलु कौसल्या यस्याःपुत्रोऽभिषेक्ष्यते ।