भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1853

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अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

मृगरूपधारी मारीचका वध तथा सीताका अपहरण

मार्कण्डेय उवाच

मारीचस्त्वथ सम्भ्रान्तो दृष्ट्वा रावणमागतम् ।
पूजयामास सत्कारैः फलमूलादिभिस्ततः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! रावणको आया देख मारीच सहसा उठकर खड़ा हो गया और उसने फल-मूल आदि अतिथिसत्कारकी सामग्रियोंद्वारा उसका विधिवत् पूजन किया ॥ १ ॥

विश्रान्तं चैनमासीनमन्वासीनः स राक्षसः ।
उवाच प्रथितं वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम् ॥ २ ॥
जब रावण बैठकर विश्राम कर चुका, तब उसके पास बैठकर बातचीत करनेमें कुशल राक्षस मारीचने वाक्यका मर्म समझनेमें निपुण रावणसे विनयपूर्वक कहा— ॥ २ ॥

न ते प्रकृतिमान् वर्णः कच्चित् क्षेमं पुरे तव ।
कच्चित् प्रकृतयः सर्वा भजन्ते त्वां यथा पुरा ॥ ३ ॥
‘लंकेश्वर! तुम्हारे शरीरका रंग ठीक हालतमें नहीं है। तुम उदास दिखायी देते हो। तुम्हारे नगरमें कुशल तो है न? समस्त प्रजा और मन्त्री आदि पहलेकी भाँति तुम्हारी सेवा करते हैं न? ॥ ३ ॥

किमिहागमने चापि कार्यं ते राक्षसेश्वर ।
कृतमित्येव तद् विद्धि यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ॥ ४ ॥
‘राक्षसराज! कौन-सा ऐसा कार्य आ गया है, जिसके लिये तुम्हें यहाँतक आना पड़ा? यदि वह मेरेद्वारा साध्य है तो कितना ही कठिन क्यों न हो, उसे किया हुआ ही समझो’ ॥ ४ ॥

शशंस रावणस्तस्मै तत् सर्वं रामचेष्टितम् ।
समासेनैव कार्याणि क्रोधामर्षसमन्वितः ॥ ५ ॥
रावण क्रोध और अमर्षमें भरा हुआ था। उसने एक-एक करके रामद्वारा किये हुए सब कार्य संक्षेपसे कह सुनाये ॥ ५ ॥

मारीचस्त्वब्रवीच्छ्रुत्वा समासेनैव रावणम् ।
अलं ते राममासाद्य वीर्यज्ञो ह्यस्मि तस्य वै ॥ ६ ॥
मारीचने सारी बातें सुनकर थोड़ेमें ही रावणको समझाते हुए कहा—‘दशानन! तुम श्रीरामसे भिड़नेका साहस न करो। मैं उनके पराक्रमको जानता हूँ ॥ ६ ॥

बाणवेगं हि कस्तस्य शक्तः सोढुं महात्मनः ।