भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1854

प्रव्रज्यायां हि मे हेतुः स एव पुरुषर्षभः ॥ ७ ॥ विनाशमुखमेतत् ते केनाख्यातं दुरात्मना । ‘भला! इस जगत्में कौन ऐसा वीर है, जो परमात्मा श्रीरामके बाणोंका वेग सह सके? मैं जो यहाँ संन्यासी बना बैठा हूँ, इसमें भी वे पुरुषरत्न श्रीराम ही कारण हैं। श्रीरामसे वैर मोल लेना विनाशके मुखमें जाना है, किस दुरात्माने तुम्हें ऐसी सलाह दी है?’ ॥ ७ १/२ ॥

तमुवाचाथ सक्रोधो रावणः परिभर्त्सयन् ॥ ८ ॥ अकुर्वतोऽस्मद्वचनं स्यान्मृत्यूरपि ते ध्रुवम् । मारीचकी बात सुनकर रावण और भी कुपित हो उठा और उसे डाँटते हुए बोला—‘मारीच! यदि तू मेरी बात नहीं मानेगा तो भी तेरी मृत्यु निश्चित ही है ॥ ८ १/२ ॥ मारीचश्चिन्तयामास विशिष्टान्मरणं वरम् ॥ ९ ॥ अवश्यं मरणे प्राप्ते करिष्याम्यस्य यन्मतम् । मारीचने सोचा, ‘यदि मृत्यु निश्चित ही है तो श्रेष्ठ पुरुषके हाथसे ही मरना अच्छा होगा; अतः रावणका जो अभीष्ट कार्य है, उसे अवश्य करूँगा’ ॥ ९ १/२ ॥ ततस्तं प्रत्युवाचाथ मारीचो रक्षसां वरम् ॥ १० ॥ किं ते साह्यं मया कार्यं करिष्याम्यवशोऽपि तत् ।