महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1855, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर उसने राक्षसराज रावणसे कहा—'अच्छा; बताओ, मुझे तुम्हारी क्या सहायता करनी होगी? इच्छा, न होनेपर भी मैं विवश होकर उसे करूँगा' ।। १० १/२ ।। तमब्रवीद् दशग्रीवो गच्छ सीतां प्रलोभय ।। ११ ।। रत्नशृङ्गो मृगो भूत्वा रत्नचित्रतनूरुहः । ध्रुवं सीता समालक्ष्य त्वां रामं चोदयिष्यति ।। १२ ।। तब दशाननने उससे कहा—'तुम एक ऐसे मनोहर मृगका रूप धारण करो जिसके सींग रत्नमय प्रतीत हों और शरीरके रोएँ भी रत्नोंके ही समान चित्र-विचित्र दिखायी दें। फिर रामके आश्रमपर जाओ और सीताको लुभाओ। सीता तुम्हें देख लेनेपर निश्चय ही रामसे यह अनुरोध करेगी कि 'आप इस मृगको पकड़ लाइये' ।। ११-१२ ।। अपक्रान्ते च काकुत्स्थे सीता वश्या भविष्यति । तामादायापनेष्यामि ततः स न भविष्यति ।। १३ ।। भार्यावियोगाद् दुर्बुद्धिरेतत् साह्यं कुरुष्व मे । 'तुम्हारे पीछे रामके अपने आश्रमसे दूर निकल जानेपर सीताको वशमें लाना सहज हो जायगा। मैं उसे आश्रमसे हरकर ले जाऊँगा और दुर्बुद्धि राम अपनी प्यारी पत्नीके वियोगसे व्याकुल होकर प्राण दे देगा। बस, मेरी इतनी ही सहायता कर दो' ।। १३ १/२ ।। इत्येवमुक्तो मारीचः कृत्वोदकमथात्मनः ।। १४ ।। रावणं पुरतो यान्तमन्वगच्छत् सुदुःखितः । रावणके ऐसा कहनेपर मारीच स्वयं ही अपना श्राद्ध-तर्पण करके अत्यन्त दुःखी होकर आगे जाते हुए रावणके पीछे-पीछे चला ।। १४ १/२ ।। ततस्तस्याश्रमं गत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।। १५ ।। चक्रतुस्तत् तथा सर्वमुभौ यत् पूर्वमन्त्रितम् । तदनन्तर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमके समीप जाकर उन दोनोंने पहले जैसी सलाह कर रखी थी, उसके अनुसार सब कार्य किया ।। १५ १/२ ।। रावणस्तु यतिर्भूत्वा मुण्डः कुण्डी त्रिदण्डधृक् ।। १६ ।। मृगश्च भूत्वा मारीचस्तं देशमुपजग्मतुः । दर्शयामास मारीचो वैदेहीं मृगरूपधृक् ।। १७ ।। रावण मूँड़ मुड़ाने, भिक्षापात्र हाथमें लिये एवं त्रिदण्डधारी संन्यासीका रूप धारण करके और मारीच मृग बनकर—दोनों उस स्थानपर गये। मारीचने विदेहनन्दिनी सीताके समक्ष अपना मृगरूप प्रकट किया ।। १६-१७ ।। चोदयामास तस्यार्थे सा रामं विधिचोदिता । रामस्तस्याः प्रियं कुर्वन् धनुरादाय सत्वरः ।। १८ ।। रक्षार्थे लक्ष्मणं न्यस्य प्रययौ मृगलिप्सया ।