भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1921

ततस्तान् सहसा दीर्णान् दृष्ट्वा वानरपुङ्गवान् । निर्ययौ कपिशार्दूलो हनूमान् मारुतात्मजः ॥ ७ ॥ उन भयभीत प्रमुख वानरोंको सहसा पलायन करते देख कपिकेसरी मारुतनन्दन हनुमान्‌जी धूम्राक्षका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ ७ ॥

तं दृष्ट्वावस्थितं संख्ये हरयः पवनात्मजम् । महत्या त्वरया राजन् संन्यवर्तन्त सर्वशः ॥ ८ ॥ राजन्! पवनकुमारको युद्धके लिये उपस्थित देख सभी वानर सब ओरसे बड़ी उतावलीके साथ लौट आये ॥ ८ ॥

ततः शब्दो महानासीत् तुमुलो लोमहर्षणः । रामरावणसैन्यानामन्योन्यमभिधावताम् ॥ ९ ॥ फिर तो एक-दूसरेपर धावा बोलती हुई श्रीराम तथा रावणकी सेनाओंका अत्यन्त भयंकर रोमाञ्चकारी कोलाहल आरम्भ हो गया ॥ ९ ॥

तस्मिन् प्रवृत्ते संग्रामे घोरे रुधिरकर्दमे । धूम्राक्षः कपिसैन्यं तद् द्रावयामास पत्रिभिः ॥ १० ॥ उस घोर संग्राममें धरतीपर रक्तकी कीच जम गयी थी। इसी समय धूम्राक्ष अपने बाणोंसे उस वानरसेनाको खदेड़ने लगा ॥ १० ॥

तं स रक्षोमहामात्रमापतन्तं सपत्नजित् । प्रतिजग्राह हनुमांस्तरसा पवनात्मजः ॥ ११ ॥ तब शत्रुविजयी पवननन्दन हनुमान्‌ने अपनी ओर आते हुए उस विशालकाय राक्षसको बड़े वेगसे धर दबाया ॥ ११ ॥

तयोर्युद्धमभूद् घोरं हरिराक्षसवीरयोः । जिगीषतोर्युधान्योन्यमिन्द्रप्रह्लादयोरिव ॥ १२ ॥ उन दोनों वानर तथा राक्षसवीरोंमें भयंकर युद्ध छिड़ गया। वे इन्द्र और प्रह्लादकी भाँति युद्ध करके एक-दूसरेको जीतना चाहते थे ॥ १२ ॥

गदाभिः परिघैश्चैव राक्षसो जघ्निवान् कपिम् । कपिश्च जघ्निवान् रक्षः सस्कन्धविटपैर्द्रुमैः ॥ १३ ॥ निशाचर धूम्राक्षने गदाओं तथा परिघोंद्वारा कपिवर हनुमान्‌जीको चोट पहुँचायी और हनुमान्‌जीने उस राक्षसपर तने और डालियोंसहित वृक्षोंसे प्रहार किया ॥

ततस्तमतिकोपेन साश्वं सरथसारथिम् । धूम्राक्षमवधीत् क्रुद्धो हनूमान् मारुतात्मजः ॥ १४ ॥ तदनन्तर मारुतनन्दन हनुमान्‌जीने अत्यन्त कुपित हो घोड़े, रथ और सारथिसहित धूम्राक्षको मार डाला ॥

ततस्तं निहतं दृष्ट्वा धूम्राक्षं राक्षसोत्तमम् ।