महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 201, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंगिरेः पुरा ऋष्यमूकस्य सानौ ॥ ९ ॥ कुन्तीनन्दन! प्राचीनकालकी बात है राजा रामचन्द्रजी भी अपने पिताकी आज्ञासे ही केवल धनुष हाथमें लिये लक्ष्मणके साथ वनमें निवास एवं भ्रमण करते थे। उस समय ऋष्यमूकपर्वतके शिखरपर मैंने ही उनका भी दर्शन किया था ॥ ९ ॥ सहस्रनेत्रप्रतिमो महात्मा यमस्य नेता नमुचेश्च हन्ता । पितुर्निदेशादनघः स्वधर्मं वासं वने दाशरथिश्चकार ॥ १० ॥ दशरथनन्दन श्रीराम सर्वथा निष्पाप थे। इन्द्र उनके दूसरे स्वरूप थे। वे यमराजके भी नियन्ता और नमुचि-जैसे दानवोंके नाशक थे, तो भी उन महात्माने पिताकी आज्ञासे अपना धर्म समझकर वनमें निवास किया ॥ १० ॥ स चापि शक्रस्य समप्रभावो महानुभावः समरेष्वजेयः । विहाय भोगानचरद् वनेषु नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ ११ ॥ जो इन्द्रके समान प्रभावशाली थे, जिनका अनुभव महान् था तथा जो युद्धमें सर्वदा अजेय थे, उन्होंने भी सम्पूर्ण भोगोंका परित्याग करके वनमें निवास किया था। इसलिये अपनेको बलका स्वामी समझकर अधर्म नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥ भूपाश्च नाभागभगीरथादयो महीमिमां सागरान्तां विजित्य । सत्येन तेऽप्यजयंस्तात लोकान् नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १२ ॥ नाभाग और भगीरथ आदि राजाओंने भी समुद्रपर्यन्त पृथ्वीको जीतकर सत्यके द्वारा उत्तम लोकोंपर विजय पायी। इसलिये तात! अपनेको बलका स्वामी मानकर अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥ अलर्कमाहुर्नरवर्य सन्तं सत्यव्रतं काशिकरूषराजम् । विहाय राज्यानि वसूनि चैव नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १३ ॥ नरश्रेष्ठ! काशी और करूषदेशके राजा अलर्कको सत्यप्रतिज्ञ संत बताया गया है। उन्होंने राज्य और धन त्यागकर धर्मका आश्रय लिया है। अतः अपनेको अधिक शक्तिशाली समझकर अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥ धात्रा विधिर्यो विहितः पुराणे-