भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2134, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2134

तेभ्य एवं प्रवक्ष्यामि विहरिष्याम्यहं यथा ।। ५ ।। पाण्डवेन पुरा तात अश्वेष्वधिकृतः पुरा । विराटनगरे छन्नश्चरिष्यामि महीपते ।। ६ ।। विराटनगरमें जो लोग मुझसे पूछेंगे, उन्हें मैं इस प्रकार उत्तर दूँगा—‘तात! पहले पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिरने मुझे अश्वोंका अध्यक्ष बनाकर रख रखा था।’ महीपते! मैं जिस प्रकार वहाँ विहार करूँगा, वह सब मैंने आपको बता दिया। राजा विराटके नगरमें अपनेको छिपाये रखकर ही मैं सर्वत्र विचरूँगा ।। ५-६ ।।

युधिष्ठिर उवाच सहदेव कथं तस्य समीपे विहरिष्यसि । किं वा त्वं कर्म कुर्वाणः प्रच्छन्नो विहरिष्यसि ।। ७ ।। युधिष्ठिरने सहदेवसे पूछा—भैया सहदेव! तुम राजा विराटके समीप कैसे जाओगे उनके यहाँ क्या काम करते हुए गुप्तरूपसे निवास करोगे? ।। ७ ।।

सहदेव उवाच गोसंख्याता भविष्यामि विराटस्य महीपतेः । प्रतिषेद्धा च दोग्धा च संख्याने कुशलो गवाम् ।। ८ ।। सहदेवने कहा—महाराज! मैं राजा विराटके यहाँ गौओंकी गिनती—जाँच-पड़ताल करनेवाला गो-शालाध्यक्ष होकर रहूँगा। मैं गौओंको नियन्त्रणमें रखने और दुहनेका काम अच्छी तरह जानता हूँ। उन्हें गिनने और उनकी परख-पहचानके काममें भी कुशल हूँ ।। ८ ।।

तन्तिपाल इति ख्यातो नाम्नाहं विदितस्त्वथ । निपुणं च चरिष्यामि व्येतु ते मानसो ज्वरः ।। ९ ।। मैं वहाँ तन्तिपाल नामसे प्रसिद्ध होऊँगा। इसी नामसे मुझे सब लोग जानेंगे। मैं बड़ी चतुराईसे अपनेको छिपाये रखकर वहाँ सब ओर विचरूँगा; अतः मेरे विषयमें आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ।। ९ ।।

(अरोगा बहुलाः पुष्टाः क्षीरवत्यो बहुप्रजाः । निष्पन्नसत्त्वाः सुभृता व्यपेतज्वरकिल्बिषाः ।। नष्टचोरभया नित्यं व्याधिव्याघ्रविवर्जिताः । गावश्च सुसुखा राजन् निरुद्विग्ना निरामयाः ।। भविष्यन्ति मया गुप्ता विराटपशवो नृप ।।) राजन्! मेरे द्वारा रक्षित होकर राजा विराटके पशु तथा गौएँ नीरोग, संख्यामें अधिक, हृष्ट-पुष्ट, अधिक दूध देनेवाली, बहुत संतानोंवाली, सत्त्वयुक्त, अच्छी तरह सम्हाल होनेसे