महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरोगरूप पापसे रहित, चोरोंके भयसे मुक्त तथा सदा व्याधि एवं बाघ आदिके भयसे रक्षित
होंगी। महाराज! वे उद्वेगरहित, सुखी और निरामय तो होंगी ही।
अहं हि सततं गोषु भवता प्रहितः पुरा ।
तत्र मे कौशलं सर्वमवबुद्धं विशाम्पते ॥ १० ॥
भूपाल! पहले आपने मुझे सदा गौओंकी देखभालके कार्यमें नियुक्त किया है। इस
कार्यमें मैं कितना दक्ष हूँ, यह सब आपको विदित ही है ॥ १० ॥
लक्षणं चरितं चापि गवां यच्चापि मङ्गलम् ।
तत् सर्वं मे सुविदितमन्यच्चापि महीपते ॥ ११ ॥
वृषभानपि जानामि राजन् पूजितलक्षणान् ।
येषां मूत्रमुपाघ्राय अपि वन्ध्या प्रसूयते ॥ १२ ॥
महीपते! गौओंके जो लक्षण और चरित्र मंगल-कारक होते हैं, वे सब मुझे भलीभाँति
मालूम हैं। उनके विषयमें और भी बहुत-सी बातें मैं जानता हूँ। राजन्! इसके सिवा मैं ऐसे
प्रशंसनीय लक्षणोंवाले साँड़ोंको भी जानता हूँ, जिनके मूत्रको सूँघ लेनेमात्रसे वन्ध्या स्त्री
भी गर्भवती हो सकती है ॥ ११-१२ ॥
सोऽहमेवं चरिष्यामि प्रीतिरत्र हि मे सदा ।
न च मां वेत्स्यते कश्चित् तोषयिष्ये च पार्थिवम् ॥ १३ ॥
इस प्रकार मैं गौओंकी सेवा करूँगा। इस कार्यमें मुझे सदासे प्रेम रहा है। वहाँ मुझे
कोई पहचान नहीं सकेगा। मैं अपने कार्यसे राजा विराटको संतुष्ट कर लूँगा* ॥ १३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
इयं हि नः प्रिया भार्या प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ।
मातेव परिपाल्या च पूज्या ज्येष्ठेव च स्वसा ॥ १४ ॥
केन स्म द्रौपदी कृष्णा कर्मणा विचरिष्यति ।
न हि किञ्चिद् विजानाति कर्म कर्तुं यथा स्त्रियः ॥ १५ ॥
युधिष्ठिर बोले—यह द्रुपदकुमारी कृष्णा हमलोगोंकी प्यारी भार्या है। इसका गौरव
हमारे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर है। यह माता (पृथ्वी)-की भाँति पालन करनेयोग्य तथा बड़ी
बहन (धेनु)-के समान आदरणीय है। यह तो दूसरी स्त्रियोंकी भाँति कोई काम-काज भी
नहीं जानती; फिर वहाँ किस कर्मका आश्रय लेकर निवास करेगी? ॥ १४-१५ ॥
सुकुमारी च बाला च राजपुत्री यशस्विनी ।
पतिव्रता महाभागा कथं नु विचरिष्यति ॥ १६ ॥
इसका शरीर अत्यन्त सुकुमार है। इसकी अवस्था नयी है। यह यशस्विनी राजकुमारी
परम सौभाग्यवती तथा पतिव्रता है। भला, यह विराटनगरमें किस प्रकार रहेगी? ॥ १६ ॥
माल्यगन्धानलङ्कारान् वस्त्राणि विविधानि च ।