भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2136

एतान्येवाभिजानाति यतो जाता हि भामिनी ॥ १७ ॥ इस भामिनीने जबसे जन्म लिया है, तबसे अबतक माला, सुगन्धित पदार्थ, भाँति-भाँतिके गहने तथा अनेक प्रकारके वस्त्रोंको ही जाना है। इसने कभी कष्टका अनुभव नहीं किया है ॥ १७ ॥

द्रौपद्युवाच

सैरन्ध्रयो रक्षिता लोके भुजिष्याः सन्ति भारत । नैवमन्याः स्त्रियो यान्ति इति लोकस्य निश्चयः ॥ साहं ब्रुवाणा सैरन्ध्री कुशला केशकर्मणि ॥ १८ ॥ युधिष्ठिरस्य गेहे वै द्रौपद्याः परिचारिका । उषितास्मीति वक्ष्यामि पृष्टा राज्ञा च भारत ॥ १९ ॥ द्रौपदीने कहा— भारत! इस जगत्में बहुत-सी ऐसी स्त्रियाँ हैं, जिनका दूसरोंके घरोंमें पालन होता है और जो शिल्पकर्मोंद्वारा जीवननिर्वाह करती हैं। वे अपने सदाचारसे स्वतः सुरक्षित होती हैं। ऐसी स्त्रियोंको सैरन्ध्री कहते हैं। लोगोंको अच्छी तरह मालूम है कि सैरन्ध्रीकी भाँति दूसरी स्त्रियाँ बाहरकी यात्रा नहीं करतीं, [अतः सैरन्ध्रीके वेशमें मुझे कोई पहचान नहीं सकेगा।] इसलिये मैं सैरन्ध्री कहकर अपना परिचय दूँगी। बालोंको सँवारने और वेणी-रचना आदिके कार्योंमें मैं बहुत निपुण हूँ। यदि राजा मुझसे पूछेंगे, तो कह दूँगी कि 'मैं महाराज युधिष्ठिरके महलमें महारानी द्रौपदीकी परिचारिका बनकर रही हूँ' ॥ १८-१९ ॥

आत्मगुप्ता चरिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ २० ॥ सुदेष्णां प्रत्युपस्थास्ये राजभार्यां यशस्विनीम् । सा रक्षिष्यति मां प्राप्तां मा भूत् ते दुःखमीदृशम् ॥ २१ ॥ मैं अपनी रक्षा स्वयं कर लूँगी। आप जो मुझसे पूछते हैं कि तुम वहाँ क्या करोगी? कैसे रहोगी? उसके उत्तरमें निवेदन है कि मैं यशस्विनी राजपत्नी सुदेष्णाके पास जाऊँगी। मुझे अपने पास आयी हुई जानकर वे रख लेंगी और सब प्रकारसे मेरी रक्षा करेंगी। अतः आपके मनमें इस बातका दुःख नहीं होना चाहिये कि द्रौपदी कैसे सुरक्षित रह सकेगा ॥ २०-२१ ॥

युधिष्ठिर उवाच

कल्याणं भाषसे कृष्णे कुले जातासि भामिनि । न पापमभिजानासि साध्वी साधुव्रते स्थिता ॥ २२ ॥ युधिष्ठिर बोले— कृष्णे! तुमने भली बात कही, इसमें कल्याण ही भरा है। क्यों न हो, तुम ऊँचे कुलमें उत्पन्न जो हुई हो! भामिनि! तुम्हें पापका रंचमात्र भी ज्ञान नहीं है। तुम साध्वी हो और उत्तम व्रतके पालनमें तत्पर रहती हो ॥ २२ ॥