भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2230

यदि ते दारुभिः कृत्यं बहिर्वृक्षान्निगृह्यताम् ॥ १९ ॥
‘बल्लव! क्या तुम ईंधनके लिये वृक्षकी ओर देखते हो? यदि रसोईके लिये सूखी लकड़ी चाहिये, तो बाहर जाकर वृक्षसे ले लो’ ॥ १९ ॥
(यस्य चार्द्रस्य वृक्षस्य शीतच्छायां समाश्रयेत् ।
न तस्य पर्णं द्रुह्येत पूर्ववृत्तमनुस्मरन् ॥

‘जिस हरे-भरे वृक्षकी शीतल छायाका आश्रय लेकर रहा जाय, उसके किसी एक पत्तेसे भी द्रोह नहीं करना चाहिये। उसके पहलेके उपकारोंको सदा याद रखकर उसकी रक्षा करनी चाहिये’ ।
इङ्गितज्ञः स तु भ्रातुस्तूष्णीमासीद् वृकोदरः ॥
भीमस्य तु समारम्भं दृष्ट्वा राज्ञश्च चेष्टितम् ।
द्रौपद्यभ्यधिकं क्रुद्धा प्रारुदत् सा पुनः पुनः ॥
कीचकेनानुगमनात् कृष्णा ताम्रायतेक्षणा ।)

तब भाईके संकेतको समझनेवाले भीमसेन उस समय चुप हो गये। भीमके उस क्रोधको तथा राजा युधिष्ठिरकी शान्तिपूर्ण चेष्टाको देखकर द्रौपदी अधिक क्रुद्ध हो उठी। कीचकके पीछा करनेसे कृष्णाकी आँखें रोषसे लाल हो रही थीं। वह खीझके कारण बार-बार रोने लगी।
सा सभाद्वारमासाद्य रुदती मत्स्यमब्रवीत् ।
अवेक्षमाणा सुश्रोणी पतींस्तान् दीनचेतसः ॥ २० ॥

इधर सुन्दर कटिप्रान्तवाली द्रौपदी राजसभाके द्वारपर आकर अपने दीन हृदयवाले पतियोंकी ओर देखती हुई मत्स्यनरेशसे बोली ॥ २० ॥
आकारमभिरक्षन्ती प्रतिज्ञाधर्मसंहिता ।
दह्यमानेव रौद्रेण चक्षुषा द्रुपदात्मजा ॥ २१ ॥

उस समय वह प्रतिज्ञारूप धर्मसे आबद्ध होनेके कारण अपने स्वरूपको छिपा रही थी; किंतु उसके नेत्र मानो जला रहे हों, इस प्रकार भयंकर हो उठे थे ॥ २१ ॥

(द्रौपद्युवाच
प्रजारक्षणशीलानां राज्ञां ह्यमिततेजसाम् ।
कार्यं हि पालनं नित्यं धर्मे सत्ये च तिष्ठताम् ॥
स्वप्रजायां प्रजायां च विशेषं नाधिगच्छताम् ।

**द्रौपदीने कहा—**जों स्वभावसे ही प्रजाजनोंकी रक्षामें लगे हुए हैं, सदा धर्म और सत्यके मार्गमें स्थित हैं तथा प्रजा और अपनी संतानमें कोई अन्तर नहीं समझते, उन अमिततेजस्वी राजाओंको चाहिये कि वे सदा आश्रितजनोंका पालन एवं संरक्षण करें।
प्रियेष्वपि च द्वेष्येषु समत्वं ये समाश्रिताः ॥