महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2232, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकार्याकार्यविशेषज्ञाः कामकारेण पार्थिव । प्रजासु किल्बिषं कृत्वा नरकं यान्त्यधोमुखाः ॥ परंतु राजन्! जो राजा कर्तव्य और अकर्तव्यके अन्तरको जानते हुए भी स्वेच्छाचारितावश प्रजावर्गके साथ पापाचार करते हैं, वे अधोमुख हो नरकमें जाते हैं।
नैव यज्ञैर्न वा दानैर्न गुरोरुपसेवया । प्राप्नुवन्ति तथा धर्मं यथा कार्यानुपालनात् ॥ राजालोग यज्ञ, दान अथवा गुरुसेवनसे भी वैसा धर्म (पुण्य) नहीं पाते हैं, जैसा कि अपने कर्तव्यका ठीक-ठीक पालन करनेसे प्राप्त करते हैं।
क्रियायामक्रियायां च प्रापणे पुण्यपापयोः ॥ प्रजायां सृज्यमानायां पुरा ह्येतदुदाहृतम् । एतद् वो मानुषाः सम्यक् कार्यं द्वन्द्वतया भुवि । अस्मिन् सुनीते दुर्नीते लभते कर्मजं फलम् ॥ पूर्वकालमें सृष्टिकी रचनाके समय ब्रह्माजीने क्रिया करने और न करनेकी स्थितिमें पुण्य और पापकी प्राप्तिके विषयमें इस प्रकार कहा था—'मनुष्यो! तुमलोगोंको इस पृथ्वीलोकमें द्वन्द्वरूपमें प्राप्त धर्म और अधर्मके विषयमें भलीभाँति समझकर कर्म करना चाहिये; क्योंकि अच्छी या बुरी जैसी नीयतसे काम किया जाता है, वैसा ही कर्मजनित फल मिलता है।
कल्याणकारी कल्याणं पापकारी च पापकम् । तेन गच्छति संसर्गं स्वर्गाय नरकाय वा ॥ 'कल्याणकारी मनुष्य कल्याणका और पापाचारी पुरुष पापके फलस्वरूप दुःखका भागी होता है। जो इनके संसर्गमें आता है, वह भी (कर्मानुसार) स्वर्ग या नरकमें जाता है।
सुकृतं दुष्कृतं वापि कृत्वा मोहेन मानवः । पश्चात्तापेन तप्येत स्वबुद्ध्या मरणं गतः ॥ 'मनुष्य मोहपूर्वक सत्कर्म या दुष्कर्म करके मृत्युके बाद भी मन-ही-मन पश्चात्ताप करता रहता है' ॥
एवमुक्त्वा परं वाक्यं विससर्ज शतक्रतुम् । शक्रोऽप्यापृच्छ्य ब्रह्माणं देवराज्यमपालयत् ॥ इस प्रकार उत्तम वचन कहकर ब्रह्माजीने इन्द्रको विदा कर दिया। इन्द्र भी ब्रह्माजीसे पूछकर देवलोकमें आये और देवसाम्राज्यका पालन करने लगे।
यथोक्तं देवदेवेन ब्रह्मणा परमेष्ठिना । तथा त्वमपि राजेन्द्र कार्याकार्ये स्थिरो भव ॥ राजेन्द्र! देवाधिदेव परमेष्ठी ब्रह्माजीने जैसा उपदेश दिया है, उसके अनुसार आप भी कर्तव्य और अकर्तव्यके निर्णयमें दृढ़तापूर्वक लगे रहिये।