महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वात्रिंशद् दशना यस्याः श्वेता मांसनिबन्धनाः ।
स्निग्धाश्च मृदवः केशाः सैषा नार्हति पद्धधम् ॥
जिसके बत्तीसों दाँत मसूड़ोंमें दृढ़तापूर्वक आबद्ध और उज्ज्वल हैं, जिसके केश चिकने और कोमल हैं, वैसी यह नारी लात मारने योग्य कदापि नहीं है।
पद्मं चक्रं ध्वजं शङ्खं प्रासादो मकरस्तथा ।
यस्याः पाणितले सन्ति सैषा नार्हति पद्धधम् ॥
जिसकी हथेलीमें कमल, चक्र, ध्वजा, शंख, मन्दिर और मगरके चिह्न हैं, वह शुभलक्षणा नारी पैरोंसे ठुकरायी जाय, यह कदापि उचित नहीं है।
आवर्ताः खलु चत्वारः सर्वे चैव प्रदक्षिणाः ।
समं गात्रं शुभं स्निग्धं यस्य नार्हति पद्धधम् ॥
जिसके शरीरमें चार आवर्त हैं और वे सबके सब प्रदक्षिणभावसे सुशोभित हैं, जिसके अङ्ग समान (सुडौल), शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और स्निग्ध हैं, वह लात मारनेयोग्य नहीं है।
अच्छिद्रहस्तपादा च अच्छिद्रदशना च या ।
कन्या कमलपत्राक्षी कथमर्हति पद्धधम् ॥
जिसके हाथों, पैरों और दाँतोंमें छिद्र नहीं दिखायी देते हैं, वह कमलदललोचना कन्या पैरोंसे ठोकर मारने योग्य कैसे हो सकती है?।
सेयं लक्षणसम्पन्ना पूर्णचन्द्रनिभानना ।
सुरूपिणी सुवदना नेयं योग्या पदा वधम् ॥
यह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न है। इसका मुख पूर्णचन्द्रके समान मनोहर है। यह सुन्दर रूपवाली सुमुखी नारी पैरोंसे ठुकराने योग्य नहीं है।
देवदेवीव सुभगा शक्रदेवीव शोभना ।
अप्सरा इव सौरूप्यान्नेयं योग्या पदा वधम् ॥)
यह देवांगनाके समान सौभाग्यशालिनी, इन्द्राणीके समान शोभासम्पन्न तथा अप्सराके समान सुन्दर रूप धारण करनेवाली है। यह लात मारनेयोग्य कदापि नहीं है।
न हीदृशी मनुष्येषु सुलभा वरवर्णिनी ।
नारी सर्वानवद्याङ्गी देवीं मन्यामहे वयम् ॥ ३८ ॥
मनुष्य-जातिमें तो ऐसी सती-साध्वी और सुन्दरी स्त्री सुलभ ही नहीं होती। इसके सम्पूर्ण अंग निर्दोष हैं। हम तो इसे मानवी नहीं; देवी मानते हैं ॥ ३८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं सम्पूजयन्तस्ते कृष्णां प्रेक्ष्य सभासदः ।
युधिष्ठिरस्य कोपात् तु ललाटे स्वेद आगमत् ॥ ३९ ॥