भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

द्वात्रिंशद् दशना यस्याः श्वेता मांसनिबन्धनाः ।
स्निग्धाश्च मृदवः केशाः सैषा नार्हति पद्धधम् ॥
जिसके बत्तीसों दाँत मसूड़ोंमें दृढ़तापूर्वक आबद्ध और उज्ज्वल हैं, जिसके केश चिकने और कोमल हैं, वैसी यह नारी लात मारने योग्य कदापि नहीं है।
पद्मं चक्रं ध्वजं शङ्खं प्रासादो मकरस्तथा ।
यस्याः पाणितले सन्ति सैषा नार्हति पद्धधम् ॥
जिसकी हथेलीमें कमल, चक्र, ध्वजा, शंख, मन्दिर और मगरके चिह्न हैं, वह शुभलक्षणा नारी पैरोंसे ठुकरायी जाय, यह कदापि उचित नहीं है।
आवर्ताः खलु चत्वारः सर्वे चैव प्रदक्षिणाः ।
समं गात्रं शुभं स्निग्धं यस्य नार्हति पद्धधम् ॥
जिसके शरीरमें चार आवर्त हैं और वे सबके सब प्रदक्षिणभावसे सुशोभित हैं, जिसके अङ्ग समान (सुडौल), शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और स्निग्ध हैं, वह लात मारनेयोग्य नहीं है।
अच्छिद्रहस्तपादा च अच्छिद्रदशना च या ।
कन्या कमलपत्राक्षी कथमर्हति पद्धधम् ॥
जिसके हाथों, पैरों और दाँतोंमें छिद्र नहीं दिखायी देते हैं, वह कमलदललोचना कन्या पैरोंसे ठोकर मारने योग्य कैसे हो सकती है?।
सेयं लक्षणसम्पन्ना पूर्णचन्द्रनिभानना ।
सुरूपिणी सुवदना नेयं योग्या पदा वधम् ॥
यह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न है। इसका मुख पूर्णचन्द्रके समान मनोहर है। यह सुन्दर रूपवाली सुमुखी नारी पैरोंसे ठुकराने योग्य नहीं है।
देवदेवीव सुभगा शक्रदेवीव शोभना ।
अप्सरा इव सौरूप्यान्नेयं योग्या पदा वधम् ॥)
यह देवांगनाके समान सौभाग्यशालिनी, इन्द्राणीके समान शोभासम्पन्न तथा अप्सराके समान सुन्दर रूप धारण करनेवाली है। यह लात मारनेयोग्य कदापि नहीं है।
न हीदृशी मनुष्येषु सुलभा वरवर्णिनी ।
नारी सर्वानवद्याङ्गी देवीं मन्यामहे वयम् ॥ ३८ ॥
मनुष्य-जातिमें तो ऐसी सती-साध्वी और सुन्दरी स्त्री सुलभ ही नहीं होती। इसके सम्पूर्ण अंग निर्दोष हैं। हम तो इसे मानवी नहीं; देवी मानते हैं ॥ ३८ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं सम्पूजयन्तस्ते कृष्णां प्रेक्ष्य सभासदः ।
युधिष्ठिरस्य कोपात् तु ललाटे स्वेद आगमत् ॥ ३९ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! जब इस प्रकार द्रौपदीको देखकर सभासद् उसकी प्रशंसा कर रहे थे, उस समय कीचकके प्रति क्रोध होनेके कारण युधिष्ठिरके ललाटमें पसीना आ गया ।। ३९ ।।
(सा विनिःश्वस्य सुश्रोणी भूमावन्तर्मुखी स्थिता ।
तूष्णीमासीत् तदा दृष्ट्वा विवक्षन्तं युधिष्ठिरम् ॥)

तदनन्तर सुन्दरी द्रौपदी लंबी साँस खींचकर नीचा मुख किये भूमिपर खड़ी हो गयी और राजा युधिष्ठिरको कुछ कहनेके लिये उद्यत देख वह स्वयं मौन रह गयी।
अथाब्रवीद् राजपुत्रीं कौरव्यो महिषीं प्रियाम् ।
गच्छ सैरन्ध्रि मात्र स्थाः सुदेष्णाया निवेशनम् ॥ ४० ॥

तब उन कुरुनन्दनने अपनी प्यारी रानीसे इस प्रकार कहा—'सैरन्ध्री! अब तू यहाँ न ठहर। रानी सुदेष्णाके महलमें चली जा ।। ४० ।।
भर्तारमनुरुन्धन्त्यः क्लिश्यन्ते वीरपत्नयः ।
शुश्रूषया क्लिश्यमानाः पतिलोकं जयन्त्युत ॥ ४१ ॥

'पतिका अनुसरण करनेवाली वीरपत्नयाँ सब क्लेश चुपचाप सहन कर लेती हैं। जो पतिसेवापूर्वक क्लेश उठाती हैं, वे साध्वी देवियाँ पतिलोकपर विजय पा लेती हैं ।। ४१ ।।
मन्ये न कालं क्रोधस्य पश्यन्ति पतयस्तव ।
तेन त्वां नाभिधावन्ति गन्धर्वाः सूर्यवर्चसः ॥ ४२ ॥

'मैं समझता हूँ, तुम्हारे सूर्यके समान तेजस्वी पति गन्धर्वगण अभी क्रोध करनेका अवसर नहीं देखते; इसीलिये तुम्हारे पास दौड़कर नहीं आ रहे हैं ।। ४२ ।।
(श्रूयन्तां ते सुकेशान्ते मोक्षधर्माश्रयाः कथाः ।
यथा धर्मः कुलस्त्रीणां दृष्टो धर्मानुरोधनात् ।।

'सुन्दर केशप्रान्तवाली सैरन्ध्री! तुम मोक्षधर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली बातें सुनो। धर्मशास्त्रके अनुसार कुलवती स्त्रियोंका धर्म इस प्रकार देखा गया है।
नास्ति कश्चित् स्त्रिया यज्ञो न श्राद्धं नाप्युपोषणम् ।
या च भर्तरि शुश्रूषा सा स्वर्गायाभिजायते ।।

'स्त्रीके लिये न तो कोई यज्ञ है, न श्राद्ध है और न उपवासका ही विधान है। स्त्रियोंके द्वारा जो पतिकी सेवा होती है, वही उन्हें स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाली है।
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
पुत्रस्तु स्थविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥

'कुमारावस्थामें पिता, युवावस्थामें पति और वृद्धावस्थामें पुत्र नारीकी रक्षा करता है। स्त्रीको कभी स्वतन्त्र नहीं रहना चाहिये।
भर्तॄन् प्रति तथा पत्न्यो न क्रुध्यन्ति कदाचन ।
बहुभिश्च परिक्लेशैरवज्ञाताश्च शत्रुभिः ॥

'पतिव्रता स्त्रियाँ नाना प्रकारके क्लेश सहकर तथा शत्रुओंद्वारा अपमानित होकर भी अपने पतियोंपर कभी क्रोध नहीं करतीं। अनन्यभावशुश्रूषाः पुण्यलोकं व्रजन्त्युत । न क्रुद्धान् प्रति यायाद् वै पतींस्ते वृत्रहा अपि ॥ 'इस प्रकार अनन्यभावसे पतिकी शुश्रूषा करनेवाली स्त्रियाँ पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेती हैं। सैरन्ध्री! तुम्हारे पतियोंके कुपित होनेपर तो वृत्रहन्ता इन्द्र भी युद्धमें उनका सामना नहीं कर सकते। यदि ते समयः कश्चित् कृतो ह्यायतलोचने । तं स्मरस्व क्षमाशीले क्षमा धर्मो ह्यनुत्तमः ॥ 'विशाललोचने! यदि उनके साथ तेरी कोई शर्त हुई हो तो उसे याद कर ले। क्षमाशीले! क्षमा सबसे उत्तम धर्म है। क्षमा सत्यं क्षमा दानं क्षमा धर्मः क्षमा तपः । क्षमावतामयं लोकः परलोकः क्षमावताम् ॥ द्व्यंशिनो द्वादशाङ्गस्य चतुर्विंशतिपर्वणः । कः षष्टित्रिशतारस्य मासोनस्याक्षमी भवेत् ॥ 'क्षमा सत्य है, क्षमा दान है, क्षमा धर्म है और क्षमा ही तप है। क्षमाशील मनुष्योंके लिये ही यह लोक और परलोक है। जिसके दो (उत्तरायण एवं दक्षिणायन) अंश हैं, बारह (मास) अंग हैं, चौबीस (पक्ष) पर्व हैं और तीन सौ साठ (दिन) अरे हैं, उस कालचक्रके पूर्ण होनेमें यदि एक मासकी ही कमी रह गयी हो; तो कौन उसकी प्रतीक्षा न करके क्षमाका त्याग कर सकता है?'।

वैशम्पायन उवाच

इत्येवमुक्ते तिष्ठन्तीं पुनरेवाह धर्मराट् ।) **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इतना कहनेपर भी जब द्रौपदी वहाँ खड़ी ही रह गयी, तब धर्मराजने पुनः उससे कहा—। अकालज्ञासि सैरन्ध्रि शैलूषीव विरोदिषि । विघ्नं करोषि मत्स्यानां दीव्यतां राजसंसदि ॥ ४३ ॥ 'सैरन्ध्री! तू अवसरको नहीं पहचानती; इसीलिये नटीकी भाँति राजसभामें रो रही है और द्यूतक्रीड़ामें लगे हुए मत्स्यराजकुमारोंके खेलमें विघ्न डालती है ॥ गच्छ सैरन्ध्रि गन्धर्वाः करिष्यन्ति तव प्रियम् । व्यपनेष्यन्ति ते दुःखं येन ते विप्रियं कृतम् ॥ ४४ ॥ 'सैरन्ध्री! जाओ, गन्धर्व तुम्हारा प्रिय करेंगे। जिसने तुम्हारा अपकार किया है, उसे मारकर तुम्हारा दुःख दूर कर देंगे' ॥ ४४ ॥

सैरन्ध्र्युवाच

अतीव तेषां घृणिनामर्थेऽहं धर्मचारिणी ।
तस्य तस्यैव ते वध्या येषां ज्येष्ठोऽक्षदेविता ॥ ४५ ॥
सैरन्ध्री बोली— जिनके बड़े भाई सदा जूआ खेला करते हैं, उन दयालु गन्धर्वोंके लिये मैं अत्यन्त धर्मपरायणा रहूँगी। मेरा अपकार करनेवाले दुरात्मा उन सबके लिये वध्य हों ॥ ४५ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा प्राद्रवत् कृष्णा सुदेष्णाया निवेशनम् ।
केशान् मुक्त्वा च सुश्रोणी संरम्भाल्लोहितेक्षणा ॥ ४६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! यों कहकर सुन्दर कटिप्रान्तवाली द्रौपदी तीव्र गतिसे रानी सुदेष्णाके महलको चली गयी। उसके केश खुले हुए थे और क्रोधसे उसकी आँखें लाल हो रही थीं ॥ ४६ ॥
शुशुभे वदनं तस्या रुदत्याः सुचिरं तदा ।
मेघलेखाविनिर्मुक्तं दिवीव शशिमण्डलम् ॥ ४७ ॥
उस समय रोती हुई द्रौपदीका मुख इस प्रकार सुशोभित हो रहा था, मानो आकाशमें मेघमालाके आवरणसे मुक्त चन्द्रबिम्ब शोभा पा रहा हो ॥ ४७ ॥
(पांसुकुण्ठितसर्वाङ्गी गजराजवधूरिव ।
प्रतस्थे नागनासोरूर्भर्तुराज्ञाय शासनम् ॥
समस्त अंगोंमें धूलिसे धूसरित गजराजवधूकी भाँति शोभा पानेवाली तथा हाथीकी सूँड़के समान जाँघोंवाली द्रौपदी स्वामीकी आज्ञा शिरोधार्य करके राजसभासे अन्तःपुरमें चली गयी।
विमुक्ता मृगशावाक्षी निरन्तरपयोधरा ।
प्रभा नक्षत्रराजस्य कालमेघैरिवावृता ॥
उसके स्तन एक-दूसरेसे सटे हुए थे, तथा नेत्र मृगशावकोंके समान चंचल हो रहे थे। वह कीचकके हाथसे छूटकर शोक और दुःखसे इस प्रकार मलिन हो रही थी, मानो चन्द्रमाकी प्रभा वर्षाकालके मेघोंसे आच्छादित हो गयी हो।
यस्या ह्यर्थे पाण्डवेयास्त्यजेयुरपि जीवितम् ।
तां ते दृष्ट्वा तथा कृष्णां क्षमिणो धर्मचारिणः ॥
समयं नातिवर्तन्ते वेलामिव महोदधिः ॥)
जिसके लिये समस्त पाण्डव अपने प्राणतक दे सकते थे, उसी कृष्णाको उस दशामें देखकर भी धर्मात्मा पाण्डव क्षमा धारण किये बैठे थे। जैसे समुद्र अपने तटकी सीमाका

उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार वे अज्ञातवासके लिये स्वीकृत समयका अतिक्रमण नहीं कर रहे थे।

सुदेष्णोवाच

कस्त्वावधीद् वरारोहे कस्माद् रोदिषि शोभने । कस्याद्य न सुखं भद्रे केन ते विप्रियं कृतम् ॥ ४८ ॥ **सुदेष्णाने पूछा—**वरारोहे! तुम्हें किसने मारा है? शोभने! तू क्यों रोती है? भद्रे! आज किसका सुख समाप्त हो गया? किसने तुम्हारा अपराध किया है? ४८ ॥ (किमिदं पद्मसंकाशं सुदन्तोष्ठाक्षिनासिकम् । रुदन्त्या अवमृष्टांसं पूर्णेन्दुसमवर्चसम् ॥ कमलके समान कमनीय, सुन्दर दाँत, ओठ, नेत्र और नासिकासे सुशोभित तथा पूर्णचन्द्रके समान कान्तिमान् तुम्हारा यह मनोहर मुख ऐसा (मलिन) क्यों हो रहा है? तुम रोती हुई अपने मुखपर बहे हुए आँसुओंको पोंछ रही हो। बिम्बोष्ठं कृष्णताराभ्यामत्यन्तरुचिरप्रभम् । नयनाभ्यामजिह्माभ्यां मुखं ते मुञ्चते जलम् ॥ काली पुतलीवाले सरल नेत्रोंसे सुशोभित, बिम्ब-फलके समान अरुण अधरोंसे उपलक्षित और अत्यन्त मनोहर प्रभासे प्रकाशित तुम्हारा मुख इस समय आँसू क्यों गिरा रहा है?।

वैशम्पायन उवाच

तीं निःश्वस्याब्रवीत् कृष्णा जानन्ती नाम पृच्छसि । भ्रात्रे त्वं मामनुप्रेष्य किमेवं त्वं विकत्थसे ॥) **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब कृष्णाने लंबी साँसे खींचकर कहा—‘तुम सब कुछ जानती हुई भी मुझसे क्या पूछ रही हो? स्वयं ही मुझे अपने भाईके पास भेजकर अब इस प्रकारकी बातें क्यों बना रही हो?’।

द्रौपद्युवाच

कीचको मावधीत् तत्र सुराहारीं गतां तव । सभायां पश्यतो राज्ञो यथैव विजने वने ॥ ४९ ॥ **द्रौपदी फिर बोली—**मैं तुम्हारे लिये मदिरा लाने गयी थी। वहाँ कीचकने राजसभामें महाराजके देखते-देखते मुझपर प्रहार किया है; ठीक उसी तरह, जैसे कोई निर्जन वनमें किसी असहाय अबलापर आघात करता हो ॥ ४९ ॥

सुदेष्णोवाच

घातयामि सुकेशान्ते कीचकं यदि मन्यसे ।

योऽसौ त्वां कामसम्मत्तो दुर्लभामवमन्यते ।। ५० ।। **सुदेष्णाने कहा—**सुन्दर लटोंवाली सुन्दरी! यदि तुम्हारी सम्मति हो, तो मैं कीचकको मरवा डालूँ; जो कामसे उन्मत्त होकर तुझ-जैसी दुर्लभ देवीका अपमान कर रहा है ।। ५० ।।

सैरन्ध्र्युवाच

अन्ये चैनं वधिष्यन्ति येषामागः करोति सः । मन्ये चैवाद्य सुव्यक्तं यमलोकं गमिष्यति ।। ५१ ।। **सैरन्ध्री बोली—**महारानी! उसे दूसरे ही लोग मार डालेंगे, जिनका कि अपराध वह कर रहा है। मैं तो समझती हूँ, अब वह निश्चय ही यमलोककी यात्रा करेगा ।। ५१ ।। (भ्रातुः प्रयच्छ त्वरिता जीवश्राद्धं त्वमद्य वै । सुदृष्टं कुरु वै चैनं नासून् मन्ये धरिष्यति ।। रानी! आज तुम अपने भाईके लिये शीघ्र ही जीवित श्राद्ध कर लो। उसके लिये आवश्यक दान दे लो। साथ ही उसे आँख भरकर अच्छी तरह देख लो। मेरा विश्वास है कि अब उसके प्राण नहीं रहेंगे। तेषां हि मम भर्तॄणां पञ्चानां धर्मचारिणाम् । एको दुर्धर्षणोऽत्यर्थं बले चाप्रतिमो भुवि ।। निर्मनुष्यमिमं लोकं कुर्यात् क्रुद्धो निशामिमाम् । न च संक्रुध्यते तावद् गन्धर्वः कामरूपधृक् ।। मेरे पाँच धर्मात्मा पतियोंमेंसे एक अत्यन्त दुःसह एवं अमर्षशील वीर हैं। भूतलपर बलमें उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। वे कुपित होनेपर इस रातमें ही इस संसारको मनुष्योंसे शून्य कर सकते हैं। परंतु इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वे गन्धर्व न जाने क्यों अभीतक क्रोध नहीं कर रहे हैं।

वैशम्पायन उवाच

सुदेष्णामेवमुक्त्वा तु सैरन्ध्री दुःखमोहिता । कीचकस्य वधार्थाय व्रतदीक्षामुपागमत् ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! रानी सुदेष्णासे ऐसा कहकर दुःखसे मोहित हुई सैरन्ध्रीने कीचकके वधके लिये व्रतकी दीक्षा ग्रहण की। अभ्यर्थिता च नारीभिर्मानिता च सुदेष्णया । न च स्नाति न चाश्नाति न पांसून् परिमार्जति ।। दूसरी स्त्रियोंने उससे बहुत प्रार्थना की। रानी सुदेष्णाने भी उसे बहुत मनाया; तथापि न वह स्नान करती, न भोजन करती और न अपने शरीरकी धूल ही झाड़ती थी। रुधिरक्लिन्नवदना बभूव रुदितेक्षणा ।।

तां तथा शोकसंतप्तां दृष्ट्वा प्ररुदितां स्त्रियः । कीचकस्य वधं सर्वा मनोभिश्च शशंसिरे ॥ उसका मुँह रक्तसे भींगा हुआ था, आँखोंमें रुलाईके आँसू भरे हुए थे। उसे इस प्रकार शोकसे संतप्त होकर रोती देख सब स्त्रियाँ मन-ही-मन कीचकके वधकी इच्छा करने लगीं।

जनमेजय उवाच

अहो दुःखतरं प्राप्ता कीचकेन पदा हता । पतिव्रता महाभागा द्रौपदी योषितां वरा ॥ जनमेजय बोले—विप्रवर! संसारकी युवतियोंमें श्रेष्ठ एवं पतिव्रता महाभागा द्रौपदीको कीचकने लात मार दी; इससे वह महान् दुःखमें डूब गयी। अहो! यह कितने कष्टकी बात है।

दुःशलां मानयन्ती या भर्तॄणां भगिनीं शुभाम् । नाशपत् सिन्धुराजं तं बलात्कारेण वाहिता ॥ जिस समय सिन्धुराज जयद्रथने बलपूर्वक उसका अपहरण किया था, उस समय उसने अपने पतियोंकी बहिन दुःशलाका सम्मान करते हुए वह कष्ट सह लिया और शुभलक्षणा सिन्धुराजको शाप नहीं दिया।

किमर्थं धर्षणं प्राप्ता कीचकेन दुरात्मना । नाशपत् तं महाभागा कृष्णा पादेन ताडिता ॥ परंतु जब दुरात्मा कीचकने उसका तिरस्कार किया और उसे लातसे मारा, उस समय महाभागा कृष्णाने उस दुष्टको शाप क्यों नहीं दे दिया?।

तेजोराशिरियं देवी धर्मज्ञा सत्यवादिनी । केशपक्षे परामृष्टा मर्षयिष्यत्यशक्तवत् ॥ नैतत् कारणमल्पं हि श्रोतुकामोऽस्मि सत्तम । कृष्णायास्तु परिक्लेशान्मनो मे दूयते भृशम् ॥ देवी द्रौपदी तेजकी राशि थी। वह धर्मज्ञा और सत्यवादिनी थी। उसके-जैसी तेजस्विनी स्त्री अपने केश पकड़ लिये जानेपर असमर्थकी भाँति चुपचाप सह लेगी, यह सम्भव नहीं है। यदि उसने सह लिया तो इसका कोई छोटा कारण नहीं होगा। साधुशिरोमणे! मैं वह कारण सुनना चाहता हूँ। कृष्णाके क्लेशकी बात सुनकर मेरा मन अत्यन्त व्यथित हो रहा है।

कस्य वंशे समुद्भूतः स च दुर्ललितो मुने । बलोन्मत्तः कथं चासीच्छ्यालो मात्स्यस्य कीचकः ॥ मुने! मत्स्यराजका साला दुष्ट कीचक किसके कुलमें उत्पन्न हुआ था? और वह बलसे उन्मत्त क्यों हो गया था? ।

वैशम्पायन उवाच

त्वदुक्तोऽयमनुप्रश्नः कुरूणां कीर्तिवर्धन । एतत् सर्वं तथा वक्ष्ये विस्तरेणैव पार्थिव ॥ **वैशम्पायनजीने कहा—**कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले नरेश! तुम्हारा उठाया हुआ यह प्रश्न ठीक है। मैं यह सब विस्तारपूर्वक बताऊँगा।

ब्राह्मण्यां क्षत्रियाज्जातः सूतो भवति पार्थिव । प्रातिलोम्येन जातानां स ह्येको द्विज एव तु ॥ राजन्! क्षत्रिय पिता और ब्राह्मणी मातासे उत्पन्न हुआ बालक ‘सूत’ कहलाता है। प्रतिलोमसंकर जातियोंमें अकेली यह सूत जाति ही द्विज कही गयी है।

रथकारमितीमं हि क्रियायुक्तं द्विजन्मनाम् । क्षत्रियादवरं वैश्याद् विशिष्टमिति चक्षते ॥ द्विजोचित कर्मोंसे युक्त उस सूतको ही रथकार भी कहते हैं। इसे क्षत्रियसे हीन और वैश्यसे श्रेष्ठ बताते हैं।

सह सूतेन सम्बन्धः कृतपूर्वो नरेश्वरैः । तथापि तैर्महीपाल राजशब्दो न लभ्यते ॥ राजन्! पहलेके नरेशोंने सूतजातिके साथ भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया है, परंतु उन्हें राजाकी उपाधि नहीं प्राप्त होती थी।

तेषां तु सूतविषयः सूतानां नामतः कृतः । उपजीव्य च यत् क्षत्रं लब्धं सूतेन तत् पुरा ॥ उनके लिये सूतोंके नामसे सूतराज्य ही नियत कर दिया गया था। वह राज्य सूतजातिके एक पुरुषने किसी क्षत्रियकी सेवा करके ही प्राप्त किया था।

सूतानामधिपो राजा केकयो नाम विश्रुतः ॥ राजकन्यासमुद्भूतः सारथ्येऽनुपमोऽभवत् । सुप्रसिद्ध केकय नामक राजा सूतोंके ही अधिपति थे। उनका जन्म किसी क्षत्रियकन्याके गर्भसे हुआ था। वे सारथिके कर्ममें अनुपम थे।

पुत्रास्तस्य कुरुश्रेष्ठ मालव्यां जज्ञिरे तदा ॥ तेषामतिबलो ज्येष्ठः कीचकः सर्वजित् प्रभो । कुरुश्रेष्ठ! उनके मालवीके गर्भसे कई पुत्र उत्पन्न हुए। प्रभो! उन पुत्रोंमें कीचक ही सबसे बड़ा था। वह अत्यन्त बलवान् और सर्वविजयी योद्धा था।

द्वितीयायां तु मालव्यां चित्रा ह्यवरजाभवत् । तां सुदेष्णेति वै प्राहुर्विराटमहिषीं प्रियाम् ॥ राजा केकयकी दूसरी रानी भी मालवकन्या ही थी। उसके गर्भसे चित्रा नामवाली कन्या उत्पन्न हुई, जो समस्त कीचकबन्धुओंकी छोटी बहिन थी। उसीको सुदेष्णा भी कहते

हैं। वही आगे चलकर महाराज विराटकी प्यारी पटरानी हुई। तां विराटस्य मत्स्यस्य केकयः प्रददौ मुदा । सुरथायां मृतायां तु कौसल्यां श्वेतमातरि ॥ विराटकी बड़ी रानी कोसलदेशकी राजकुमारी सुरथा, जो श्वेतकी जननी थी, उसकी मृत्यु हो जानेपर केकय-नरेशने अपनी कन्या सुदेष्णाका विवाह मत्स्यराज विराटके साथ प्रसन्नतापूर्वक कर दिया। सुदेष्णां महिषीं लब्ध्वा राजा दुःखमपानुदत् ॥ उत्तरं चोत्तरां चैव विराटात् पृथिवीपते । सुदेष्णा सुषुवे देवी कैकेयी कुलवृद्धये ॥ सुदेष्णाको महारानीके रूपमें पाकर राजा विराटका दुःख दूर हो गया। जनमेजय! केकयकुमारी रानी सुदेष्णाने राजा विराटसे अपने कुलकी वृद्धिके लिये उत्तर और उत्तरा नामक दो संतानोंको उत्पन्न किया। मातृष्वसृसुतां राजन् कीचकस्तामनिन्दिताम् । सदा परिचरन् प्रीत्या विराटे न्यवसत् सुखी ॥ राजन्! कीचक अपनी मौसीकी बेटी सती-साध्वी सुदेष्णाकी प्रेमपूर्वक परिचर्या करता हुआ विराटके यहाँ सुखपूर्वक रहने लगा। भ्रातरस्तस्य विक्रान्ताः सर्वे च तमनुव्रताः । विराटस्यैव संहृष्टा बलं कोशं च वर्धयन् ॥ उसके सभी पराक्रमी भाई कीचकके ही प्रेमी भक्त थे; अतः वे भी विराटके ही बल और कोषको बढ़ाते हुए प्रसन्नतापूर्वक वहाँ रहने लगे। कालेया नाम दैतेयाः प्रायशो भुवि विश्रुताः । जज्ञिरे कीचका राजन् बाणो ज्येष्ठस्ततोऽभवत् ॥ स हि सर्वास्त्रसम्पन्नो बलवान् भीमविक्रमः । कीचको नष्टमर्यादो बभूव भयदो नृणाम् । राजन्! कालेय नामक दैत्य ही, जो प्रायः इस भूमण्डलमें विख्यात थे, कीचकोंके रूपमें उत्पन्न हुए थे। कालेयोंमें बाण सबसे बड़ा था। वही सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न, भयंकर पराक्रमी और महाबली कीचक हुआ, जो धर्मकी मर्यादाको तोड़ने और मनुष्योंके भयको बढ़ानेवाला था। तं प्राप्य बलसम्मतं विराटः पृथिवीपतिः ॥ जिगाय सर्वांश्च रिपून् यथेन्द्रो दानवानिव । उस बलोन्मत्त कीचककी सहायता पाकर जैसे इन्द्र दानवोंपर विजय पाते हैं, उसी प्रकार राजा विराटने भी समस्त शत्रुओंपर विजय प्राप्त की। मेखलांश्च त्रिगर्तांश्च दशार्णांश्च कशेरुकान् ।

मालवान् यवनांश्चैव पुलिन्दान् काशिकोसलान् ।
अङ्गान वङ्गान कलिङ्गांश्च तङ्गणान् परतङ्गणान् ।
मलदान् निषधांश्चैव तुण्डिकेरांश्च कोङ्कणान् ॥
करदांश्च निषिद्धांश्च शिवान् दुश्चेल्लिकांस्तथा ।
अन्ये च बहवः शूराः नानाजनपदेश्वराः ।
कीचकेन रणे भग्ना व्यद्रवन्त दिशो दश ॥

मेखल, त्रिगर्त, दशार्ण, कशेरुक, मालव, यवन, पुलिन्द, काशी, कोसल, अंग, वंग, कलिंग, तंगण, परतंगण, मलद, निषध, तुण्डिकेर, कोंकण, करद, निषिद्ध, शिव, दुश्चेल्लिक तथा अन्य नाना जनपदोंके स्वामी अनेक शूरवीर नरेश रणभूमिमें कीचकसे पराजित हो दसों दिशाओंमें भाग गये।

तमेवं वीर्यसम्पन्नं नागायुतबलं रणे ।
विराटस्तत्र सेनायाश्चकार पतिमात्मनः ॥

ऐसे पराक्रमसम्पन्न कीचकको, जो संग्राममें दस हजार हाथियोंका बल रखता था, राजा विराटने अपना सेनापति बना लिया।

विराटभ्रातरश्चैव दश दाशरथोपमाः ।
ते चैनानन्ववर्तन्त कीचकान् बलवत्तरान् ॥

विराटके दस भाई ऐसे थे, जो दशरथनन्दन श्रीरामके समान शक्तिशाली समझे जाते थे। वे भी इन प्रबलतर कीचकबन्धुओंका अनुसरण करने लगे।

एवंविधबलोपेताः कीचकास्ते न तद्विधाः ।
राज्ञः श्याला महात्मानो विराटस्थ हितैषिणः ।

ऐसे बलसम्पन्न कीचक, जो राजा विराटके साले लगते थे, शौर्यमें अपना सानी नहीं रखते थे। वे महामना विराटके बड़े हितैषी थे।

एतत् ते कथितं सर्वं कीचकस्य पराक्रमम् ॥
द्रौपदी न शशापैनं यस्मात् तद् गदतः शृणु ।

जनमेजय! इस प्रकार मैंने तुमसे कीचकके पराक्रमकी सारे बातें बता दीं। अब यह भी सुन लो कि द्रौपदीने उसे शाप क्यों नहीं दिया?।

क्षरतीति तपः क्रोधादृषयो न शपन्ति हि ॥
जानन्ती तद् यथातत्त्वं पाञ्चाली न शशाप तम् ।

क्रोधसे तपस्या नष्ट होती है, इसीलिये ऋषि भी सहसा किसीको शाप नहीं देते हैं। द्रौपदी इस बातको अच्छी तरह जानती थी; इसीलिये उसने उसे शाप नहीं दिया।

क्षमा धर्मः क्षमा दानं क्षमा यज्ञः क्षमा यशः ।
क्षमा सत्यं क्षमा शीलं क्षमा कीर्तिः क्षमा परम् ॥
क्षमा पुण्यं क्षमा तीर्थं क्षमा सर्वमिति श्रुतिः ।

क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् । एतत् सर्वं विजानन्ती सा क्षमामन्वपद्यत ॥ क्षमा धर्म है, क्षमा दान है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा यश है, क्षमा सत्य है, क्षमा शील है, क्षमा कीर्ति है, क्षमा सबसे उत्कृष्ट तत्त्व है, क्षमा पुण्य है, क्षमा तीर्थ है और क्षमा सब कुछ है; ऐसा श्रुतिका कथन है। यह लोक क्षमावानोंका ही है। परलोक भी क्षमावानोंका ही है। द्रौपदी यह सब कुछ जानती थी, इसलिये उसने क्षमाका ही आश्रय लिया। भर्तॄणां मतमाज्ञाय क्षमिणां धर्मचारिणाम् । नाशपत् तं विशालाक्षी सती शक्तापि भारत ॥ भरतनन्दन! क्षमाशील एवं धर्मात्मा पतियोंका मत जानकर विशाल नेत्रोंवाली सती-साध्वी द्रौपदीने समर्थ होते हुए भी कीचकको शाप नहीं दिया। पाण्डवाश्चापि ते सर्वे द्रौपदीं प्रेक्ष्य दुःखिताः । क्रोधाग्निना व्यदह्यन्त तदा कालव्यपेक्षया ॥ समस्त पाण्डव भी द्रौपदीकी दुरवस्था देखकर दुःखी हो समयकी प्रतीक्षा करते हुए क्रोधाग्निमें जलते रहे। अथ भीमो महाबाहुः सूदयिष्यंस्तु कीचकम् । वारितो धर्मपुत्रेण वेलयेव महोदधिः ॥ महाबाहु भीमसेन तो कीचकको तत्काल मार डालनेके लिये उद्यत थे; परंतु जैसे वेला (तटकी सीमा) महासागरके वेगको रोके रहती है, उसी प्रकार धर्मपुत्र युधिष्ठिरने उन्हें रोक दिया। संधार्य मनसा रोषं दिवारात्रं विनिःश्वसन् । महानसे तदा कृच्छ्रात् सुषवाप रजनीं च ताम् ॥) वे मनमें क्रोधको रोककर दिन-रात लंबी साँसें खींचते रहते थे। उस दिन पाकशालामें जाकर वे रातमें बड़े कष्टसे सोये।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीपरिभवे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदीतिरस्कारसम्बन्धी सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९२ श्लोक मिलाकर कुल १४३ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 2247)

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तदशोऽध्यायः

द्रौपदीका भीमसेनके समीप जाना

वैशम्पायन उवाच

सा हता सूतपुत्रेण राजपत्नी यशस्विनी ।
वधं कृष्णा परीप्सन्ती सेनावाहस्य भामिनी ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! सूतपुत्र सेनापति कीचकने जबसे लात मारी थी, तभीसे यशस्विनी राजपत्नी भामिनी द्रौपदी उसके वधकी बात सोचने लगी ॥ १ ॥

जगामावासमेवाथ सा तदा द्रुपदात्मजा ।
कृत्वा शौचं यथान्यायं कृष्णा सा तनुमध्यमा ॥ २ ॥
गात्राणि वाससी चैव प्रक्षाल्य सलिलेन सा ।
चिन्तयामास रुदती तस्य दुःखस्य निर्णयम् ॥ ३ ॥

वह अपने निवासस्थानपर गयी। उस समय सूक्ष्म कटिभागवाली द्रुपदकुमारी कृष्णाने वहाँ यथायोग्य शौच-स्नान करके जलसे अपने शरीर और वस्त्र धोये तथा वह रोती हुई उस दुःखके निवारणका उपाय सोचने लगी— ॥ २-३ ॥

किं करोमि क्व गच्छामि कथं कार्यं भवेन्मम ।
इत्येवं चिन्तयित्वा सा भीमं वै मनसागमत् ॥ ४ ॥

‘क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? कैसे मेरा अभीष्ट कार्य होगा, इस प्रकार चिन्तन करके उसने मन-ही-मन भीमसेनका स्मरण किया ॥ ४ ॥

नान्यः कर्ता ऋते भीमान्ममाद्य मनसः प्रियम् ।
तत उत्थाय रात्रौ सा विहाय शयनं स्वकम् ॥ ५ ॥
प्राद्रवन्नाथमिच्छन्ती कृष्णा नाथवती सती ।
भवनं भीमसेनस्य क्षिप्रमायतलोचना ॥ ६ ॥
दुःखेन महता युक्ता मानसेन मनस्विनी ।

‘भीमसेनके सिवा दूसरा कोई आज मेरे मनको प्रिय लगनेवाला कार्य नहीं कर सकता’—ऐसा निश्चय करके वह विशाल नेत्रोंवाली सती-साध्वी सनाथा कृष्णा रातको अपनी शय्या छोड़कर उठी और अपने नाथ (रक्षक)-से मिलनेकी इच्छा रखकर शीघ्रतापूर्वक भीमसेनके भवनमें गयी। उस समय मनस्विनी द्रौपदी महान् मानसिक दुःखसे पीड़ित थी ॥ ५-६½ ॥

सैरन्ध्र्युवाच

तस्मिञ्जीवति पापिष्ठे सेनावाहे मम द्विषि ॥ ७ ॥

तत् कर्म कृतवानद्य कथं निद्रां निषेवसे । वहाँ पहुँचते ही सैरन्ध्री बोली—आर्यपुत्र! मुझसे द्वेष रखनेवाले उस महापापी सेनापतिके, जिसने मेरे साथ वैसा अपमानजनक बर्ताव किया था, जीते-जी तुम आज नींद कैसे ले रहे हो? ।। ७ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वाथ तां शालां प्रविवेश मनस्विनी ।। ८ ।। यस्यां भीमस्तथा शेते मृगराज इव श्वसन् । वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! ऐसा कहती हुई मनस्विनी द्रौपदीने उस भवनमें प्रवेश किया, जिसमें सिंहकी भाँति साँसें खींचते हुए भीमसेन सो रहे थे ।। तस्या रूपेण सा शाला भीमस्य च महात्मनः ।। ९ ।। सम्मूर्च्छितेव कौरव्य प्रजज्वाल च तेजसा । सा वै महानसं प्राप्य भीमसेनं शुचिस्मिता ।। १० ।। सर्वश्वेतेव माहेयी वने जाता त्रिहायणी । उपातिष्ठत पाञ्चाली वासितेव नरर्षभम् ।। ११ ।। कुरुनन्दन! द्रौपदीके दिव्य रूपसे महात्मा भीमकी वह पाकशाला शोभा-समृद्धिको प्राप्त होकर तेजसे प्रकाशित हो उठी। पवित्र मुसकानवाली द्रौपदी पाक-शालामें पहुँचकर क्रमशः [बक, साँड़ और गजराजके पास जानेवाली] जलमें उत्पन्न हुई बकी, तीन सालकी पार्थिव गौ तथा हथिनीके समान श्रेष्ठ पुरुष भीमसेनके समीप गयीं ।। ९—११ ।। सा लतेव महाशालं फुल्लं गोमतीतीरजम् । परिष्वजत पाञ्चाली मध्यमं पाण्डुनन्दनम् ।। १२ ।। जैसे लता गोमतीके तटपर उत्पन्न एवं खिले हुए ऊँचे शालवृक्षमें लिपट जाती है, उसी प्रकार सती-साध्वी पांचालीने मध्यम* पाण्डव भीमसेनका आलिंगन किया ।। १२ ।। बाहुभ्यां परिरभ्यैनं प्राबोधयदनिन्दिता । सिंहं सुप्तं वने दुर्गे मृगराजवधूरिव ।। १३ ।। उसने उन्हें दोनों भुजाओंसे कसकर जगाया; ठीक वैसे ही, जैसे दुर्गम वनमें सोये हुए सिंहको सिंहिनी जगाती है ।। १३ ।। भीमसेनमुपाश्लिष्यद्धस्तिनीव महागजम् । वीणेव मधुरालापा गान्धारं साधु मूर्छती । अभ्यभाषत पाञ्चाली भीमसेनमनिन्दिता ।। १४ ।। जैसे हथिनी महान् गजराजका आलिंगन करती है, उसी प्रकार निर्दोष पाञ्चालराजकुमारी भीमसेनसे सटकर गान्धार स्वरमें मधुर ध्वनि फैलाती हुई वीणाकी भाँति मीठे वचनोंमें बोली— ।। १४ ।।

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ किं शेषे भीमसेन यथा मृतः । नामृतस्य हि पापीयान् भार्यामालभ्य जीवति ॥ १५ ॥

‘भीमसेन! उठो, उठो, क्यों मुर्देकी तरह सो रहे हो?; क्योंकि (तुम्हारे-जैसे वीर) पुरुषके जीवित रहते हुए उसकी पत्नीका स्पर्श करके कोई महापापी मनुष्य जीवित नहीं रह सकता’ ॥ १५ ॥

स सम्प्रहाय शयनं राजपुत्र्या प्रबोधितः । उपातिष्ठत मेघाभः पर्यङ्के सोपसंग्रहे ॥ १६ ॥ अथाब्रवीद् राजपुत्रीं कौरव्यो महिषीं प्रियाम् । केनास्यर्थेन सम्प्राप्ता त्वरितेव ममान्तिकम् ॥ १७ ॥ न ते प्रकृतिमान् वर्णः कृशा पाण्डुश्च लक्ष्यसे । आचक्ष्व परिशेषेण सर्वं विद्यामहं यथा ॥ १८ ॥

राजकुमारी द्रौपदीके जगानेपर मेघके समान श्याम वर्णवाले कुरुनन्दन भीमसेन तोशक बिछे हुए पलंगपर शयन छोड़कर उठ बैठे और अपनी प्यारी रानीसे बोले—‘देवि! किस कार्यसे तुम इतनी उतावली-सी होकर मेरे पास आयी हो? तुम्हारे शरीरकी कान्ति स्वाभाविक नहीं रह गयी है। तुमपर उदासी छायी है। तुम दुबली और पीली दिखायी देती हो। पूरी बात बताओ, जिससे मैं सब कुछ जान सकूँ’ ॥ १६—१८ ॥

सुखं वा यदि वा दुःखं द्वेष्यं वा यदि वा प्रियम् ।
यथावत् सर्वमाचक्ष्व श्रुत्वा ज्ञास्यामि यत् क्षमम् ॥ १९ ॥
‘तुम्हें सुख हो या दुःख, बुरा हुआ हो या भला, सब बातें ठीक-ठीक कह जाओ। वह सब सुनकर मैं उसके निवारणके लिये उचित उपाय सोचूँगा ।।

अहमेव हि ते कृष्णे विश्वास्यः सर्वकर्मसु ।
अहमापत्सु चापि त्वां मोक्ष्यामि पुनः पुनः ॥ २० ॥
‘कृष्णे! सब कार्योंके लिये मैं ही तुम्हारा विश्वासपात्र हूँ। मैं ही सब प्रकारकी विपत्तियोंमें बार-बार सहायता करके तुम्हें संकटसे मुक्त करता हूँ ॥ २० ॥

शीघ्रमुक्त्वा यथाकामं यत् ते कार्यं विवक्षितम् ।
गच्छ वै शयनायैव पुरा नान्येन बुध्यते ॥ २१ ॥
‘अतः जैसी तुम्हारी रुचि हो और जिस कार्यके लिये कुछ कहना चाहती हो, उसे शीघ्र कहकर पहले ही अपने शयनगृहमें चली जाओ, जिससे दूसरे किसीको इसका पता न चल सके’ ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीभीमसंवादे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदी-भीम-संवादविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥


* नकुल-सहदेव जुड़वें पैदा हुए थे; अतः वे दोनों कनिष्ठ (छोटे) भाई हैं। युधिष्ठिर बड़े हैं। भीमसेन और अर्जुन मध्यम हैं। विराटपर्वके प्रसंगमें अर्जुन पुरुष नहीं रह गये हैं। अतः भीमसेन ही यहाँ प्रधानरूपसे मध्यम पाण्डव कहे गये हैं।

अध्याय (पृष्ठ 2251)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टादशोऽध्यायः

द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दुःखके उद्गार प्रकट करना

वैशम्पायन उवाच

(सा लज्जमाना भीता च अधोमुखमुखी ततः ।
नोवाच किंचिद् वचनं बाष्पदूषितलोचना ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय लज्जित और भयभीत हुई द्रौपदीके नेत्रोंमें आँसू भर आये थे। वह मुँह नीचा किये मौन बैठी रही; कुछ भी बोल न सकी।
अथाब्रवीद् भीमपराक्रमो बली
वृकोदरः पाण्डवमुख्यसम्मतः ।
प्रब्रूहि किं ते करवाणि सुन्दरि
प्रियं प्रिये वारणखेलगामिनि ॥)
तब पाण्डवप्रवर युधिष्ठिरके परम प्रिय भयंकर पराक्रमी महाबली भीम इस प्रकार बोले—‘सुन्दरि! गजराजकी भाँति लीला-विलासपूर्वक मन्द-गतिसे चलनेवाली प्रिये! बताओ; मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?’।

द्रौपद्युवाच

अशोच्यत्वं कुतस्तस्य यस्या भर्ता युधिष्ठिरः ।
जानन् सर्वाणि दुःखानि किं मां त्वं परिपृच्छसि ॥ १ ॥
**द्रौपदी बोली—**जिस स्त्रीके पति राजा युधिष्ठिर हों, वह बिना शोकके रहे, यह कैसे सम्भव हो सकता है? तुम मेरे सारे दुःखोंको जानते हुए भी मुझसे कैसे पूछते हो? ॥ १ ॥
यन्मां दासीप्रवादेन प्रातिकामी तदानयत् ।
सभापरिषदो मध्ये तन्मां दहति भारत ॥ २ ॥
दुर्योधनके सेवकके रूपमें दुःशासन मुझे दासी कहकर जो उस समय कौरवोंके सभाभवनमें जनसमाजके भीतर घसीट ले गया, वह अपमानकी आग मुझे आजतक जला रही है ॥ २ ॥
(क्षत्रियैस्तत्र कर्णाद्यैर्दृष्टा दुर्योधनेन च ।
श्वशुराभ्यां च भीष्मेण विदुरेण च धीमता ॥
द्रोणेन च महाबाहो कृपेण च परंतप ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले महाबाहु भीम! उस समय वहाँ बैठे हुए कर्ण आदि क्षत्रियोंने, दुर्योधनने, मेरे दोनों ससुर भीष्म और बुद्धिमान् विदुरने तथा द्रोणाचार्य और कृपाचार्यने भी मुझे उस दुरवस्थामें देखा था।

साहं श्वशुरयोर्मध्ये भ्रातृमध्ये च पाण्डव ।।

केशे गृहीत्वैव सभां नीता जीवति वै त्वयि ।)

पाण्डुनन्दन! इस प्रकार तुम्हारे जीते-जी मेरे केश पकड़कर मुझे दोनों श्वशुरों तथा

दुर्योधन आदि भ्राताओंके बीच राजसभामें लाया गया।

पार्थिवस्य सुता नाम का नु जीवति मादृशी ।

अनुभूयेदृशं दुःखमन्यत्र द्रौपदीं प्रभो ।। ३ ।।

स्वामिन्! मुझ द्रुपदकन्याको छोड़कर दूसरी मेरी-जैसी कौन राजकुमारी होगी, जो

ऐसा दुःख भोगकर जी रही हो ।। ३ ।।

वनवासगतायाश्च सैन्धवेन दुरात्मना ।

परामर्शो द्वितीयो वै सोढुमुत्सहते तु का ।। ४ ।।

वनवासमें जानेपर दुरात्मा सिन्धुराज जयद्रथने जो मेरा स्पर्श कर लिया, यह दूसरा

अपमान था। उसे भी कौन सह सकती है? ।। ४ ।।

(पद्भ्यां पर्यचरं चाहं देशान् विषमसंस्थितान् ।

दुर्गाञ्छ्वापदसंकीर्णांस्त्वयि जीवति पाण्डव ।।

पाण्डुकुमार! तुम्हारे जीते-जी मुझे हिंसक जन्तुओंसे भरे हुए विषम एवं दुर्गम प्रदेशोंमें

पैदल विचरना पड़ा।

ततोऽहं द्वादशे वर्षे वन्यमूलफलाशना ।

इदं पुरमनुप्राप्ता सुदेष्णापरिचारिका ।।

परस्त्रियमुपतिष्ठे सत्यधर्मपथस्थिता ।

तदनन्तर बारहवें वर्षके अन्तमें मैं जंगली फल-मूलोंका आहार करती हुई इस

विराटनगरमें आयी और सुदेष्णाकी सेविका बन गयी। मैं सत्यधर्मके मार्गमें स्थित होकर

आज दूसरी स्त्रीकी सेवा करती हूँ।

गोशीर्षकं पद्मकं च हरिश्यामं च चन्दनम् ।।

नित्यं पिंषे विराटस्य त्वयि जीवति पाण्डव ।।

साहं बहूनि दुःखानि गणयामि न ते कृते ।

द्रुपदस्य सुता चाहं धृष्टद्युम्नस्य चानुजा ।

अग्निकुण्डात् समुद्भूता नोर्व्यां जातु चरामि भोः ।।)

'पाण्डुपुत्र! तुम्हारे जीते-जी मैं प्रतिदिन राजा विराटके लिये गोशीर्ष, पद्मकाष्ठ और

हरिश्याम आदि चन्दन पीसती हूँ। फिर भी तुम्हारे संतोषके लिये मैं ऐसे बहुत-से दुःखोंको

कुछ भी नहीं गिनती। मैं द्रुपदकी पुत्री और धृष्टद्युम्नकी बहिन हूँ। अग्निकुण्डसे मेरी उत्पत्ति

हुई है। मैं कभी धरतीपर पैदल नहीं चलती थी (परंतु अब यहाँ यह दुर्दशा भोग रही हूँ)।

मत्स्यराजसमक्षं तु तस्य धूर्तस्य पश्यतः ।

कीचकेन परामृष्टा का नु जीवति मादृशी ।। ५ ।।

मत्स्यदेशके राजा विराटके सामने उस जुआरीके देखते-देखते कीचकने जो लात मारकर मेरा अपमान किया है, उसको सहकर मेरी-जैसी कौन राजकुमारी जीवित रह सकती है? ।। ५ ।।

एवं बहुविधैः क्लेशैः क्लिश्यमानां च भारत ।
न मां जानासि कौन्तेय किं फलं जीवितेन मे ।। ६ ।।
भरतकुलभूषण कुन्तीनन्दन! ऐसे बहुत-से क्लेशोंद्वारा मैं निरन्तर पीड़ित रहती हूँ; क्या तुम यह नहीं जानते? फिर मेरे जीनेका ही क्या प्रयोजन है? ।। ६ ।।

योऽयं राज्ञो विराटस्य कीचको नाम भारत ।
सेनानीः पुरुषव्याघ्र श्यालः परमदुर्मतिः ।। ७ ।।
स मां सैरन्ध्रिवेषेण वसन्तीं राजवेश्मनि ।
नित्यमेवाह दुष्टात्मा भार्या मम भवेति वै ।। ८ ।।
भारत! पुरुषसिंह! राजा विराट्का जो यह कीचक नामक सेनापति है, वह उनका साला लगता है। उसकी बुद्धि बड़ी खोटी है। राजमहलमें सैरन्ध्रीके वेशमें निवास करती हुई मुझे देखकर वह दुष्टात्मा प्रतिदिन ही आकर मुझसे कहता है—‘मेरी ही पत्नी हो जाओ’ ।।

तेनोपमन्त्र्यमाणाया वधार्हेण सपत्नहन् ।
कालेनेव फलं पक्वं हृदयं मे विदीर्यते ।। ९ ।।
शत्रुदमन! उस मार डालने योग्य पापीके द्वारा रोज-रोज यह घृणित प्रस्ताव सुनते-सुनते समयसे पके हुए फलकी भाँति मेरा हृदय विदीर्ण हो रहा है ।। ९ ।।

(विजानामि तवामर्षं बलं वीर्यं च पाण्डव ।
ततोऽहं परिदेवामि चाग्रतस्ते महाबल ।।
महाबली पाण्डुनन्दन! मैं तुम्हारे अमर्ष, बल और पराक्रमको जानती हूँ; इसीलिये मैं तुम्हारे आगे रोती-बिलखती हूँ।

यथा यूथपतिर्मत्तः कुञ्जरः षष्टिहायनः ।
भूमौ निपतितं बिल्वं पद्ध्यामाक्रम्य पीडयेत् ।।
तथैव च शिरस्तस्य निपात्य धरणीतले ।
वामेन पुरुषव्याघ्र मर्द पादेन पाण्डव ।।
पुरुषसिंह पाण्डुपुत्र! जैसे साठ वर्षका मतवाला यूथपति गजराज धरतीपर गिरे हुए बेलके फलको पैरोंसे दबाकर कुचल डाले, उसी प्रकार कीचकके मस्तकको पृथ्वीपर गिराकर बाँयें पैरसे मसल डालो।

स चेदुद्यन्तमादित्यं प्रातरुत्थाय पश्यति ।
कीचकः शर्वरीं व्युष्टां नाहं जीवितुमुत्सहे ।।)
यदि कीचक इस रात्रिके बीतनेपर प्रातःकाल उठकर उगते हुए सूर्यका दर्शन कर लेगा, तो मैं जीवित नहीं रह सकूँगी।

भ्रातरं च विगर्हस्व ज्येष्ठं दुर्धूतदेविनम् । यस्यास्मि कर्मणा प्राप्ता दुःखमेतदनन्तकम् ॥ १० ॥ दूषित द्यूतक्रीड़ामें लगे रहनेवाले अपने उस बड़े भाईकी निन्दा करो, जिसकी करतूतसे मैं इस अनन्त दुःखमें पड़ गयी हूँ ॥ १० ॥

को हि राज्यं परित्यज्य सर्वस्वं चात्मना सह । प्रव्रज्यायैव दीव्येत विना दुर्धूतदेविनम् ॥ ११ ॥ निन्दनीय जूएमें आसक्त रहनेवाले उस जुआरीको छोड़कर दूसरा कौन ऐसा पुरुष होगा, जो अपने साथ ही राज्य तथा सर्वस्वका परित्याग करके वनवास लेनेकी शर्तपर जूआ खेल सकता हो? ॥ ११ ॥

यदि निष्कसहस्रेण यच्चान्यत् सारवद् धनम् । सायम्प्रातरदेविष्यदपि संवत्सरान् बहून् ॥ १२ ॥ रुक्मं हिरण्यं वासांसि यानं युग्ममजाविकम् । अश्वाश्वतरसङ्घांश्च न जातु क्षयमावहेत् ॥ १३ ॥ यदि वे प्रतिदिन शाम-सबेरे एक सहस्र स्वर्ण-मुद्राओंसे जूआ खेलते तथा जो दूसरे बहुमूल्य धन थे, उनको—सोने, चाँदी, वस्त्र, सवारी, रथ, बकरी, भेड़, घोड़े और खच्चरों आदिके समूहको बहुत वर्षोंतक भी दाँवपर लगाते रहते, तो भी हमारा राज्य-वैभव कभी क्षीण नहीं होता ॥ १२-१३ ॥

सोऽयं द्यूतप्रवादेन श्रियः प्रत्यवरोपितः । तूष्णीमास्ते यथा मूढः स्वानि कर्माणि चिन्तयन् ॥ १४ ॥ जूएकी आसक्तिने इन्हें राजलक्ष्मीके सिंहासनसे नीचे उतार दिया है और अब ये अपने उन कर्मोंका चिन्तन करते हुए अज्ञकी भाँति चुपचाप बैठे रहते हैं ॥

दश नागसहस्राणि हयानां हेममालिनाम् । यं यान्तमनुयान्तीह सोऽयं द्यूतेन जीवति ॥ १५ ॥ जिनके कहीं यात्रा करते समय दस हजार हाथी और सोनेकी मालाएँ पहने हुए सहस्रों घोड़े पीछे-पीछे चलते थे, वे ही महाराज यहाँ जूएसे जीविका चलाते हैं ॥

रथाः शतसहस्राणि नृपाणाममितौजसाम् । उपासन्त महाराजमिन्द्रप्रस्थे युधिष्ठिरम् ॥ १६ ॥ शतं दासीसहस्राणां यस्य नित्यं महानसे । पात्रीहस्तं दिवारात्रमतिथीन् भोजयन्त्युत ॥ १७ ॥ एष निष्कसहस्राणि प्रदाय ददतां वरः । द्यूतजेन ह्यनर्थेन महता समुपाश्रितः ॥ १८ ॥ इन्द्रप्रस्थमें जिनकी सवारीके लिये एक लाख रथ प्रस्तुत रहते थे और जिन महाराज युधिष्ठिरकी सेवामें सहस्रों महापराक्रमी राजा बैठा करते थे, जिनके भोजनालयमें नित्य एक

लाख दासियाँ सोनेके पात्र हाथमें लिये दिन-रात अतिथियोंको भोजन कराया करती थीं तथा जो दाताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर रोज सहस्रों स्वर्णमुद्राएँ दानमें बाँटा करते थे, वे ही धर्मराज यहाँ जूएमं कमाये हुए महान् अनर्थकारी धनसे जीवन-निर्वाह कर रहे हैं ॥ १६—१८ ॥

एनं हि स्वरसम्पन्ना बहवः सूतमागधाः ।
सायम्प्रातरुपातिष्ठन् सुमृष्टमणिकुण्डलाः ॥ १९ ॥
इन्द्रप्रस्थमें विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण करनेवाले बहुत-से सूत और मागध मधुर स्वरसे संयुक्त वाणीद्वारा सायंकाल और प्रातःकाल इन महाराजकी स्तुति किया करते थे ॥ १९ ॥

सहस्रमृषयो यस्य नित्यमासन् सभासदः ।
तपःश्रुतोपसम्पन्नाः सर्वकामैरुपस्थिताः ॥ २० ॥
तपस्या और वेदज्ञानसे सम्पन्न सहस्रों पूर्णकाम ऋषि-महर्षि प्रतिदिन इनकी राजसभामें बैठा करते थे ॥

अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः ।
त्रिंशद्दासीक एकैको यान् बिभर्ति युधिष्ठिरः ॥ २१ ॥
अट्ठासी हजार स्नातक गृहस्थ ब्राह्मणोंका, जिनमेंसे एक-एककी सेवाके लिये तीस-तीस दासियाँ थीं, राजा युधिष्ठिर अपने यहाँ पालन करते थे ॥ २१ ॥

अप्रतिग्राहिणां चैव यतीनामूर्ध्वरेतसाम् ।
दश चापि सहस्राणि सोऽयमास्ते नरेश्वरः ॥ २२ ॥
साथ ही ये महाराज दान न लेनेवाले दस हजार ऊर्ध्वरेता संन्यासियोंका भी स्वयं ही भरण-पोषण करते थे। आज वे ही इस अवस्थामें रह रहे हैं ॥ २२ ॥

आनृशंस्यमनुक्रोशं संविभागस्तथैव च ।
यस्मिन्नेतानि सर्वाणि सोऽयमास्ते नरेश्वरः ॥ २३ ॥
जिनमें कोमलता, दया और सबको अन्न-वस्त्र देना आदि समस्त सद्गुण विद्यमान थे, वे ही ये महाराज आज इस दुरवस्थामें पड़े हैं ॥ २३ ॥

अन्धान् वृद्धांस्तथानाथान् बालान् राष्ट्रेषु दुर्गतान् ।
बिभर्ति विविधान् राजा धृतिमान् सत्यविक्रमः ।
संविभागमना नित्यमानृशंस्याद् युधिष्ठिरः ॥ २४ ॥
धैर्यवान् तथा सत्यपराक्रमी राजा युधिष्ठिर अपने कोमल स्वभावके कारण सदा सबको भोजन आदि देनेमें ही मन लगाते थे और अपने राज्यके अनेक अंधों, बूढ़ों, अनाथों, बालकों तथा दुर्गतिमें पड़े हुए लोगोंका भरण-पोषण करते रहते थे ॥ २४ ॥

स एष निरयं प्राप्तो मत्स्यस्य परिचारकः ।
सभायां देविता राज्ञः कङ्को ब्रूते युधिष्ठिरः ॥ २५ ॥