भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2238

'पतिव्रता स्त्रियाँ नाना प्रकारके क्लेश सहकर तथा शत्रुओंद्वारा अपमानित होकर भी अपने पतियोंपर कभी क्रोध नहीं करतीं। अनन्यभावशुश्रूषाः पुण्यलोकं व्रजन्त्युत । न क्रुद्धान् प्रति यायाद् वै पतींस्ते वृत्रहा अपि ॥ 'इस प्रकार अनन्यभावसे पतिकी शुश्रूषा करनेवाली स्त्रियाँ पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेती हैं। सैरन्ध्री! तुम्हारे पतियोंके कुपित होनेपर तो वृत्रहन्ता इन्द्र भी युद्धमें उनका सामना नहीं कर सकते। यदि ते समयः कश्चित् कृतो ह्यायतलोचने । तं स्मरस्व क्षमाशीले क्षमा धर्मो ह्यनुत्तमः ॥ 'विशाललोचने! यदि उनके साथ तेरी कोई शर्त हुई हो तो उसे याद कर ले। क्षमाशीले! क्षमा सबसे उत्तम धर्म है। क्षमा सत्यं क्षमा दानं क्षमा धर्मः क्षमा तपः । क्षमावतामयं लोकः परलोकः क्षमावताम् ॥ द्व्यंशिनो द्वादशाङ्गस्य चतुर्विंशतिपर्वणः । कः षष्टित्रिशतारस्य मासोनस्याक्षमी भवेत् ॥ 'क्षमा सत्य है, क्षमा दान है, क्षमा धर्म है और क्षमा ही तप है। क्षमाशील मनुष्योंके लिये ही यह लोक और परलोक है। जिसके दो (उत्तरायण एवं दक्षिणायन) अंश हैं, बारह (मास) अंग हैं, चौबीस (पक्ष) पर्व हैं और तीन सौ साठ (दिन) अरे हैं, उस कालचक्रके पूर्ण होनेमें यदि एक मासकी ही कमी रह गयी हो; तो कौन उसकी प्रतीक्षा न करके क्षमाका त्याग कर सकता है?'।

वैशम्पायन उवाच

इत्येवमुक्ते तिष्ठन्तीं पुनरेवाह धर्मराट् ।) **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इतना कहनेपर भी जब द्रौपदी वहाँ खड़ी ही रह गयी, तब धर्मराजने पुनः उससे कहा—। अकालज्ञासि सैरन्ध्रि शैलूषीव विरोदिषि । विघ्नं करोषि मत्स्यानां दीव्यतां राजसंसदि ॥ ४३ ॥ 'सैरन्ध्री! तू अवसरको नहीं पहचानती; इसीलिये नटीकी भाँति राजसभामें रो रही है और द्यूतक्रीड़ामें लगे हुए मत्स्यराजकुमारोंके खेलमें विघ्न डालती है ॥ गच्छ सैरन्ध्रि गन्धर्वाः करिष्यन्ति तव प्रियम् । व्यपनेष्यन्ति ते दुःखं येन ते विप्रियं कृतम् ॥ ४४ ॥ 'सैरन्ध्री! जाओ, गन्धर्व तुम्हारा प्रिय करेंगे। जिसने तुम्हारा अपकार किया है, उसे मारकर तुम्हारा दुःख दूर कर देंगे' ॥ ४४ ॥