महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसैरन्ध्र्युवाच
अतीव तेषां घृणिनामर्थेऽहं धर्मचारिणी ।
तस्य तस्यैव ते वध्या येषां ज्येष्ठोऽक्षदेविता ॥ ४५ ॥
सैरन्ध्री बोली— जिनके बड़े भाई सदा जूआ खेला करते हैं, उन दयालु गन्धर्वोंके लिये मैं अत्यन्त धर्मपरायणा रहूँगी। मेरा अपकार करनेवाले दुरात्मा उन सबके लिये वध्य हों ॥ ४५ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा प्राद्रवत् कृष्णा सुदेष्णाया निवेशनम् ।
केशान् मुक्त्वा च सुश्रोणी संरम्भाल्लोहितेक्षणा ॥ ४६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! यों कहकर सुन्दर कटिप्रान्तवाली द्रौपदी तीव्र गतिसे रानी सुदेष्णाके महलको चली गयी। उसके केश खुले हुए थे और क्रोधसे उसकी आँखें लाल हो रही थीं ॥ ४६ ॥
शुशुभे वदनं तस्या रुदत्याः सुचिरं तदा ।
मेघलेखाविनिर्मुक्तं दिवीव शशिमण्डलम् ॥ ४७ ॥
उस समय रोती हुई द्रौपदीका मुख इस प्रकार सुशोभित हो रहा था, मानो आकाशमें मेघमालाके आवरणसे मुक्त चन्द्रबिम्ब शोभा पा रहा हो ॥ ४७ ॥
(पांसुकुण्ठितसर्वाङ्गी गजराजवधूरिव ।
प्रतस्थे नागनासोरूर्भर्तुराज्ञाय शासनम् ॥
समस्त अंगोंमें धूलिसे धूसरित गजराजवधूकी भाँति शोभा पानेवाली तथा हाथीकी सूँड़के समान जाँघोंवाली द्रौपदी स्वामीकी आज्ञा शिरोधार्य करके राजसभासे अन्तःपुरमें चली गयी।
विमुक्ता मृगशावाक्षी निरन्तरपयोधरा ।
प्रभा नक्षत्रराजस्य कालमेघैरिवावृता ॥
उसके स्तन एक-दूसरेसे सटे हुए थे, तथा नेत्र मृगशावकोंके समान चंचल हो रहे थे। वह कीचकके हाथसे छूटकर शोक और दुःखसे इस प्रकार मलिन हो रही थी, मानो चन्द्रमाकी प्रभा वर्षाकालके मेघोंसे आच्छादित हो गयी हो।
यस्या ह्यर्थे पाण्डवेयास्त्यजेयुरपि जीवितम् ।
तां ते दृष्ट्वा तथा कृष्णां क्षमिणो धर्मचारिणः ॥
समयं नातिवर्तन्ते वेलामिव महोदधिः ॥)
जिसके लिये समस्त पाण्डव अपने प्राणतक दे सकते थे, उसी कृष्णाको उस दशामें देखकर भी धर्मात्मा पाण्डव क्षमा धारण किये बैठे थे। जैसे समुद्र अपने तटकी सीमाका