भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार वे अज्ञातवासके लिये स्वीकृत समयका अतिक्रमण नहीं कर रहे थे।

सुदेष्णोवाच

कस्त्वावधीद् वरारोहे कस्माद् रोदिषि शोभने । कस्याद्य न सुखं भद्रे केन ते विप्रियं कृतम् ॥ ४८ ॥ **सुदेष्णाने पूछा—**वरारोहे! तुम्हें किसने मारा है? शोभने! तू क्यों रोती है? भद्रे! आज किसका सुख समाप्त हो गया? किसने तुम्हारा अपराध किया है? ४८ ॥ (किमिदं पद्मसंकाशं सुदन्तोष्ठाक्षिनासिकम् । रुदन्त्या अवमृष्टांसं पूर्णेन्दुसमवर्चसम् ॥ कमलके समान कमनीय, सुन्दर दाँत, ओठ, नेत्र और नासिकासे सुशोभित तथा पूर्णचन्द्रके समान कान्तिमान् तुम्हारा यह मनोहर मुख ऐसा (मलिन) क्यों हो रहा है? तुम रोती हुई अपने मुखपर बहे हुए आँसुओंको पोंछ रही हो। बिम्बोष्ठं कृष्णताराभ्यामत्यन्तरुचिरप्रभम् । नयनाभ्यामजिह्माभ्यां मुखं ते मुञ्चते जलम् ॥ काली पुतलीवाले सरल नेत्रोंसे सुशोभित, बिम्ब-फलके समान अरुण अधरोंसे उपलक्षित और अत्यन्त मनोहर प्रभासे प्रकाशित तुम्हारा मुख इस समय आँसू क्यों गिरा रहा है?।

वैशम्पायन उवाच

तीं निःश्वस्याब्रवीत् कृष्णा जानन्ती नाम पृच्छसि । भ्रात्रे त्वं मामनुप्रेष्य किमेवं त्वं विकत्थसे ॥) **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब कृष्णाने लंबी साँसे खींचकर कहा—‘तुम सब कुछ जानती हुई भी मुझसे क्या पूछ रही हो? स्वयं ही मुझे अपने भाईके पास भेजकर अब इस प्रकारकी बातें क्यों बना रही हो?’।

द्रौपद्युवाच

कीचको मावधीत् तत्र सुराहारीं गतां तव । सभायां पश्यतो राज्ञो यथैव विजने वने ॥ ४९ ॥ **द्रौपदी फिर बोली—**मैं तुम्हारे लिये मदिरा लाने गयी थी। वहाँ कीचकने राजसभामें महाराजके देखते-देखते मुझपर प्रहार किया है; ठीक उसी तरह, जैसे कोई निर्जन वनमें किसी असहाय अबलापर आघात करता हो ॥ ४९ ॥

सुदेष्णोवाच

घातयामि सुकेशान्ते कीचकं यदि मन्यसे ।