भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2243

वैशम्पायन उवाच

त्वदुक्तोऽयमनुप्रश्नः कुरूणां कीर्तिवर्धन । एतत् सर्वं तथा वक्ष्ये विस्तरेणैव पार्थिव ॥ **वैशम्पायनजीने कहा—**कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले नरेश! तुम्हारा उठाया हुआ यह प्रश्न ठीक है। मैं यह सब विस्तारपूर्वक बताऊँगा।

ब्राह्मण्यां क्षत्रियाज्जातः सूतो भवति पार्थिव । प्रातिलोम्येन जातानां स ह्येको द्विज एव तु ॥ राजन्! क्षत्रिय पिता और ब्राह्मणी मातासे उत्पन्न हुआ बालक ‘सूत’ कहलाता है। प्रतिलोमसंकर जातियोंमें अकेली यह सूत जाति ही द्विज कही गयी है।

रथकारमितीमं हि क्रियायुक्तं द्विजन्मनाम् । क्षत्रियादवरं वैश्याद् विशिष्टमिति चक्षते ॥ द्विजोचित कर्मोंसे युक्त उस सूतको ही रथकार भी कहते हैं। इसे क्षत्रियसे हीन और वैश्यसे श्रेष्ठ बताते हैं।

सह सूतेन सम्बन्धः कृतपूर्वो नरेश्वरैः । तथापि तैर्महीपाल राजशब्दो न लभ्यते ॥ राजन्! पहलेके नरेशोंने सूतजातिके साथ भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया है, परंतु उन्हें राजाकी उपाधि नहीं प्राप्त होती थी।

तेषां तु सूतविषयः सूतानां नामतः कृतः । उपजीव्य च यत् क्षत्रं लब्धं सूतेन तत् पुरा ॥ उनके लिये सूतोंके नामसे सूतराज्य ही नियत कर दिया गया था। वह राज्य सूतजातिके एक पुरुषने किसी क्षत्रियकी सेवा करके ही प्राप्त किया था।

सूतानामधिपो राजा केकयो नाम विश्रुतः ॥ राजकन्यासमुद्भूतः सारथ्येऽनुपमोऽभवत् । सुप्रसिद्ध केकय नामक राजा सूतोंके ही अधिपति थे। उनका जन्म किसी क्षत्रियकन्याके गर्भसे हुआ था। वे सारथिके कर्ममें अनुपम थे।

पुत्रास्तस्य कुरुश्रेष्ठ मालव्यां जज्ञिरे तदा ॥ तेषामतिबलो ज्येष्ठः कीचकः सर्वजित् प्रभो । कुरुश्रेष्ठ! उनके मालवीके गर्भसे कई पुत्र उत्पन्न हुए। प्रभो! उन पुत्रोंमें कीचक ही सबसे बड़ा था। वह अत्यन्त बलवान् और सर्वविजयी योद्धा था।

द्वितीयायां तु मालव्यां चित्रा ह्यवरजाभवत् । तां सुदेष्णेति वै प्राहुर्विराटमहिषीं प्रियाम् ॥ राजा केकयकी दूसरी रानी भी मालवकन्या ही थी। उसके गर्भसे चित्रा नामवाली कन्या उत्पन्न हुई, जो समस्त कीचकबन्धुओंकी छोटी बहिन थी। उसीको सुदेष्णा भी कहते