भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2349

साथियोंसे बोला—‘देखो, फिर बड़ा भारी युद्ध उपस्थित हुआ है। इसमें महान् पराक्रम दिखाओ' ॥ २५ ॥ परावृत्तो धनुर्गृह्य सुशर्मा भ्रातृभिः सह । निमेषान्तरमात्रेण भीमसेनेन ते रथाः ॥ २६ ॥ रथानां च गजानां च वाजिनां च ससादिनाम् । सहस्रशतसङ्घाताः शूराणामुग्रधन्विनाम् ॥ २७ ॥ पातिता भीमसेनेन विराटस्य समीपतः । पत्तयो निहतास्तेषां गदां गृह्य महात्मना ॥ २८ ॥ ऐसा कहकर सुशर्मा भाइयोंसहित धनुष उठाये लौट पड़ा। इधर महात्मा भीमसेनने निमेषमात्रमें ही गदा लेकर शत्रुओंके भयंकर धनुष धारण करनेवाले रथी, हाथीसवार और घुड़सवार वीरोंके एक लाख सैनिकोंके समूहोंको राजा विराटके समीप मार गिराया और बहुत-से पैदल सिपाहियोंका भी संहार कर डाला ॥ २६—२८ ॥ तद् दृष्ट्वा तादृशं युद्धं सुशर्मा युद्धदुर्मदः । चिन्तयामास मनसा किं शेषं हि बलस्य मे । अपरो दृश्यते सैन्ये पुरा मग्नो महाबले ॥ २९ ॥ ऐसा भयानक युद्ध देख रणोन्मत्त सुशर्मा मन-ही-मन सोचने लगा, 'जान पड़ता है, मेरी सेना बुरी तरह मारी जायगी; क्योंकि मेरा दूसरा भाई भी पहलेसे ही इस विशाल सैन्य-समुद्रमें डूबा हुआ दिखायी देता है' ॥ २९ ॥ आकर्णपूर्णेन तदा धनुषा प्रत्यदृश्यत । सुशर्मा सायकांस्तीक्ष्णान् क्षिपते च पुनः पुनः ॥ ३० ॥ ततः समस्तास्ते सर्वे तुरगानभ्यचोदयन् । दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणास्त्रिगर्तान् प्रत्यमर्षणाः ॥ ३१ ॥ ऐसा विचारकर वह कानतक खींचे हुए धनुषके द्वारा युद्धके लिये उद्यत दिखायी देने लगा। सुशर्मा बारंबार तीखे बाणोंकी झड़ी लगा रहा है, यह देख सम्पूर्ण मत्स्यदेशीय योद्धा त्रिगर्तोंके प्रति कुपित हो दिव्यास्त्र प्रकट करते हुए अपने रथोंके घोड़ोंको आगे बढ़ाने लगे ॥ ३०-३१ ॥ तान् निवृत्तरथान् दृष्ट्वा पाण्डवान् सा महाचमूः । वैराटिः परमक्रुद्धो युयुधे परमाद्भुतम् ॥ ३२ ॥ पाण्डवोंको त्रिगर्तोंकी ओर रथ लौटाते देख मत्स्यवीरोंकी वह विशालवाहिनी भी लौट पड़ी। विराटके पुत्र श्वेत अत्यन्त क्रोधमें भरकर बड़ा अद्भुत युद्ध करने लगे ॥ ३२ ॥ सहस्रमवधीत् तत्र कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । भीमः सप्त सहस्राणि यमलोकमदर्शयत् ॥ ३३ ॥