महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2358, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुहृदां प्रियमाख्यातुं घोषयन्तु च ते जयम् । ततस्तद्वचनान्मत्स्यो दूतान् राजा समादिशत् ॥ १६ ॥ ‘महाराज! अब आपके नगरमें सुहृदोंसे यह प्रिय समाचार बतानेके लिये तुरंत ही दूतोंको जाना चाहिये। वे दूत वहाँ आपकी विजय घोषित करें।’ तब उनके कथनानुसार राजा विराटने दूतोंको आदेश दिया— ॥ १५-१६ ॥
आचक्षध्वं पुरं गत्वा संग्रामविजयं मम । कुमार्यः समलंकृत्य पर्यागच्छन्तु मे पुरात् ॥ १७ ॥ ‘दूतो! तुमलोग नगरमें जाकर सूचना दो कि युद्धमें मेरी विजय हुई है। कुमारी कन्याएँ शृंगार करके स्वागतके लिये नगरसे बाहर आ जायँ ॥ १७ ॥
वादित्राणि च सर्वाणि गणिकाश्च स्वलंकृताः । एतां चाज्ञां ततः श्रुत्वा राज्ञा मत्स्येन नोदिताः । तामाज्ञां शिरसा कृत्वा प्रस्थिता हृष्टमानसाः ॥ १८ ॥ ‘सब प्रकारके बाजे बजाये जायँ और वेश्याएँ भी सज-धजकर तैयार रहें।’ मत्स्यराजकी इस आज्ञाको सुनकर उसे शिरोधार्य करके दूत प्रसन्नचित्त होकर चले ॥ १८ ॥
ते गत्वा तत्र तां रात्रिमथ सूर्योदयं प्रति । विराटस्य पुराभ्याशे दूता जयमघोषयन् ॥ १९ ॥ रातमें ही वहाँसे प्रस्थान करके सूर्योदय होते-होते दूत विराटकी राजधानीमें जा पहुँचे और वहाँ उन्होंने सब ओर मत्स्यराजकी विजय घोषित कर दी ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे विराटजयघोषे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें दक्षिण दिशाकी ओरसे गौओंके अपहरणके प्रसंगमें विराटके जयघोषसम्बन्धी चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २५ १/२ श्लोक हैं।)