भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2357

प्रतिनन्दामि ते वाक्यं मनोज्ञं मत्स्य भाषसे ।। १४ ।।
आनृशंस्यपरो नित्यं सुसुखी सततं भव ।
यह सुनकर राजा युधिष्ठिरने मत्स्यराजसे पुनः कहा—'राजन्! आप बड़ी मनोहर बात कह रहे हैं। मैं आपके इस वचनका अभिनन्दन करता हूँ आप निरन्तर दयाभाव रखते हुए सर्वदा परम सुखी हों ।। १४ १/२ ।।

(वैशम्पायन उवाच

पुनरेव विराटश्च राजा कङ्कमभाषत ।
अहो सूदस्य कर्माणि बल्लवस्य द्विजोत्तम ।
सोऽहं सूदेन संग्रामे बल्लवेनाभिरक्षितः ।।
त्वत्कृते सर्वमेवैतदुपपन्नं ममानघ ।
वरं वृणीष्व भद्रं ते ब्रूहि किं करवाणि ते ।।
ददामि ते महाप्रीत्या रत्नान्युच्चावचानि च ।
शयनासनयानानि कन्याश्च समलंकृताः ।।
हस्त्यश्वरथसङ्घांश्च राष्ट्राणि विविधानि च ।
एतानि च मम प्रीत्या प्रतिगृह्णीष्व सुव्रत ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कंकनामधारी युधिष्ठिरके यों कहनेपर राजा विराट पुनः उनसे इस प्रकार बोले—'द्विजश्रेष्ठ! बल्लव नामक रसोइयेका कर्म भी अद्भुत है। इस युद्धमें बल्लवने ही मेरी रक्षा की है। निष्पाप विप्रवर! आपके ही करनेसे यह सब कुछ सम्भव हुआ है। आपका कल्याण हो। आप मुझसे वर माँगिये और बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ आपको नाना प्रकारके उत्तमोत्तम रत्न, शय्या, आसन, वाहन, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सुन्दरी कन्याएँ, हाथी, घोड़े और रथोंके समूह तथा भाँति-भाँतिके जनपद भेंट करता हूँ। सुव्रत! आप मेरी प्रसन्नताके लिये इन सब वस्तुओंको ग्रहण करें।

तं तथावादिनं तत्र कौरव्यः प्रत्यभाषत ।
एकैव तु मम प्रीतिर्यत् त्वं मुक्तोऽसि शत्रुभिः ।
प्रतीतश्च पुरं तुष्टः प्रवेक्ष्यसि तदानघ ।।
दारैः पुत्रैश्च संश्लिष्य सा हि प्रीतिर्ममातुला ।)
तब वहाँ ऐसी बातें कहनेवाले राजा विराटको कुरुकुलनन्दन युधिष्ठिरने इस प्रकार उत्तर दिया—'महाराज! आप शत्रुओंके हाथसे छूट गये, यही मेरे लिये बड़ी प्रसन्नताकी बात है। अनघ! आप निर्भय होकर संतोषपूर्वक अपने नगरमें प्रवेश करेंगे और अपने स्त्री-पुत्रोंसे मिलकर सुखी होंगे; यही मेरे लिये अनुपम प्रसन्नताकी बात होगी।

गच्छन्तु दूतास्त्वरितं नगरं तव पार्थिव ।। १५ ।।

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