महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
प्रतिनन्दामि ते वाक्यं मनोज्ञं मत्स्य भाषसे ।। १४ ।।
आनृशंस्यपरो नित्यं सुसुखी सततं भव ।
यह सुनकर राजा युधिष्ठिरने मत्स्यराजसे पुनः कहा—'राजन्! आप बड़ी मनोहर बात कह रहे हैं। मैं आपके इस वचनका अभिनन्दन करता हूँ आप निरन्तर दयाभाव रखते हुए सर्वदा परम सुखी हों ।। १४ १/२ ।।
(वैशम्पायन उवाच
पुनरेव विराटश्च राजा कङ्कमभाषत ।
अहो सूदस्य कर्माणि बल्लवस्य द्विजोत्तम ।
सोऽहं सूदेन संग्रामे बल्लवेनाभिरक्षितः ।।
त्वत्कृते सर्वमेवैतदुपपन्नं ममानघ ।
वरं वृणीष्व भद्रं ते ब्रूहि किं करवाणि ते ।।
ददामि ते महाप्रीत्या रत्नान्युच्चावचानि च ।
शयनासनयानानि कन्याश्च समलंकृताः ।।
हस्त्यश्वरथसङ्घांश्च राष्ट्राणि विविधानि च ।
एतानि च मम प्रीत्या प्रतिगृह्णीष्व सुव्रत ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कंकनामधारी युधिष्ठिरके यों कहनेपर राजा विराट पुनः उनसे इस प्रकार बोले—'द्विजश्रेष्ठ! बल्लव नामक रसोइयेका कर्म भी अद्भुत है। इस युद्धमें बल्लवने ही मेरी रक्षा की है। निष्पाप विप्रवर! आपके ही करनेसे यह सब कुछ सम्भव हुआ है। आपका कल्याण हो। आप मुझसे वर माँगिये और बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ आपको नाना प्रकारके उत्तमोत्तम रत्न, शय्या, आसन, वाहन, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सुन्दरी कन्याएँ, हाथी, घोड़े और रथोंके समूह तथा भाँति-भाँतिके जनपद भेंट करता हूँ। सुव्रत! आप मेरी प्रसन्नताके लिये इन सब वस्तुओंको ग्रहण करें।
तं तथावादिनं तत्र कौरव्यः प्रत्यभाषत ।
एकैव तु मम प्रीतिर्यत् त्वं मुक्तोऽसि शत्रुभिः ।
प्रतीतश्च पुरं तुष्टः प्रवेक्ष्यसि तदानघ ।।
दारैः पुत्रैश्च संश्लिष्य सा हि प्रीतिर्ममातुला ।)
तब वहाँ ऐसी बातें कहनेवाले राजा विराटको कुरुकुलनन्दन युधिष्ठिरने इस प्रकार उत्तर दिया—'महाराज! आप शत्रुओंके हाथसे छूट गये, यही मेरे लिये बड़ी प्रसन्नताकी बात है। अनघ! आप निर्भय होकर संतोषपूर्वक अपने नगरमें प्रवेश करेंगे और अपने स्त्री-पुत्रोंसे मिलकर सुखी होंगे; यही मेरे लिये अनुपम प्रसन्नताकी बात होगी।
गच्छन्तु दूतास्त्वरितं नगरं तव पार्थिव ।। १५ ।।
सुहृदां प्रियमाख्यातुं घोषयन्तु च ते जयम् । ततस्तद्वचनान्मत्स्यो दूतान् राजा समादिशत् ॥ १६ ॥ ‘महाराज! अब आपके नगरमें सुहृदोंसे यह प्रिय समाचार बतानेके लिये तुरंत ही दूतोंको जाना चाहिये। वे दूत वहाँ आपकी विजय घोषित करें।’ तब उनके कथनानुसार राजा विराटने दूतोंको आदेश दिया— ॥ १५-१६ ॥
आचक्षध्वं पुरं गत्वा संग्रामविजयं मम । कुमार्यः समलंकृत्य पर्यागच्छन्तु मे पुरात् ॥ १७ ॥ ‘दूतो! तुमलोग नगरमें जाकर सूचना दो कि युद्धमें मेरी विजय हुई है। कुमारी कन्याएँ शृंगार करके स्वागतके लिये नगरसे बाहर आ जायँ ॥ १७ ॥
वादित्राणि च सर्वाणि गणिकाश्च स्वलंकृताः । एतां चाज्ञां ततः श्रुत्वा राज्ञा मत्स्येन नोदिताः । तामाज्ञां शिरसा कृत्वा प्रस्थिता हृष्टमानसाः ॥ १८ ॥ ‘सब प्रकारके बाजे बजाये जायँ और वेश्याएँ भी सज-धजकर तैयार रहें।’ मत्स्यराजकी इस आज्ञाको सुनकर उसे शिरोधार्य करके दूत प्रसन्नचित्त होकर चले ॥ १८ ॥
ते गत्वा तत्र तां रात्रिमथ सूर्योदयं प्रति । विराटस्य पुराभ्याशे दूता जयमघोषयन् ॥ १९ ॥ रातमें ही वहाँसे प्रस्थान करके सूर्योदय होते-होते दूत विराटकी राजधानीमें जा पहुँचे और वहाँ उन्होंने सब ओर मत्स्यराजकी विजय घोषित कर दी ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे विराटजयघोषे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें दक्षिण दिशाकी ओरसे गौओंके अपहरणके प्रसंगमें विराटके जयघोषसम्बन्धी चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २५ १/२ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2359)
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
कौरवोंद्वारा उत्तर दिशाकी ओरसे आकर विराटकी गौओंका अपहरण और गोपाध्यक्षका उत्तरकुमारको युद्धके लिये उत्साह दिलाना
वैशम्पायन उवाच
याते त्रिगर्तान् मत्स्ये तु पशूंस्तान् वै परीप्सति ।
दुर्योधनः सहामात्यो विराटमुपयादथ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जिस समय अपने पशुओंको छुड़ा लानेकी इच्छासे राजा विराट त्रिगर्तोंसे युद्ध करनेके लिये गये, उसी समय दुर्योधनने अपने मन्त्रियोंके साथ विराटदेशपर चढ़ाई की ॥ १ ॥
भीष्मो द्रोणश्च कर्णश्च कृपश्च परमास्त्रवित् ।
द्रौणिश्च सौबलश्चैव तथा दुःशासनः प्रभो ॥ २ ॥
विविंशतिर्विकर्णश्च चित्रसेनश्च वीर्यवान् ।
दुर्मुखो दुःशलश्चैव ये चैवान्ये महारथाः ॥ ३ ॥
राजन्! भीष्म, द्रोण, कर्ण, अस्त्रविद्याके श्रेष्ठ विद्वान् कृपाचार्य, अश्वत्थामा, शकुनि, दुःशासन, विविंशति, विकर्ण, पराक्रमी चित्रसेन, दुर्मुख, दुःशल तथा अन्य महारथी भी दुर्योधनके साथ थे ॥ २-३ ॥
एते मत्स्यानुपागम्य विराटस्य महीपतेः ।
घोषान् विद्राव्य तरसा गोधनं जहुरोजसा ॥ ४ ॥
इन सबने राजा विराटके मत्स्यदेशमें आकर उनके घोषोंमें भगदड़ मचा दी और बड़े वेगसे बलपूर्वक गोधनका अपहरण करना आरम्भ किया ॥ ४ ॥
षष्टिं गवां सहस्राणि कुरवः कालयन्ति च ।
महता रथवंशेन परिवार्य समन्ततः ॥ ५ ॥
वे कौरव वीर राजा विराटकी साठ हजार गौओंको विशाल रथसमूहोंद्वारा चारों ओरसे घेरकर हाँक ले चले ॥ ५ ॥
गोपालानां तु घोषस्य हन्यतां तैर्महारथैः ।
आरावः सुमहानासीत् सम्प्रहारे भयंकरे ॥ ६ ॥
उस समय वहाँ भयंकर मारपीट हुई। उन महारथियोंद्वारा मारे जाते हुए घोषके ग्वालोंका जोर-जोरसे होनेवाला आर्तनाद बहुत दूरतक सुनायी देता था ॥ ६ ॥
गोपाध्यक्षो भयत्रस्तो रथमास्थाय सत्वरः ।
जगाम नगरायैव परिक्रोशंस्तदाऽऽर्तवत् ॥ ७ ॥
तब उन गौओंका रक्षक भयभीत हो तुरंत ही रथपर बैठकर आर्तकी भाँति विलाप करता हुआ राजधानीकी ओर चल दिया ।। ७ ।।
स प्रविश्य पुरं राज्ञो नृपवेश्माभ्ययात् ततः।
अवतीर्य रथात् तूर्णमाख्यातुं प्रविवेश ह ॥ ८ ॥
राजा विराटके नगरमें पहुँचकर वह राजभवनके समीप गया और रथसे उतरकर तुरंत यह समाचार सूचित करनेके लिये महलके भीतर चला गया ।। ८ ।।
दृष्ट्वा भूमिंजयं नाम पुत्रं मत्स्यस्य मानिनम्।
तस्मै तत् सर्वमाचष्ट राष्ट्रस्य पशुकर्षणम् ॥ ९ ॥
षष्टिं गवां सहस्राणि कुरवः कालयन्ति ते।
तद् विजेतुं समुत्तिष्ठ गोधनं राष्ट्रमवर्धन ॥ १० ॥
वहाँ मत्स्यराजके मानी पुत्र भूमिंजय (उत्तर) से मिलकर उस गोपने उनसे राज्यके पशुओंके अपहरणका सब समाचार बताते हुए कहा—'राजकुमार! आप इस राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले हैं। आज कौरव आपकी साठ हजार गौओंको हाँक ले जा रहे हैं। उनके हाथसे उस गोधनको जीत लानेके लिये उठ खड़े होइये ॥ ९-१० ॥
राजपुत्र हितप्रेप्सुः क्षिप्रं निर्याहि च स्वयम्।
त्वां हि मत्स्यो महीपालः शून्यपालमिहाकरोत् ॥ ११ ॥
'राजपुत्र! आप इस राज्यके हितैषी हैं, अतः स्वयं ही युद्धके लिये तैयार होकर निकलिये। मत्स्यनरेशने अपनी अनुपस्थितिमें आपको ही यहाँका रक्षक नियुक्त किया है ॥ ११ ॥
त्वया परिषदो मध्ये श्लाघते स नराधिपः ।
पुत्रो ममानुरूपश्च शूरश्चेति कुलोद्वहः ॥ १२ ॥
‘वे सभामें आपसे प्रभावित होकर आपकी प्रशंसामें बड़ी-बड़ी बातें किया करते हैं। उनका कहना है—‘मेरा यह पुत्र उत्तर मेरे अनुरूप शूरवीर और इस वंशका भार वहन करनेमें समर्थ है ।। १२ ।।
इष्वस्त्रे निपुणो योधः सदा वीरश्च मे सुतः ।
तस्य तत् सत्यमेवास्तु मनुष्येन्द्रस्य भाषितम् ॥ १३ ॥
‘मेरा वह लाड़ला बेटा बाण चलाने तथा अन्यान्य अस्त्रोंके प्रयोगकी कलामें भी निपुण, सदा युद्धके लिये उद्यत रहनेवाला और वीर है।' उन महाराजका यह कथन आज सत्य सिद्ध होना चाहिये ।। १३ ।।
आवर्तय कुरून् जित्वा पशून् पशुमतां वर ।
निर्दहैषामनीकानि भीमेन शरतेजसा ॥ १४ ॥
‘पशुसम्पत्तिवाले समस्त राजाओंमें आप श्रेष्ठ हैं; अतः कौरवोंको परास्त करके अपने पशुओंको लौटा लाइये और बाणोंकी भयंकर अग्निसे इन कौरवोंकी सारी सेनाओंको भस्म कर डालिये ।। १४ ।।
धनुश्च्युतै रुक्मपुङ्खैः शरैः संनतपर्वभिः ।
द्विषतां भिन्ध्यनीकानि गजानामिव यूथपः ॥ १५ ॥
‘जैसे हाथियोंके झुंडका स्वामी गजराज अपने विरोधियोंको रौंद डालता है, उसी प्रकार आप अपने धनुषसे छूटे हुए सुवर्णमय पंखसे सुशोभित और झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणोंद्वारा विपक्षियोंकी विपुल वाहिनीको छिन्न-भिन्न कर डालिये ।। १५ ।।
पाशोपधानां ज्यातन्त्रीं चापदण्डां महास्वनाम् ।
शरवर्णां धनुर्वीणां शत्रुमध्ये प्रवादय ।। १६ ।।
‘आज शत्रुओंके बीचमें जोर-जोरसे गूँजनेवाली धनुषरूपी वीणा बजाइये। पाश (प्रत्यंचा बाँधनेके दोनों सिरे) उसके उपधान (खूँटियाँ) हैं, प्रत्यंचा तार हैं, धनुष उसका दण्ड है और बाण ही उससे झंकृत होनेवाले वर्ण (स्वर) हैं ।। १६ ।।
श्वेता रजतसंकाशा रथे युज्यन्तु ते हयाः ।
ध्वजं च सिंहं सौवर्णमुच्छ्रयन्तु तव प्रभो ।। १७ ।।
‘प्रभो अब चाँदीके समान चमकनेवाले वे श्वेत रंगके घोड़े आपके रथमें जोते जायें और सिंहके चिह्नसे सुशोभित सुवर्णमय ऊँचा ध्वज फहरा दिया जाय ।। १७ ।।
रुक्मपुङ्खाः प्रसन्नाग्रा मुक्ता हस्तवता त्वया ।
छादयन्तु शराः सूर्यं राज्ञां मार्गनिरोधकाः ।। १८ ।।
‘वीरवर! आपके हाथ बहुत मजबूत हैं। उनके द्वारा आपके चलाये हुए सोनेकी पाँख और स्वच्छ नोकवाले बाण शत्रुपक्षके राजाओंकी राह रोककर सूर्यदेवको भी ढक दें ।। १८ ।।
रणे जित्वा कुरून् सर्वान् वज्रपाणिरिवासुरान् ।
यशो महदवाप्य त्वं प्रविशेदं पुरं पुनः ।। १९ ।।
‘जैसे वज्रपाणि इन्द्र समस्त असुरोंको परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार आप युद्धमें सम्पूर्ण कौरवोंको जीतकर महान् यश प्राप्त करके पुनः इस नगरमें प्रवेश करें ।।
त्वं हि राष्ट्रस्य परमा गतिर्मत्स्यपतेः सुतः ।
यथा हि पाण्डुपुत्राणामर्जुनो जयतां वरः ।। २० ।।
एवमेव गतिर्नूनं भवान् विषयवासिनाम् ।
गतिमन्तो वयं त्वद्य सर्वे विषयवासिनः ।। २१ ।।
‘मत्स्यराजके सुयोग्य पुत्र होनेके कारण आप ही इस राष्ट्रके महान् आश्रय हैं। जैसे विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुन पाण्डवोंके उत्तम आश्रय हैं, उसी प्रकार आप भी निश्चय ही इस राज्यके निवासियोंकी परम गति हैं। हम सभी मत्स्यदेशवासी आज आपको पाकर ही गतिमान् (सनाथ) हैं’ ।। २०-२१ ।।
वैशम्पायन उवाच
स्त्रीमध्य उक्तस्तेनासौ तद् वाक्यमभयंकरम् ।
अन्तःपुरे श्लाघमान इदं वचनमब्रवीत् ।। २२ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! उस समय राजकुमार उत्तर अन्तःपुरमें स्त्रियोंके बीचमें बैठा था। वहीं उस गोपाध्यक्षने उससे ये निर्भय बनानेवाली उत्साहजनक बातें कहीं। अतः वह अपनी प्रशंसा करता हुआ इस प्रकार कहने लगा ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे गोपवाक्ये पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तर दिशाकी गौओंके अपहरणके प्रसंगमें गोपवचनविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2364)
षट्त्रिंशोऽध्यायः
उत्तरका अपने लिये सारथि ढूँढ़नेका प्रस्ताव, अर्जुनकी सम्मतिसे द्रौपदीका बृहन्नलाको सारथि बनानेके लिये सुझाव देना
उत्तर उवाच
अद्याहमनुगच्छेयं दृढधन्वा गवां पदम् ।
यदि मे सारथिः कश्चिद् भवेदश्वेषु कोविदः ॥ १ ॥
**उत्तर बोला—**गोपप्रवर! मेरा धनुष तो बहुत मजबूत है। यदि मेरे पास घोड़े हाँकनेकी कलामें कुशल कोई सारथि होता, तो आज मैं अवश्य ही उन गौओंके पदचिह्नोंका अनुसरण करता ॥ १ ॥
तं त्वहं नागवच्छामि यो मे यन्ता भवेन्नरः ।
पश्यध्वं सारथिं क्षिप्रं मम युक्तं प्रयास्यतः ॥ २ ॥
इस समय मुझे ऐसे किसी मनुष्यका पता नहीं है, जो मेरा सारथि बन सके। मैं युद्धके लिये प्रस्थान करूँगा, अतः शीघ्र मेरे लिये किसी योग्य सारथिकी तलाश करो ॥
अष्टाविंशतिरात्रं वा मासं वा नूनमन्ततः ।
यत् तदासीन्महद् युद्धं तत्र मे सारथिर्हतः ॥ ३ ॥
पहले लगातार अट्ठाईस राततक अथवा अन्ततः एक मासतक जो वह महायुद्ध हुआ था, उसमें मेरा सारथि मारा गया था ॥ ३ ॥
स लभेयं यदा त्वन्यं हययानविदं नरम् ।
त्वरावानद्य यात्वाहं समुच्छ्रितमहाध्वजम् ॥ ४ ॥
विगाह्य तत् परानीकं गजवाजिरथाकुलम् ।
शस्त्रप्रतापनिर्वीर्यान् कुरून् जित्वाऽऽनये पशून् ॥ ५ ॥
अतः यदि घोड़े हाँकनेकी कला जाननेवाले किसी दूसरे मनुष्यको भी पा जाऊँ, तो अभी बड़े वेगसे जाकर ऊँची-ऊँची विशाल ध्वजाओंसे विभूषित एवं हाथी, घोड़े तथा रथोंसे भरी हुई शत्रुओंकी सेनामें घुस जाऊँ और अपने आयुधोंके प्रतापसे कौरवोंको निर्वीर्य (पराक्रमशून्य) तथा परास्त करके सम्पूर्ण पशुओंको लौटा लाऊँ ॥ ४-५ ॥
दुर्योधनं शान्तनवं कर्णं वैकर्तनं कृपम् ।
द्रोणं च सह पुत्रेण महेष्वासान् समागतान् ॥ ६ ॥
वित्रासयित्वा संग्रामे दानवानिव वज्रभृत् ।
अनेनैव मुहूर्तेन पुनः प्रत्यानये पशून् ॥ ७ ॥
जैसे वज्रधारी इन्द्र दानवोंको भयभीत कर देते हैं, उसी प्रकार मैं दुर्योधन, शान्तनुनन्दन भीष्म, सूर्यपुत्र कर्ण, कृपाचार्य तथा पुत्र (अश्वत्थामा) सहित द्रोणाचार्य आदि महान् धनुर्धरोंको, जो यहाँ आये हैं, युद्धमें अत्यन्त भय पहुँचाकर इसी मुहूर्तमें अपने पशुओंको वापस ला सकता हूँ ॥ ६-७ ॥
शून्यमासाद्य कुरवः प्रयान्त्यादाय गोधनम् ।
किं नु शक्यं मया कर्तुं यदहं तत्र नाभवम् ॥ ८ ॥
गोष्ठको सूना पाकर कौरवलोग मेरा गोधन लिये जा रहे हैं। परंतु अब मैं यहाँसे क्या कर सकता हूँ? जबकि वहाँ उस समय मैं मौजूद नहीं था ॥ ८ ॥
पश्येयुरद्य मे वीर्यं कुरवस्ते समागताः ।
किं नु पार्थोऽर्जुनः साक्षादयमस्मान् प्रबाधते ॥ ९ ॥
अच्छा, जब कौरवलोग यहाँ आ ही गये हैं, तब आज मेरा पराक्रम देख लें। फिर तो वे कहेंगे—'क्या यह साक्षात् कुन्तीपुत्र अर्जुन ही हमें पीड़ा दे रहा है?' ॥ ९ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तदर्जुनो वाक्यं राज्ञः पुत्रस्य भाषतः ।
अतीतसमये काले प्रियां भार्यामनिन्दिताम् ॥ १० ॥
द्रुपदस्य सुतां तन्वीं पाञ्चालीं पावकात्मजाम् ।
सत्यार्जवगुणोपेतां भर्तुः प्रियहिते रताम् ॥ ११ ॥
उवाच रहसि प्रीतः कृष्णां सर्वार्थकोविदः ।
उत्तरं ब्रूहि कल्याणि क्षिप्रं मद्वचनादिदम् ॥ १२ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार बोलते हुए राजकुमार उत्तरकी वह बात सुनकर सब बातोंमें कुशल अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए। उस समयतक उनके अज्ञातवासकी अवधि पूरी हो गयी थी। अतः उन्होंने अपनी सतीसाध्वी प्यारी पत्नी पांचाल-राजकुमारी द्रौपदीको, जिसका अग्निसे प्रादुर्भाव हुआ था और जो तन्वंगी, सत्य-सरलता आदि सद्गुणोंसे विभूषित तथा पतिके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहनेवाली थी, एकान्तमें बुलाकर कहा—'कल्याणि! तुम मेरी बात मानकर राजकुमार उत्तरसे शीघ्र इस प्रकार कहो— ॥ १०—१२ ॥
अयं वै पाण्डवस्यासीत् सारथिः सम्मतो दृढः ।
महायुद्धेषु संसिद्धः स ते यन्ता भविष्यति ॥ १३ ॥
'यह बृहन्नला पाण्डुनन्दन अर्जुनका सुदृढ़ एवं प्रिय सारथि रह चुका है। उसने बड़े-बड़े युद्धोंमें सफलता प्राप्त की है। वह तुम्हारा सारथि हो जायगा' ॥
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं स्त्रीषु भाषतश्च पुनः पुनः ।
न सामर्षत पाञ्चाली बीभत्सोः परिकीर्तनम् ॥ १४ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उत्तर स्त्रियोंके बीचमें बैठा था और बार-बार अपनी तुलनामें अर्जुनका नाम ले-लेकर डींग मार रहा था। पांचालराजकुमारी द्रौपदीसे यह सहन न हो सका ॥ १४ ॥ अथैनमुपसंगम्य स्त्रीमध्यात् सा तपस्विनी । व्रीडमानेव शनकैरिदं वचनमब्रवीत् ॥ १५ ॥ वह तपस्विनी स्त्रियोंके बीचसे उठकर उत्तरके समीप आयी और लजाती हुई-सी धीरे-धीरे इस प्रकार बोली— ॥ १५ ॥ योऽसौ बृहद्वारणाभो युवा सुप्रियदर्शनः । बृहन्नलेति विख्यातः पार्थस्यासीत् स सारथिः ॥ १६ ॥ ‘राजकुमार! यह जो विशाल गजराजके समान हृष्ट-पुष्ट, तरुण, सुन्दर और देखनेमें अत्यन्त प्रिय ‘बृहन्नला’ नामसे विख्यात नर्तक है, पहले कुन्तीपुत्र अर्जुनका सारथि था ॥ १६ ॥ धनुष्यनवरश्चासीत् तस्य शिष्यो महात्मनः । दृष्टपूर्वो मया वीर चरन्त्या पाण्डवान् प्रति ॥ १७ ॥ ‘वीर! यह उन्हीं महात्माका शिष्य है, अतः धनुर्विद्यामें भी उनसे कम नहीं है। पहले पाण्डवोंके यहाँ रहते समय मैंने इसे देखा है ॥ १७ ॥ यदा तत् पावको दावमदहत् खाण्डवं महत् । अर्जुनस्य तदानेन संगृहीता हयोत्तमाः ॥ १८ ॥ ‘जिन दिनों अर्जुनकी सहायतासे अग्निदेवने दावानलरूप हो महान् खाण्डववनको जलाया था, उस समय इसीने अर्जुनके श्रेष्ठ घोड़ोंकी बागडोर सँभाली थी ॥ १८ ॥ तेन सारथिना पार्थः सर्वभूतानि सर्वशः । अजयत् खाण्डवप्रस्थे न हि यन्तास्ति तादृशः ॥ १९ ॥ ‘इसी सारथिके सहयोगसे कुन्तीपुत्र अर्जुनने खाण्डवप्रस्थमें सम्पूर्ण प्राणियोंपर विजय पायी थी; अतः इसके समान दूसरा कोई सारथि नहीं है ॥ १९ ॥
उत्तर उवाच
सैरन्ध्रि जानासि तथा युवानं नपुंसको नैव भवेद् यथासौ । अहं न शक्नोमि बृहन्नलां शुभे वक्तुं स्वयं यच्छ हयान् ममेति वै ॥ २० ॥ **उत्तरने कहा—**सैरन्ध्री! वह युवक ऐसे गुणोंसे विभूषित है कि वह नपुंसक नहीं हो सकता; इन बातोंको तुम अच्छी तरह जानती हो; [अतः तुम उससे कह दो, तो ठीक है।]
शुभे! मैं स्वयं बृहन्नलासे नहीं कह सकता कि तुम मेरे घोड़ोंकी रास सँभालो ॥ २० ॥
द्रौपद्युवाच
येयं कुमारी सुश्रोणी भगिनी ते यवीयसी ।
अस्याः स वीर वचनं करिष्यति न संशयः ॥ २१ ॥
द्रौपदीने कहा—वीर! यह जो सुन्दर कटिप्रदेशवाली तुम्हारी छोटी बहिन कुमारी उत्तरा है। इसकी बात वह अवश्य मान लेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
यदि वै सारथिः स स्यात् कुरून् सर्वान् न संशयः ।
जित्वा गाश्च समादाय ध्रुवमागमनं भवेत् ॥ २२ ॥
यदि वह सारथि हो जाय, तो निःसंदेह सम्पूर्ण कौरवोंको जीतकर और गौओंको भी वापस लेकर तुम्हारा इस नगरमें आगमन हो सकता है, यह ध्रुव सत्य है ॥ २२ ॥
एवमुक्तः स सैरन्ध्र्या भगिनीं प्रत्यभाषत ।
गच्छ त्वमनवद्याङ्गि तामानय बृहन्नलाम् ॥ २३ ॥
सैरन्ध्रीके ऐसा कहनेपर उत्तर अपनी बहिनसे बोला—'निर्दोष अंगोंवाली उत्तरे! जाओ, उस बृहन्नलाको बुला ले आओ' ॥ २३ ॥
सा भ्रात्रा प्रेषिता शीघ्रमगच्छन्नर्तनागृहम् ।
यत्रास्ते स महाबाहुश्छन्नः सत्रेण पाण्डवः ॥ २४ ॥
भाईके भेजनेपर कुमारी उत्तरा शीघ्र नृत्यशालामें गयी, जहाँ पाण्डुनन्दन महाबाहु अर्जुन कपटवेषमें छिपकर रहते थे ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे बृहन्नलासारथ्यकथने षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तर दिशाकी ओरसे गौओंके अपहरणके प्रसंगमें बृहन्नलाका सारथ्यकथनसमबन्धी छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2368)
सप्तत्रिंशोऽध्यायः
बृहन्नलाको सारथि बनाकर राजकुमार उत्तरका रणभूमिकी ओर प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
सा प्राद्रवत् काञ्चनमाल्यधारिणी ज्येष्ठेन भ्रात्रा प्रहिता यशस्विनी । सुदक्षिणा वेदिविलग्नमध्या सा पद्मपत्राभनिभा शिखण्डिनी ॥ १ ॥ तन्वी शुभाङ्गी मणिचित्रमेखला मत्स्यस्य राज्ञो दुहिता श्रिया वृता । तन्नर्तनागारमरालपक्ष्म शतह्रदा मेघमिवान्वपद्यत ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कुमारी उत्तरा सोनेकी माला और मोरपंखका शृंगार धारण किये हुए थी। उसकी अंगकान्ति कमलदलकी-सी आभावाली लक्ष्मीको भी लज्जित कर रही थी। उसकी कमर यज्ञकी वेदीके समान सूक्ष्म थी। शरीरसे भी वह पतली ही थी। उसके सभी अंग शुभ लक्षणोंसे युक्त थे। उसने कटिप्रदेशमें मणियोंकी बनी हुई विचित्र करधनी पहन रखी थी। मत्स्यराजकी वह यशस्विनी कन्या अनुपम शोभासे प्रकाशित हो रही थी। बड़ोंकी आज्ञा माननेवाली कुमारी उत्तरा बड़े भाईके भेजनेसे बड़ी उतावलीके साथ नृत्यशालामें गयी; मानो चपला मेघ-मालामें विलीन हो गयी हो। उसके नेत्रोंकी टेढ़ी-टेढ़ी बरौनियाँ बड़ी भली मालूम होती थीं ॥ १-२ ॥
सा हस्तिहस्तोपमसंहितोरूः स्वनिन्दिता चारुदती सुमध्यमा । आसाद्य तं वै वरमाल्यधारिणी पार्थं शुभा नागवधूरिव द्विपम् ॥ ३ ॥
उसकी परस्पर सटी हुई जाँघें हाथीकी सूँड़के समान सुशोभित होती थीं, दाँत चमकीले और मनोहर थे। शरीरका मध्यभाग बड़ा सुहावना था। वह अनिन्द्य-सुन्दरी सुन्दर हार धारण किये उन कुन्तीनन्दन अर्जुनके पास पहुँचकर गजराजके समीप गयी हुई हथिनीके समान शोभा पा रही थी ॥ ३ ॥
सा रत्नभूता मनसः प्रियार्चिता सुता विराटस्य यथेन्द्रलक्ष्मीः ।
सुदर्शनीया प्रमुखे यशस्विनी प्रीत्याब्रवीदर्जुनमायतेक्षणा ॥ ४ ॥ विराटकुमारी उत्तरा स्त्रियोंमें रत्नस्वरूपा और मनको प्रिय लगनेवाली थी। वह उस राजभवनमें इन्द्रकी साम्राज्यलक्ष्मीके समान सम्मानित थी। उसके नेत्र बड़े-बड़े थे। वह यशस्विनी बाला सामनेसे देखने ही योग्य थी। वह अर्जुनसे प्रेमपूर्वक बोली— ॥ ४ ॥
सुसंहतोरुं कनकोज्ज्वलत्वचं पार्थः कुमारीं स तदाभ्यभाषत । किमागमः काञ्चनमाल्यधारिणि मृगाक्षि किं त्वं त्वरितेव भामिनि ॥ किं ते मुखं सुन्दरि न प्रसन्न- माचक्ष्व तत्त्वं मम शीघ्रमङ्गने ॥ ५ ॥ सुवर्णके समान सुन्दर एवं गौर त्वचा तथा सटी जाँघोंवाली कुमारी उत्तराको देखकर अर्जुनने पूछा—‘सुवर्णकी माला धारण करनेवाली मृगलोचने! भामिनि! तुम क्यों उतावली-सी चली आ रही हो? सुन्दरि! आज तुम्हारा मुख प्रसन्न क्यों नहीं है? अंगने! मुझे शीघ्र सब बातें ठीक-ठीक बताओ’ ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
स तां दृष्ट्वा विशालाक्षीं राजपुत्रीं सखीं तथा । प्रहसन्नब्रवीद् राजन् किमागमनमित्युत ॥ ६ ॥ तमब्रवीद् राजपुत्री समुपेत्य नरर्षभम् । प्रणयं भावयन्ती सा सखीमध्य इदं वचः ॥ ७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! विशाल नेत्रोंवाली अपनी सखी राजकुमारी उत्तराकी ओर देखकर अर्जुनने हँसते हुए जब उससे अपने पास आनेका कारण पूछा, तब वह राजपुत्री नरश्रेष्ठ अर्जुनके समीप जा अपना प्रेम प्रकट करती हुई सखियोंके बीचमें इस प्रकार बोली— ॥ ६-७ ॥
गावो राष्ट्रस्य कुरुभिः काल्यन्ते नो बृहन्नले । ता विजेतुं मम भ्राता प्रयास्यति धनुर्धरः ॥ ८ ॥ ‘बृहन्नले! हमारे राष्ट्रकी गौओंको कौरव हाँककर लिये जाते हैं; अतः उन्हें जीतनेके लिये मेरे भैया धनुष धारण करके जानेवाले हैं ॥ ८ ॥ नाचिरं निहतस्तस्य संग्रामे रथसारथिः । तेन नास्ति समः सूतो योऽस्य सारथ्यमाचरेत् ॥ ९ ॥ ‘थोड़े ही दिन हुए, उनके रथका सारथि एक युद्धमें मारा गया। इस कारण कोई ऐसा योग्य सूत नहीं है, जो उनके सारथिका काम सँभाल सके ॥ ९ ॥ तस्मै प्रयतमानाय सारथ्यर्थं बृहन्नले । आचचक्षे हयज्ञाने सैरन्ध्री कौशलं तव ॥ १० ॥ ‘बृहन्नले! वे सारथि ढूँढ़नेका प्रयत्न कर रहे थे, इतनेमें ही सैरन्ध्रीने पहुँचकर यह बताया कि तुम अश्वविद्यामें कुशल हो ॥ १० ॥ अर्जुनस्य किलासीस्त्वं सारथिर्दयितः पुरा । त्वयाजयत् सहायेन पृथिवीं पाण्डवर्षभः ॥ ११ ॥ ‘पहले तुम अर्जुनका प्रिय सारथि रह चुकी हो। तुम्हारी सहायतासे उन पाण्डवशिरोमणिने समूची पृथ्वीपर विजय पायी है ॥ ११ ॥
सा सारथ्यं मम भ्रातुः कुरु साधु बृहन्नले ।
पुरा दूरतरं गावो ह्रियन्त कुरुभिर्हि नः ॥ १२ ॥
‘अतः बृहन्नले! इसके पहले कि कौरवलोग हमारी गौओंको बहुत दूर लेकर चले जायँ, तुम मेरे भाईके सारथिका कार्य अच्छी तरह कर दो ॥ १२ ॥
अथैतद् वचनं मेऽद्य नियुक्ता न करिष्यसि ।
प्रणयादुच्यमाना त्वं परित्यक्ष्यामि जीवितम् ॥ १३ ॥
‘सखी! मैं बड़े प्रेमसे यह बात कहती हूँ। यदि आज इतना अनुरोध करनेपर भी तुम मेरी बात नहीं मानोगी, तो मैं प्राण त्याग दूँगी’ ॥ १३ ॥
एवमुक्तस्तु सुश्रोण्या तया सख्या परंतपः ।
जगाम राजपुत्रस्य सकाशममितौजसः ॥ १४ ॥
तमाव्रजन्तं त्वरितं प्रभिन्नमिव कुञ्जरम् ।
अन्वगच्छद् विशालाक्षी गजं गजवधूरिव ॥ १५ ॥
सुन्दर कटिप्रदेशवाली सखी उत्तराके ऐसा कहनेपर शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुन अमितपराक्रमी राजकुमार उत्तरके समीप गये। मद टपकानेवाले गजराजकी भाँति शीघ्रतापूर्वक आते हुए अर्जुनके पीछे-पीछे विशाल नेत्रोंवाली उत्तरा भी आयी; ठीक उसी तरह, जैसे हथिनी हाथीके पीछे-पीछे जाती है ॥ १४-१५ ॥
दूरादेव तु तां प्रेक्ष्य राजपुत्रोऽभ्यभाषत ।
त्वया सारथिना पार्थः खाण्डवेऽग्निमतर्पयत् ॥ १६ ॥
पृथिवीमजयत् कृत्स्नां कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
सैरन्ध्री त्वां समाचष्टे सा हि जानाति पाण्डवान् ॥ १७ ॥
राजकुमार उत्तरने बृहन्नलाको दूरसे ही देखकर इस प्रकार कहा—‘बृहन्नले! अर्जुनने तुम्हें सारथि बनाकर खाण्डववनमें अग्निको तृप्त किया था। इतना ही नहीं, कुन्तीपुत्र धनंजयने तुम-जैसे सारथिके सहयोगसे ही समूची पृथिवीपर विजय पायी है।’ तुम्हारे विषयमें यह बात सैरन्ध्री कह रही थी, क्योंकि वह पाण्डवोंको अच्छी तरह जानती है ॥ १६-१७ ॥
संयच्छ मामकांश्वांस्तथैव त्वं बृहन्नले ।
कुरुभिर्योत्स्यमानस्य गोधनानि परीप्सतः ॥ १८ ॥
‘बृहन्नले! तुम अर्जुनकी ही भाँति मेरे घोड़ोंको भी काबूमें रखना, क्योंकि मैं अपना गोधन वापस लेनेके लिये कौरवोंके साथ युद्ध करनेवाला हूँ ॥ १८ ॥
अर्जुनस्य किलासीस्त्वं सारथिर्दयितः पुरा ।
त्वयाजयत् सहायेन पृथिवीं पाण्डवर्षभः ॥ १९ ॥
‘पहले तुम अर्जुनका प्रिय सारथि रह चुकी हो और तुम्हारी ही सहायतासे उन पाण्डवशिरोमणिने समूची पृथिवीपर विजय पायी है’ ॥ १९ ॥
एवमुक्ता प्रत्युवाच राजपुत्रं बृहन्नला ।
का शक्तिर्मम सारथ्यं कर्तुं संग्राममूर्धनि ॥ २० ॥ उसके ऐसा कहनेपर बृहन्नला राजकुमारसे बोली—‘भला, मेरी क्या शक्ति है कि मैं युद्धके मुहानेपर सारथिका काम सँभाल सकूँ? ॥ २० ॥ गीतं वा यदि वा नृत्यं वादित्रं वा पृथग्विधम् । तत् करिष्यामि भद्रं ते सारथ्यं तु कुतो मम ॥ २१ ॥ ‘राजकुमार! आपका कल्याण हो। यदि गाना हो, नृत्य करना हो अथवा विभिन्न प्रकारके बाजे बजाने हों, तो वह कर लूँगी। सारथिका काम मुझसे कैसे हो सकता है? ॥ २१ ॥
उत्तर उवाच
बृहन्नले गायनो वा नर्तनो वा पुनर्भव । क्षिप्रं मे रथमास्थाय निगृह्णीष्व हयोत्तमान् ॥ २२ ॥ **उत्तर बोला—**बृहन्नले! तुम पुनः लौटकर गायक या नर्तक जो चाहो, बन जाना। इस समय तो शीघ्र ही मेरे रथपर बैठकर श्रेष्ठ घोड़ोंको काबूमें करो ॥ २२ ॥
वैशम्पायन उवाच
स तत्र नर्मसंयुक्तमकरोत् पाण्डवो बहु । उत्तरायाः प्रमुखतः सर्वं जानन्नरिंदमः ॥ २३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! शत्रुओंका दमन करनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनने सब कुछ जानते हुए भी उत्तराके सामने हँसीके लिये बहुत-से अनभिज्ञतासूचक कार्य किये ॥ २३ ॥ ऊर्ध्वमुत्क्षिप्य कवचं शरीरे प्रत्यमुञ्चत । कुमार्यस्तत्र तं दृष्ट्वा प्राहसन् पृथुलोचनाः ॥ २४ ॥ वे कवचको ऊपर उठाकर शरीरमें डालने लगे। यह देखकर वहाँ खड़ी हुई बड़े-बड़े नेत्रोंवाली राजकुमारियाँ हँसने लगीं ॥ २४ ॥ स तु दृष्ट्वा विमुह्यन्तं स्वयमेवोत्तरस्ततः । कवचेन महार्हेण समनह्यद् बृहन्नलाम् ॥ २५ ॥ बृहन्नलाको (कवच धारणके समय) भूल करती देख राजकुमार उत्तरने स्वयं ही उसे बहुमूल्य कवच धारण कराया ॥ २५ ॥ स बिभ्रत् कवचं चाग्र्यं स्वयमप्यंशुमत्प्रभम् । ध्वजं च सिंहमुच्छ्रित्य सारथ्ये समकल्पयत् ॥ २६ ॥ फिर उसने स्वयं भी सूर्यके समान कान्तिमान् सुन्दर कवच धारण किया और रथपर सिंहध्वज फहराकर बृहन्नलाको सारथिके कार्यमें नियुक्त कर दिया ॥ २६ ॥ धनूंषि च महार्हाणि बाणांश्च रुचिरान् बहून् ।
आदाय प्रययौ वीरः स बृहन्नलसारथिः ॥ २७ ॥
तदनन्तर बहुत-से बहुमूल्य धनुष और सुन्दर बाण लेकर वीर उत्तर बृहन्नला सारथिके साथ युद्धके लिये प्रस्थित हुआ ॥ २७ ॥
अथोत्तरा च कन्याश्च सख्यस्तामब्रुवंस्तदा ।
बृहन्नले आनयेथा वासांसि रुचिराणि च ॥ २८ ॥
पाञ्चालिकार्थं चित्राणि सूक्ष्माणि च मृदूनि च ।
विजित्य संग्रामगतान् भीष्मद्रोणमुखान् कुरून् ॥ २९ ॥
उस समय उत्तरा और उसकी सखीरूपा दूसरी राजकन्याओंने कहा—'बृहन्नले! तुम युद्धभूमिमें आये हुए भीष्म, द्रोण आदि प्रमुख कौरववीरोंको जीतकर हमारी गुड़ियोंके लिये उनके महीन, कोमल और विचित्र रंगके सुन्दर-सुन्दर वस्त्र ले आना' ॥ २८-२९ ॥
एवं ता ब्रुवतीः कन्याः सहिताः पाण्डुनन्दनः ।
प्रत्युवाच हसन् पार्थो मेघदुन्दुभिनिःस्वनः ॥ ३० ॥
ऐसा कहती हुई उन सब कन्याओंसे पाण्डुनन्दन अर्जुनने हँसते हुए मेघ और दुन्दुभिके समान गम्भीर वाणीमें कहा ॥ ३० ॥
बृहन्नलोवाच
यद्युत्तरोऽयं संग्रामे विजेष्यति महारथान् ।
अथाहरिष्ये वासांसि दिव्यानि रुचिराणि च ॥ ३१ ॥
बृहन्नला बोली—यदि ये राजकुमार उत्तर रणभूमिमें उन महारथियोंको परास्त कर देंगे, तो मैं अवश्य उनके दिव्य और सुन्दर वस्त्र ले आऊँगी ॥ ३१ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु बीभत्सुस्ततः प्राचोदयद्धयान् ।
कुरूनभिमुखः शूरो नानाध्वजपताकिनः ॥ ३२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ऐसा कहकर शूरवीर अर्जुनने भाँति-भाँतिकी ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित कौरवोंकी ओर जानेके लिये घोड़ोंको हाँक दिया ॥ ३२ ॥
तमुत्तरं वीक्ष्य रथोत्तमे स्थितं
बृहन्नलायाः सहितं महाभुजम् ।
स्त्रियश्च कन्याश्च द्विजाश्च सुव्रताः
प्रदक्षिणं चक्रुरथोचुरङ्गनाः ॥ ३३ ॥
बृहन्नलाके साथ उत्तम रथपर बैठे हुए महाबाहु उत्तरको जाते देख स्त्रियों, कन्याओं तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणोंने उसकी दक्षिणावर्त परिक्रमा की। तत्पश्चात् स्त्रियाँ और कन्याएँ बोलीं— ॥ ३३ ॥
यदर्जुनस्यर्षभतुल्यगामिनः
पुराभवत् खाण्डवदाहमङ्गलम् । कुरून् समासाद्य रणे बृहन्नले सहोत्तरेणाद्य तदस्तु मङ्गलम् ॥ ३४ ॥
‘बृहन्नले! वृषभके समान गतिवाले अर्जुनको पहले खाण्डववनदाहके समय जैसा मंगल प्राप्त हुआ था, आज युद्धमें कौरवोंके पास पहुँचनेपर राजकुमार उत्तरके साथ तुम्हें वैसा ही मंगल प्राप्त हो’ ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे उत्तरनिर्याणं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तर दिशाकी ओरसे गौओंके अपहरणके प्रसंगमें राजकुमार उत्तरका युद्धके लिये प्रस्थानविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2375)
अष्टात्रिंशोऽध्यायः
उत्तरकुमारका भय और अर्जुनका उसे आश्वासन देकर रथपर चढ़ाना
वैशम्पायन उवाच
स राजधान्या निर्याय वैराटिरकुतोभयः ।
प्रयाहीत्यब्रवीत् सूतं यत्र ते कुरवो गताः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजधानीसे निकलकर विराटकुमार उत्तरने सर्वथा निर्भय हो सारथिसे कहा—'बृहन्नले! जहाँ कौरव गये हैं, उधर ही रथ ले चलो ॥ १ ॥
समवेतान् कुरून् सर्वान् जिगीषूनवजित्य वै ।
गास्तेषां क्षिप्रमादाय पुनरेष्याम्यहं पुरम् ॥ २ ॥
‘मैं यहाँ विजयकी आशासे एकत्र होनेवाले समस्त कौरवोंको परास्त करके उनसे अपनी गौएँ वापस ले शीघ्र अपने नगरमें लौट आऊँगा’ ॥ २ ॥
ततस्तांश्चोदयामास सदश्वान् पाण्डुनन्दनः ।
ते हया नरसिंहेन नोदिता वातरंहसः ।
आलिखन्त इवाकाशमूहूः काञ्चनमालिनः ॥ ३ ॥ तब पाण्डुनन्दन अर्जुनने उत्तरके उत्तम जातिके घोड़ोंको हाँका और उनकी बाग ढीली कर दी। नरश्रेष्ठ अर्जुनके हाँकनेपर सोनेकी माला पहने हुए वे घोड़े हवाके समान वेगसे चलने लगे, मानो आकाशमें अपनी टाप अड़ाते हुए रथ लिये उड़े जा रहे हों ॥ ३ ॥
नातिदूरमथो गत्वा मत्स्यपुत्रधनंजयौ । अवेक्षेताममित्रघ्नौ कुरूणां बलिनां बलम् ॥ ४ ॥ थोड़ी ही दूर जानेपर शत्रुहन्ता विराटपुत्र उत्तर और धनंजयने महाबली कौरवोंकी विशाल सेना देखी ॥ ४ ॥
श्मशानमभितो गत्वा आससाद कुरूनथ । तां शमीमन्ववीक्षेतां व्यूढानीकांश्च सर्वशः ॥ ५ ॥ श्मशानभूमिके समीप जाकर उन्होंने कौरवोंको पा लिया। वे दोनों उस शमीवृक्षके आसपास सब ओर सेनाका व्यूह बनाकर खड़े हुए कौरव-सैनिकोंकी ओर देखने लगे ॥ ५ ॥
तदनीकं महत् तेषां विबभौ सागरोपमम् । सर्पमाणमिवाकाशे वनं बहुलपादपम् ॥ ६ ॥ उनकी वह विशालवाहिनी समुद्रके समान जान पड़ती थी। जब वह चलती, तब ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमें असंख्य वृक्षोंसे भरा हुआ वन चल रहा हो ॥ ६ ॥
ददृशे पार्थिवो रेणुर्जनितस्तेन सर्पता । दृष्टिप्रणाशो भूतानां दिवस्पृक् कुरुसत्तम ॥ ७ ॥ कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! कौरव-सेनाके चलनेसे ऊपर उठी हुई धरतीकी धूल अन्तरिक्षको छूती-सी दिखायी देती थी। उसके कारण समस्त प्राणियोंकी दृष्टिका लोप-सा हो गया था—किसीको कुछ सूझ नहीं पड़ता था ॥ ७ ॥
तदनीकं महद् दृष्ट्वा गजाश्वरथसंकुलम् । कर्णदुर्योधनकृपैर्गुप्तं शान्तनवेन च ॥ ८ ॥ द्रोणेन च सपुत्रेण महेष्वासेन धीमता । हृष्टरोमा भयोद्विग्नः पार्थं वैराटिरब्रवीत् ॥ ९ ॥ वह भारी सेना हाथी, घोड़ों एवं रथोंसे भरी हुई थी। कर्ण, दुर्योधन, कृपाचार्य, भीष्म, अश्वत्थामा और महान् धनुर्धर एवं परम बुद्धिमान् द्रोण उसकी रक्षा कर रहे थे। उसे देखकर विराटपुत्र उत्तरके रोंगटे खड़े हो गये। उसने भयसे व्याकुल होकर अर्जुनसे कहा ॥ ८-९ ॥
उत्तर उवाच
नोत्सहे कुरुभिर्योद्धुं रोमहर्षं हि पश्य मे । बहुप्रवीरमत्युग्रं देवैरपि दुरासदम् ॥ १० ॥