महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
युद्धयेयुरिति मे बुद्धिवर्तते नात्र संशयः ॥ २१ ॥ ‘भैया! मेरे विचारमें यह बात आती है कि ये कंक, बल्लव, तन्तिपाल और ग्रन्थिक भी युद्ध कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥ एतेषामपि दीयन्तां रथा ध्वजपताकिनः । कवचानि च चित्राणि दृढानि च मृदूनि च ॥ २२ ॥ प्रतिमुञ्चन्तु गात्रेषु दीयन्तामायुधानि च । वीराङ्गरूपाः पुरुषा नागराजकरोपमाः ॥ २३ ॥ ‘अतः इनके लिये भी ध्वजा और पताकाओंसे सुशोभित रथ दो। ये भी अपने अंगोंमें ऊपरसे दृढ़, किंतु भीतरसे कोमल और विचित्र कवच धारण कर लें। फिर इन्हें भी सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र अर्पित करो। इनके अंग और स्वरूप वीरोचित जान पड़ते हैं। इन वीर पुरुषोंकी भुजाएँ गजराजकी सूँड़दण्डकी भाँति शोभा पाती हैं ॥ २२-२३ ॥ नेमे जातु न युध्येरन्निति मे धीयते मतिः । एतच्छ्रुत्वा तु नृपतेर्वाक्यं त्वरितमानसः । शतानीकस्तु पार्थेभ्यो रथान् राजन् समादिशत् ॥ २४ ॥ ‘ये युद्ध न करते हों, यह कदापि सम्भव नहीं अर्थात् ये अवश्य युद्धकुशल हैं। मेरी बुद्धिका तो ऐसा ही निश्चय है।' जनमेजय! राजाका यह वचन सुनकर शतानीकने उतावले मनसे कुन्तीपुत्रोंके लिये शीघ्रतापूर्वक रथ लानेका आदेश दिया ॥ २४ ॥ सहदेवाय राज्ञे च भीमाय नकुलाय च । तान् प्रहृष्टांस्ततः सूता राजभक्तिपुरस्कृताः ॥ २५ ॥ निर्दिष्टा नरदेवेन रथाञ्छीघ्रमयोजयन् । सहदेव, राजा युधिष्ठिर, भीम और नकुल—इन चारोंके लिये रथ लानेकी आज्ञा हुई। इस बातसे पाण्डव बड़े प्रसन्न थे। तब राजभक्त सारथि महाराज विराटके बताये अनुसार रथोंको शीघ्रतापूर्वक जोतकर ले आये ॥ कवचानि विचित्राणि मृदूनि च दृढानि च ॥ २६ ॥ विराटः प्रादिशद् यानि तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । तान्यामुच्य शरीरेषु दंशितास्ते परंतपाः ॥ २७ ॥ उसके बाद अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले पाण्डुपुत्रोंको राजा विराटने अपने हाथसे विचित्र कवच प्रदान किये, जो ऊपरसे सुदृढ़ और भीतरसे कोमल थे। उन्हें लेकर उन वीरोंने अपने अंगोंमें यथास्थान बाँध लिया ॥ २६-२७ ॥ रथान् हयैः सुसम्पन्नानास्थाय च नरोत्तमाः । निर्ययुर्मुदिताः पार्थाः शत्रुसंघावमर्दिनः ॥ २८ ॥
शत्रुसमूहको रौंद डालनेवाले वे नरश्रेष्ठ कुन्तीपुत्र घोड़े जुते हुए रथोंपर बैठकर बड़ी प्रसन्नताके साथ राजभवनसे बाहर निकले ॥ २८ ॥
तरस्विनश्छन्नरूपाः सर्वे युद्धविशारदाः । रथान् हेमपरिच्छन्नानास्थाय च महारथाः ॥ २९ ॥ विराटमन्वयुः पार्थाः सहिताः कुरुपुङ्गवाः । चत्वारो भ्रातरः शूराः पाण्डवाः सत्यविक्रमाः ॥ ३० ॥
वे बड़े वेगसे चले। उन्होंने अपने यथार्थ स्वरूपको अभीतक छिपा रखा था। वे सब-के-सब युद्धकी कलामें अत्यन्त निपुण थे। कुरुवंशशिरोमणि वे चारों महारथी कुन्तीकुमार सुवर्णमण्डित रथोंपर आरूढ़ हो एक ही साथ विराटके पीछे-पीछे चले। चारों भाई पाण्डव शूरवीर और सत्यपराक्रमी थे ॥ २९-३० ॥
(दीर्घाणां च दृढानां च धनुषां ते यथाबलम् । उत्कृष्य पाशान् मौर्वीणां वीराश्चापेष्वयोजयन् ॥ ततः सुवाससः सर्वे ते वीराश्चन्दनोक्षिताः । चोदिता नरदेवेन क्षिप्रमश्वानचोदयन् ॥ ते हया हेमसंच्छन्ना बृहन्तः साधुवाहिनः । चोदिताः प्रत्यदृश्यन्त पक्षिणामिव पङ्क्तयः ॥)
उन वीरोंने अपने विशाल और सुदृढ़ धनुषोंकी डोरियोंको यथाशक्ति ऊपर खींचकर धनुषके दूसरे सिरेपर चढ़ाया। फिर सुन्दर वस्त्र धारण करके चन्दनसे चर्चित हो उन समस्त वीर पाण्डवोंने नरदेव विराटकी आज्ञासे शीघ्रतापूर्वक अपने घोड़े हाँक दिये। अच्छी तरह रथका भार वहन करनेवाले वे स्वर्णभूषित विशाल अश्व हाँके जानेपर श्रेणीबद्ध होकर उड़ते हुए पक्षियोंके समान दिखायी देने लगे।
भीमाश्च मत्तमातङ्गाः प्रभिन्नकरटामुखाः । क्षरन्तश्चैव नागेन्द्राः सुदन्ताः षष्टिहायनाः ॥ ३१ ॥ स्वारूढा युद्धकुशलैः शिक्षिता हस्तिसादिभिः । राजानमन्वयुः पश्चाच्चलन्त इव पर्वताः ॥ ३२ ॥
जिनके गण्डस्थलसे मदकी धारा बहती थी, ऐसे भयंकर मतवाले हाथी तथा सुन्दर दाँतोंवाले साठ वर्षके मदवर्षी गजराज, जिन्हें युद्धकुशल महावतोंने शिक्षा दी थी, सवारोंको अपनी पीठपर चढ़ाये राजा विराटके पीछे-पीछे इस प्रकार जा रहे थे, मानो चलते-फिरते पर्वत हों ॥ ३१-३२ ॥
विशारदानां मुख्यानां हृष्टानां चारुजीविनाम् । अष्टौ रथसहस्राणि दश नागशतानि च ॥ ३३ ॥ षष्टिश्चाश्वसहस्राणि मत्स्यानामभिनिर्ययुः । तदनीकं विराटस्य शुशुभे भरतर्षभ ॥ ३४ ॥
युद्धकी कलामें कुशल, प्रसन्न रहनेवाले तथा उत्तम जीविकावाले मत्स्यदेशके प्रधान-प्रधान वीरोंकी उस सेनामें आठ हजार रथी, एक हजार हाथीसवार तथा साठ हजार घुड़सवार थे, जो युद्धके लिये तैयार होकर निकले थे। भरतर्षभ! उनसे विराटकी वह विशाल वाहिनी अत्यन्त सुशोभित हो रही थी॥ ३३-३४॥
सम्प्रयातं तदा राजन् निरीक्षन्तं गवां पदम्।
तद् बलाग्रयं विराटस्य सम्प्रस्थितमशोभत।
दृढायुधजनाकीर्णं गजाश्वरथसंकुलम्॥ ३५॥
राजन्! उस समय गौओंके पदचिह्न देखती युद्धके लिये प्रस्थित हुई विराटकी वह श्रेष्ठ सेना अपूर्व शोभा पा रही थी। उसमें ऐसे पैदल सैनिक भरे थे, जिनके हाथोंमें मजबूत हथियार थे। साथ ही हाथी, घोड़े तथा रथके सवारोंसे भी वह सेना परिपूर्ण थी॥ ३५॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे मत्स्यराजरणोद्योगे
एकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें दक्षिण दिशाकी ओरसे गौओंके अपहरणके प्रसंगमें मत्स्यराजविराटके युद्धोद्योगसे सम्बद्ध इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ४८ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2340)
द्वात्रिंशोऽध्यायः
मत्स्य तथा त्रिगर्तदेशीय सेनाओंका परस्पर युद्ध
वैशम्पायन उवाच
निर्याय नगराच्छूरा व्यूढानीकाः प्रहारिणः ।
त्रिगर्तानस्पृशन् मत्स्याः सूर्ये परिणते सति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! नगरसे निकलकर प्रहार करनेमें कुशल वे मत्स्यदेशीय वीर योद्धा अपनी सेनाका व्यूह बनाकर चले और सूर्यके ढलते-ढलते उन्होंने त्रिगतोंको पकड़ लिया ॥ १ ॥
ते त्रिगर्ताश्च मत्स्याश्च संरब्धा युद्धदुर्मदाः ।
अन्योन्यमभिगर्जन्तो गोषु गृद्धा महाबलाः ॥ २ ॥
फिर तो क्रोधमें भरकर युद्धके लिये उन्मत्त हुए वे त्रिगर्त और मत्स्यदेशके महाबली वीर गौओंको ले जानेकी इच्छासे एक-दूसरेको लक्ष्य करके गर्जना करने लगे ॥ २ ॥
भीमाश्च मत्तमातङ्गास्तोभराङ्कुशनोदिताः ।
ग्रामणीयैः समारूढाः कुशलैर्हस्तिसादिभिः ॥ ३ ॥
तेषां समागमो घोरस्तुमुलो लोमहर्षणः ।
घ्नतां परस्परं राजन् यमराष्ट्रविवर्धनः ॥ ४ ॥
हाथियोंपर चढ़कर उन्हें चलानेमें कुशल श्रेष्ठ महावतोंद्वारा तोमरों और अंकुशोंकी मारसे आगे बढ़ाये हुए भयंकर और मतवाले गजराज दोनों ओरसे एक-दूसरेपर टूट पड़े। परस्पर शस्त्रोंका प्रहार करनेवाले हाथीसवारोंका वह कोलाहलपूर्ण भयंकर युद्ध रोंगटे खड़े कर देनेवाला एवं महासंहारकारी था ॥ ३-४ ॥
देवासुरसमो राजन्नासीत् सूर्येऽवलम्बति ।
पदातिरथनागेन्द्रहयारोहबलौघवान् ॥ ५ ॥
राजन्! सूर्य पश्चिमकी ओर ढल रहे थे। उस समय पैदल, रथी, हाथीसवार तथा घुड़सवारोंके समूहसे भरा हुआ वह युद्ध देवासुरसंग्रामके समान हो रहा था ॥ ५ ॥
अन्योन्यमभ्यापततां निघ्नतां चेतरेतरम् ।
उदतिष्ठद् रजो भौमं न प्राज्ञायत किंचन ॥ ६ ॥
एक-दूसरेपर धावा बोलकर आपसमें मार-काट मचानेवाले उन सैनिकोंके पदाघातसे इतनी धूल उड़ी कि कुछ भी सूझ-बूझ नहीं पड़ता था ॥ ६ ॥
पक्षिणश्चापतन् भूमौ सैन्येन रजसाऽऽवृताः ।
इषुभिर्व्यतिसर्पद्भिरादित्योऽन्तरधीयत ॥ ७ ॥
सेनाकी धूलसे आच्छादित होकर उड़ते हुए पक्षी भी भूमिपर गिर जाते थे। दोनों ओरसे छूटे हुए बाणोंद्वारा (आकाश खचाखच भर जानेके कारण) सूर्यदेवका दीखना बंद हो गया ॥ ७ ॥
खद्योतैरिव संयुक्तमन्तरिक्षं व्यराजत । रुक्मपृष्ठानि चापानि व्यतिषिक्तानि धन्विनाम् ॥ ८ ॥ पततां लोकवीराणां सव्यदक्षिणमस्यताम् । रथा रथैः समाजग्मुः पादातैश्च पदातयः ॥ ९ ॥
बाणोंके कारण अन्तरिक्ष मानो जुगनुओंसे भर गया हो, इस प्रकार चमक रहा था। दाँयें-बाँयें बाण मारनेवाले वे विश्वविख्यात धनुर्धर वीर जब घायल होकर गिरते थे, उस समय उनके सुवर्णकी पीठवाले धनुष दूसरोंके हाथमें चले जाते थे। रथी रथियोंसे और पैदल पैदलोंसे भिड़े हुए थे ॥ ८-९ ॥
सादिनः सादिभिश्चैव गजैश्चापि महागजाः । असिभिः पट्टिशैः प्रासैः शक्तिभिस्तोमरैरपि ॥ १० ॥ संरब्धाः समरे राजन् निजघ्नुरितरेतरम् । निघ्नन्तः समरेऽन्योन्यं शूराः परिघबाहवः ॥ ११ ॥ न शेकुरभिसंरब्धाः शूरान् कर्तुं पराङ्मुखान् ।
घुड़सवार घुड़सवारोंसे और गजारोही गजारोहियोंसे लड़ रहे थे। राजन्! वे सब क्रोधमें भरकर उस युद्धमें एक-दूसरेपर तलवार, पट्टिश, प्रास, शक्ति और तोमर आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे प्रहार कर रहे थे; किंतु परिघके समान प्रचण्ड भुजदण्डवाले वे शूरवीर परस्पर क्रोधपूर्वक प्रहार करनेपर भी सामना करनेवाले वीरोंको पीछे नहीं हटा पाते थे ॥ १०-११ १/२ ॥
कृत्तोत्तरोष्ठं सुनसं कृत्तकेशमलंकृतम् ॥ १२ ॥ अदृश्यत शिरश्छिन्नं रजोध्वस्तं सकुण्डलम् ।
बातकी बातमें, कुण्डलोंसहित कटे हुए कितने ही मस्तक धूलमें लोटने लगे। किसीकी नाक बड़ी सुन्दर थी, परन्तु ऊपरका ओठ कट गया था। कोई अलंकारोंसे अलंकृत था, किंतु उसका केशभाग कटकर उड़ गया था ॥ १२ १/२ ॥
अदृश्यंस्तत्र गात्राणि शरैश्छिन्नानि भागशः ॥ १३ ॥ शालस्कन्धनिकाशानि क्षत्रियाणां महामृधे ।
उस महासंग्राममें बहुत-से क्षत्रिय वीरोंके शरीर, जो शालवृक्षकी शाखाओंके समान विशाल एवं हृष्ट-पुष्ट थे, छिन्न-भिन्न होकर टुकड़े-टुकड़े दिखायी देने लगे ॥
नागभोगनिकाशैश्च बाहुभिश्चन्दनोक्षितैः ॥ १४ ॥ आस्तीर्णा वसुधा भाति शिरोभिश्च सकुण्डलैः ।
सर्पोंके शरीरकी भाँति सुशोभित चन्दनचर्चित भुजाओं तथा कुण्डलमण्डित मस्तकोंसे पटी हुई रणभूमि अपूर्व शोभा धारण कर रही थी ॥ १४ १/२ ॥ रथिनां रथिभिश्चात्र सम्प्रहारोऽभ्यवर्तत ॥ १५ ॥ सादिभिः सादिनां चापि पदातीनां पदातिभिः । उपाशाम्यद् रजो भौमं रुधिरेण प्रसर्पता ॥ १६ ॥ वहाँ रथियोंका रथियोंसे, घुड़सवारोंका घुड़सवारोंसे और पैदल योद्धाओंका पैदलोंसे घमासान युद्ध होने लगा। सब ओर रक्तकी धारा बह चली और उसमें सनकर धरतीकी धूल शान्त हो गयी ॥ १५-१६ ॥ कश्मलं चाविशद् घोरं निर्मर्यादमवर्तत । युद्ध करनेवाले वीरोंको मूर्च्छा आने लगी। उनमें मर्यादाशून्य भयंकर युद्ध छिड़ गया ॥ १६ १/२ ॥ (युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितस्तदा । व्यूहं कृत्वा विराटस्य अन्वयुध्यत पाण्डवः ॥ आत्मानं श्येनवत् कृत्वा तुण्डमासीद् युधिष्ठिरः । पक्षौ यमौ च भवतः पुच्छमासीद् वृकोदरः ॥ सहस्रं न्यहनत् तत्र कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । भीमसेनः सुसंक्रुद्धः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ द्विसहस्रं रथान् वीरः परलोकं प्रवेशयत् । नकुलस्त्रिशतं जघ्ने सहदेवश्चतुःशतम् ॥) पाण्डुनन्दन धर्मात्मा युधिष्ठिरने भी भाइयों-सहित व्यूह-रचना करके राजा विराटके लिये त्रिगतोंके साथ युद्ध आरम्भ किया। उन्होंने अपने-आपको श्येन (बाज) पक्षीके रूपमें उपस्थित करके उसकी चोंचका स्थान ग्रहण किया। नकुल और सहदेव दोनों पंखोंके रूपमें हो गये। भीमसेन पूँछके स्थानमें हुए। कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने शत्रुओंके एक सहस्र सैनिकोंका संहार कर डाला। सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ वीर भीमसेनने अत्यन्त कुपित हो दो हजार रथियोंको परलोक पहुँचा दिया। नकुलने तीन सौ और सहदेवने चार सौ सैनिकोंको मार डाला। उपाविशन् गरुत्मन्तः शरैर्गाढं प्रवेजिताः । अन्तरिक्षे गतिर्येषां दर्शनं चाप्यरुध्यत ॥ १७ ॥ आकाशचारी पक्षी भी बाणसमूहोंसे अत्यन्त उद्विग्न होकर इधर-उधर बैठ गये। उनका आकाशमें उड़ना और दूरतक देखना भी बंद हो गया ॥ १७ ॥ ते घ्नन्तः समरेऽन्योन्यं शूराः परिघबाहवः । न शेकुरभिसंरब्धाः शूरान् कर्तुं पराङ्मुखान् ॥ १८ ॥
परिघकी-सी मोटी बाँहोंवाले शूरमा कुपित हो एक-दूसरेपर घातक प्रहार करते हुए भी सच्चे शूरवीरोंको युद्धसे विमुख नहीं कर पाते थे ॥ १८ ॥ शतानीकः शतं हत्वा विशालाक्षश्चतुःशतम् । प्रविष्टौ महतीं सेनां त्रिगर्तानां महारथौ ॥ १९ ॥ इस प्रकार युद्ध करते-करते शतानीक सौ तथा विशालाक्ष (मदिराक्ष) चार सौ त्रिगर्त योद्धाओंको मारकर उनकी भारी सेनामें घुस गये। वे दोनों महारथी थे ॥ १९ ॥ तौ प्रविष्टौ महासेनां बलवन्तौ मनस्विनौ । आच्छेतां बहुसंरब्धौ केशाकेशि रथारथिः ॥ २० ॥ उस विशाल सेनामें घुसे हुए और अत्यन्त क्रुद्ध हुए उन बलवान् एवं मनस्वी वीरोंने उस सारी सेनाको मोहित कर दिया। वे दोनों उन त्रिगर्त सैनिकोंसे एक दूसरेके केश पकड़-पकड़कर तथा रथोंपर बैठे हुए रथियोंको गिरा-गिराकर युद्ध करने लगे ॥ २० ॥ लक्षयित्वा त्रिगर्तानां तौ प्रविष्टौ रथव्रजम् । अग्रतः सूर्यदत्तश्च मदिराक्षश्च पृष्ठतः ॥ २१ ॥ फिर उन दोनोंने त्रिगर्तोंकी रथसेनाको लक्ष्य बनाकर उसमें प्रवेश किया। सूर्यदत्तने आगेकी ओरसे आक्रमण किया और मदिराक्षने पीछेकी ओरसे ॥ २१ ॥ विराटस्तत्र संग्रामे हत्वा पञ्चशतान् रथान् । हयानां च शतान्यष्टौ हत्वा पञ्च महारथान् ॥ २२ ॥ चरन् स विविधान् मार्गान् रथेन रथसत्तमः । त्रिगर्तानां सुशर्माणमाच्छेद् रुक्मरथं रणे ॥ २३ ॥ रथियोंमें श्रेष्ठ राजा विराट्ने रथके द्वारा विविध मार्गोंसे चलते—अनेक प्रकारके रणकौशल दिखाते हुए उस युद्धमें त्रिगर्तोंके पाँच सौ रथी, आठ सौ घुड़सवार तथा पाँच महारथियोंको मार गिरानेके पश्चात् स्वर्णभूषित रथपर बैठे हुए सुशर्मापर धावा किया ॥ २२-२३ ॥ तौ व्यवहरतां तत्र महात्मानौ महाबलौ । अन्योन्यमभिगर्जन्तौ गोष्ठेषु वृषभाविव ॥ २४ ॥ वे दोनों महान् बलवान् और महामनस्वी वीर गर्जते हुए एक-दूसरेसे इस प्रकार जा भिड़े, मानो गोशालामें दो साँड़ लड़ रहे हों ॥ २४ ॥ ततो राजा त्रिगर्तानां सुशर्मा युद्धदुर्मदः । मत्स्यं समायाद् राजानं द्वैरथेन नरर्षभः ॥ २५ ॥ त्रिगर्तराज सुशर्मापर युद्धका घोर उन्माद छाया हुआ था। उस नरश्रेष्ठ वीरने राजा विराटका द्वैरथयुद्धके द्वारा सामना किया ॥ २५ ॥ ततो रथाभ्यां रथिनौ व्यतीयतुरमर्षणौ । शरान् व्यसृजतां शीघ्रं तोयधारा घना इव ॥ २६ ॥
क्रोधमें भरे हुए वे दोनों रथी अपना-अपना रथ बढ़ाकर निकट आ गये और शीघ्रतापूर्वक एक दूसरेपर बाणोंकी झड़ी लगाने लगे, मानो दो मेघ जलकी धाराएँ बरसा रहे हों ॥ २६ ॥ अन्योन्यं चापि संरब्धौ विचेरतुरमर्षणौ । कृतास्त्रौ निशितैर्बाणैरसिशक्तिगदाभृतौ ॥ २७ ॥ दोनोंका एक दूसरेके प्रति क्रोध और अमर्ष बढ़ा हुआ था। दोनों ही अस्त्रविद्यामें निपुण थे और दोनोंने ही तलवार, शक्ति तथा गदा भी ले रखी थी। उस समय दोनों तीखे बाणोंसे परस्पर प्रहार करते हुए रणभूमिमें विचरने लगे ॥ २७ ॥ ततो राजा सुशर्माणं विव्याध दशभिः शरैः । पञ्चभिः पञ्चभिश्चास्य विव्याध चतुरो हयान् ॥ २८ ॥ इसी समय राजा विराटने सुशर्माको दस बाणोंसे बींध डाला और पाँच-पाँच बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको भी घायल कर दिया ॥ २८ ॥ तथैव मत्स्यराजानं सुशर्मा युद्धदुर्मदः । पञ्चाशता शितैर्बाणैर्विव्याध परमास्त्रवित् ॥ २९ ॥ इसी प्रकार महान् अस्त्रवेत्ता सुशर्माने भी रणोन्मत्त होकर पचास तीखे बाणोंसे मत्स्यराज विराटको बींध डाला ॥ २९ ॥ ततः सैन्यं महाराज मत्स्यराजसुशर्मणोः । नाभ्यजानात् तदान्योन्यं सैन्येन रजसाऽऽवृतम् ॥ ३० ॥ महाराज! तदनन्तर सैनिकोंके पैरोंसे इतनी धूल उड़ी कि मत्स्यनरेश तथा सुशर्मा दोनोंकी सेनाएँ उससे आच्छादित हो गयीं और एक-दूसरेके विषयमें यह भी न जान सकीं कि कौन कहाँ क्या कर रहा है? ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे विराटसुशर्मयुद्धे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें दक्षिणदिशाकी गौओंके अपहरणके समय होनेवाले विराट और सुशर्माके युद्धके विषयमें बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३४ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2345)
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
सुशर्माका विराटको पकड़कर ले जाना, पाण्डवोंके प्रयत्नसे उनका छुटकारा, भीमद्वारा सुशर्माका निग्रह और युधिष्ठिरका अनुग्रह करके उसे छोड़ देना
वैशम्पायन उवाच
तमसाभिप्लुते लोके रजसा चैव भारत ।
अतिष्ठन् वै मुहूर्तं तु व्यूढानीकाः प्रहारिणः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत! उस समय [सूर्यास्त हो चुका था एवं रात्रि आ गयी थी, अतः] सब लोग धूलसे तो आवृत्त थे ही, अन्धकारसे भी आच्छादित हो गये; अतः प्रहार करनेवाले सैनिक सेनाका व्यूह बनाकर कुछ देरतक युद्ध बंद करके खड़े रहे ॥ १ ॥
ततोऽन्धकारं प्रणुदन्नुदतिष्ठत चन्द्रमाः ।
कुर्वाणो विमलां रात्रिं नन्दयन् क्षत्रियान् युधि ॥ २ ॥
इतनेमें ही अन्धकारका निवारण करते हुए चन्द्रदेवका उदय हुआ। उन्होंने उस रणक्षेत्रमें क्षत्रियोंको आनन्द प्रदान करते हुए उस रात्रिको निर्मल (अन्धकार-शून्य) बना दिया ॥ २ ॥
ततः प्रकाशमासाद्य पुनर्युद्धमवर्तत ।
घोररूपं ततस्ते स्म नावैक्षन्त परस्परम् ॥ ३ ॥
अतः उजाला हो जानेसे पुनः घोर युद्ध प्रारम्भ हो गया। उस समय (युद्धके आवेशमें) योद्धा एक दूसरेको देख नहीं रहे थे ॥ ३ ॥
ततः सुशर्मा त्रैगर्तः सह भ्रात्रा यवीयसा ।
अभ्यद्रवन्मत्स्यराजं रथव्रातेन सर्वशः ॥ ४ ॥
तदनन्तर त्रिगर्तराज सुशर्माने अपने छोटे भाईके साथ रथियोंका समूह लेकर चारों ओरसे मत्स्यराज विराटपर धावा बोल दिया ॥ ४ ॥
ततो रथाभ्यां प्रस्कन्द्य भ्रातरौ क्षत्रियर्षभौ ।
गदापाणी सुसंरब्धौ समभ्यद्रवतां रथान् ॥ ५ ॥
फिर वे क्षत्रियशिरोमणि दोनों बन्धु रथोंसे कूद पड़े और हाथमें गदा ले क्रोधमें भरकर शत्रुसेनाके रथोंकी ओर दौड़े ॥ ५ ॥
(मत्ताविव वृषावेतौ गजाविव मदोद्धतौ ।
सिंहाविव गजग्राहौ शक्रवृत्राविवोत्थितौ ॥
उभौ तुल्यबलोत्साहावुभौ तुल्यपराक्रमौ ।
उभौ तुल्यास्त्रविदुषावुभौ युद्धविशारदौ ॥) वे दोनों मतवाले साँड़ों, मदोन्मत्त गजराजों, एक ही हाथीपर आक्रमण करनेवाले दो सिंहों तथा युद्धके लिये उद्यत वृत्रासुर एवं इन्द्रके समान जान पड़ते थे। दोनोंके बल और उत्साह समान थे। दोनों ही एक-जैसे पराक्रमी और एक-से ही अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता थे। युद्ध करनेकी कलामें वे दोनों ही वीर अत्यन्त निपुण थे।
तथैव तेषां तु बलानि तानि क्रुद्धान्यथान्योन्यमभिद्रवन्ति । गदासिखड्गैश्च परश्वधैश्च प्रासैश्च तीक्ष्णाग्रसुपीतधारैः ॥ ६ ॥ इसी प्रकार उन सबकी वे सेनाएँ भी कुपित हो गदा, तलवार, खड्ग, फरसे और भलीभाँति तेज किये हुए तीखी धारवाले प्रासों (भालों) से प्रहार करती हुई एक-दूसरीपर टूट पड़ीं ॥ ६ ॥
बलं तु मत्स्यस्य बलेन राजा सर्वं त्रिगर्ताधिपतिः सुशर्मा । प्रमथ्य जित्वा च प्रसह्य मत्स्यं विराटमोजस्विनमभ्यधावत् ॥ ७ ॥ तौ निहत्य पृथग् धुर्यावुभौ तौ पार्ष्णिसारथी । विरथं मत्स्यराजानं जीवग्राहमगृह्णताम् ॥ ८ ॥ त्रिगर्तदेशके स्वामी राजा सुशर्माने अपनी सेनाके द्वारा मत्स्यराजकी सेनाको मथ डाला और बलपूर्वक उसे परास्त करके महापराक्रमी मत्स्यनरेश विराटपर चढ़ाई कर दी। उन दोनों भाइयोंने पृथक्-पृथक् विराटके दोनों घोड़ोंको मारकर उनके पार्श्वभागकी रक्षा करनेवाले सिपाहियों तथा सारथिको भी मार डाला और उन्हें रथहीन करके जीते-जी ही पकड़ लिया ॥ ७-८ ॥
तमुन्मथ्य सुशर्माथ युवतीमिव कामुकः । स्यन्दनं स्वं समारोप्य प्रययौ शीघ्रवाहनः ॥ ९ ॥ जैसे कामी पुरुष किसी युवतीको बलपूर्वक पकड़ ले, वैसे ही सुशर्माने राजा विराटको पीड़ित करके पकड़ लिया और उनको शीघ्रगामी वाहनोंसे युक्त अपने रथपर चढ़ाकर वह चल दिया ॥ ९ ॥
तस्मिन् गृहीते विरथे विराटे बलवत्तरे । प्राद्रवन्त भयान्मत्स्यास्त्रिगर्तैरर्दिता भृशम् ॥ १० ॥ अतिशय बलवान् राजा विराट जब रथहीन होकर पकड़ लिये गये, तब त्रिगर्तोंद्वारा अत्यन्त पीड़ित हुए मत्स्यदेशीय सैनिक भयभीत होकर भागने लगे ॥ १० ॥
तेषु संत्रस्यमानेषु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
प्रत्यभाषन्महाबाहुं भीमसेनमरिंदमम् ॥ ११ ॥ उनके इस प्रकार अत्यन्त भयभीत होनेपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने शत्रुओंका दमन करनेवाले महाबाहु भीमसेनसे कहा— ॥ ११ ॥ मत्स्यराजः परामृष्टस्त्रिगर्तेन सुशर्मणा । तं मोचय महाबाहो न गच्छेद द्विषतां वशम् ॥ १२ ॥ ‘महाबाहो! त्रिगर्तराज सुशर्माने मत्स्यराजको पकड़ लिया है। उन्हें शीघ्र छुड़ाओ; जिससे वे शत्रुओंके वशमें न पड़ जायें ॥ १२ ॥ उषिताः स्म सुखं सर्वे सर्वकामैः सुपूजिताः । भीमसेन त्वया कार्या तस्य वासस्य निष्कृतिः ॥ १३ ॥ ‘हम सब लोग उनके यहाँ सुखपूर्वक रहे हैं और उन्होंने हमें सब प्रकारकी अभीष्ट वस्तुएँ देकर हमारा भलीभाँति सत्कार किया है। अतः भीमसेन! तुम्हें उनके घरमें रहनेके उपकारका बदला चुकाना चाहिये’ ॥ १३ ॥
भीमसेन उवाच
अहमेनं परित्रास्ये शासनात् तव पार्थिव । पश्य मे सुमहत् कर्म युध्यतः सह शत्रुभिः ॥ १४ ॥ भीमसेन बोले—महाराज! आपकी आज्ञासे मैं इन्हें सुशर्माके हाथोंसे छुड़ा लूँगा। आज आप शत्रुओंके साथ युद्ध करते समय मेरे महान् पराक्रमको देखें ॥ १४ ॥ स्वबाहुबलमाश्रित्य तिष्ठ त्वं भ्रातृभिः सह । एकान्तमाश्रितो राजन् पश्य मेऽद्य पराक्रमम् ॥ १५ ॥ मैं अपने बाहुबलका भरोसा करके लडूंगा। राजन्! आज आप भाइयोंसहित एकान्तमें खड़े होकर अब मेरा पराक्रम देखें ॥ १५ ॥ सुस्कन्धोऽयं महावृक्षो गदारूप इव स्थितः । अहमेनम्पारुज्य द्रावयिष्यामि शात्रवान् ॥ १६ ॥ यह सामने जो महान् वृक्ष है, इसकी शाखाएँ बड़ी सुन्दर हैं। यह तो मानो गदाके ही रूपमें खड़ा है। अतः मैं इसीको उखाड़कर इसके द्वारा शत्रुदलको मार भगाऊँगा ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
तं मत्तमिव मातङ्गं वीक्षमाणं वनस्पतिम् । अब्रवीद् भ्रातरं वीरं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! यह कहकर भीमसेन मदोन्मत्त गजराजकी भाँति उस वृक्षकी ओर देखने लगे। तब धर्मराज युधिष्ठिरने अपने वीर भ्रातासे कहा— ॥ १७ ॥ मा भीम साहसं कार्षीस्तिष्ठत्वेष वनस्पतिः । मा त्वां वृक्षेण कर्माणि कुर्वाणमतिमानुषम् ॥ १८ ॥
जनाः समवबुध्येरन् भीमोऽयमिति भारत।
अन्यदेवायुधं किंचित् प्रतिपद्यस्व मानुषम्॥ १९॥
'भीमसेन! ऐसा दुःसाहस न करो, इस वृक्षको खड़ा रहने दो। यदि तुम इस महावृक्षको उखाड़नेका अतिमानुष (मानवोंके लिये असाध्य) कर्म करोगे, तो सब लोग पहचान लेंगे कि यह तो भीम है। अतः भारत! तुम किसी दूसरे मानवोचित आयुधको ही ग्रहण करो॥ १८-१९॥
चापं वा यदि वा शक्तिं निस्त्रिंशं वा परश्वधम्।
यदेव मानुषं भीम भवेदन्यैरलक्षितम्॥ २०॥
तदेवायुधमादाय मोक्षयाशु महीपतिम्।
यमौ च चक्ररक्षौ ते भवितारौ महाबलौ॥ २१॥
सहिताः समरे तत्र मत्स्यराजं परीप्सत।
'धनुष, शक्ति, खड्ग अथवा कुठार, जो भी मनुष्योचित अस्त्र-शस्त्र तुम्हें ठीक लगे; जिससे तुम दूसरोंद्वारा पहचाने न जा सको, वही लेकर राजाको शीघ्र छुड़ाओ। ये महाबली नकुल और सहदेव तुम्हारे रथके पहियोंकी रक्षा करेंगे। तुम तीनों भाई युद्धमें एक साथ मिलकर महाराज विराटको छुड़ाओ'॥ २०-२१ १/२॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु वेगेन भीमसेनो महाबलः॥ २२॥
गृहीत्वा तु धनुः श्रेष्ठं जवेन सुमहाजवः।
व्यमुञ्चच्छरवर्षाणि सतोय इव तोयदः॥ २३॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! युधिष्ठिरके उक्त आदेश देनेपर महान् वेगशाली महाबली भीमसेनने शीघ्रतापूर्वक एक उत्तम धनुष हाथमें ले लिया। फिर तो जैसे मेघ जलकी धारा बरसाता हो, उसी प्रकार वे वेगपूर्वक बाणोंकी वर्षा करने लगे॥ २२-२३॥
तं भीमो भीमकर्माणं सुशर्माणमथाद्रवत्।
विराटं समवेक्ष्यैनं तिष्ठ तिष्ठेति चावदत्॥ २४॥
तदनन्तर भीमसेन भयंकर कर्म करनेवाले सुशर्माकी ओर दौड़े और विराटकी ओर देखते हुए सुशर्मासे बोले—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह'॥ २४॥
सुशर्मा चिन्तयामास कालान्तकयमोपमम्।
तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तं पृष्ठतो रथपुङ्गवः।
पश्यतां सुमहत् कर्म महद् युद्धमुपस्थितम्॥ २५॥
रथियोंमें श्रेष्ठ सुशर्मा पीछेकी ओरसे आते और 'खड़ा रह, खड़ा रह' कहते हुए काल, अन्तक एवं यमराजके समान भयंकर वीर पुरुषको देखकर चिन्तामें पड़ गया और अपने
साथियोंसे बोला—‘देखो, फिर बड़ा भारी युद्ध उपस्थित हुआ है। इसमें महान् पराक्रम दिखाओ' ॥ २५ ॥ परावृत्तो धनुर्गृह्य सुशर्मा भ्रातृभिः सह । निमेषान्तरमात्रेण भीमसेनेन ते रथाः ॥ २६ ॥ रथानां च गजानां च वाजिनां च ससादिनाम् । सहस्रशतसङ्घाताः शूराणामुग्रधन्विनाम् ॥ २७ ॥ पातिता भीमसेनेन विराटस्य समीपतः । पत्तयो निहतास्तेषां गदां गृह्य महात्मना ॥ २८ ॥ ऐसा कहकर सुशर्मा भाइयोंसहित धनुष उठाये लौट पड़ा। इधर महात्मा भीमसेनने निमेषमात्रमें ही गदा लेकर शत्रुओंके भयंकर धनुष धारण करनेवाले रथी, हाथीसवार और घुड़सवार वीरोंके एक लाख सैनिकोंके समूहोंको राजा विराटके समीप मार गिराया और बहुत-से पैदल सिपाहियोंका भी संहार कर डाला ॥ २६—२८ ॥ तद् दृष्ट्वा तादृशं युद्धं सुशर्मा युद्धदुर्मदः । चिन्तयामास मनसा किं शेषं हि बलस्य मे । अपरो दृश्यते सैन्ये पुरा मग्नो महाबले ॥ २९ ॥ ऐसा भयानक युद्ध देख रणोन्मत्त सुशर्मा मन-ही-मन सोचने लगा, 'जान पड़ता है, मेरी सेना बुरी तरह मारी जायगी; क्योंकि मेरा दूसरा भाई भी पहलेसे ही इस विशाल सैन्य-समुद्रमें डूबा हुआ दिखायी देता है' ॥ २९ ॥ आकर्णपूर्णेन तदा धनुषा प्रत्यदृश्यत । सुशर्मा सायकांस्तीक्ष्णान् क्षिपते च पुनः पुनः ॥ ३० ॥ ततः समस्तास्ते सर्वे तुरगानभ्यचोदयन् । दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणास्त्रिगर्तान् प्रत्यमर्षणाः ॥ ३१ ॥ ऐसा विचारकर वह कानतक खींचे हुए धनुषके द्वारा युद्धके लिये उद्यत दिखायी देने लगा। सुशर्मा बारंबार तीखे बाणोंकी झड़ी लगा रहा है, यह देख सम्पूर्ण मत्स्यदेशीय योद्धा त्रिगर्तोंके प्रति कुपित हो दिव्यास्त्र प्रकट करते हुए अपने रथोंके घोड़ोंको आगे बढ़ाने लगे ॥ ३०-३१ ॥ तान् निवृत्तरथान् दृष्ट्वा पाण्डवान् सा महाचमूः । वैराटिः परमक्रुद्धो युयुधे परमाद्भुतम् ॥ ३२ ॥ पाण्डवोंको त्रिगर्तोंकी ओर रथ लौटाते देख मत्स्यवीरोंकी वह विशालवाहिनी भी लौट पड़ी। विराटके पुत्र श्वेत अत्यन्त क्रोधमें भरकर बड़ा अद्भुत युद्ध करने लगे ॥ ३२ ॥ सहस्रमवधीत् तत्र कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । भीमः सप्त सहस्राणि यमलोकमदर्शयत् ॥ ३३ ॥
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने एक हजार त्रिगर्तोंको मार गिराया। भीमसेनने सात हजार योद्धाओंको यमलोकका दर्शन कराया ।। ३३ ।।
नकुलश्चापि सप्तैव शतानि प्राहिणोच्छरैः ।
शतानि त्रीणि शूराणां सहदेवः प्रतापवान् ।। ३४ ।।
युधिष्ठिरसमादिष्टो निजघ्ने पुरुषर्षभः ।
नकुलने अपने बाणोंसे सात सौ सैनिकोंको यमराजके घर भेज दिया तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ प्रतापी वीर सहदेवने युधिष्ठिरकी आज्ञासे तीन सौ शूरवीरोंका संहार कर डाला ।। ३४ १/२ ।।
ततोऽभ्यपतदत्युग्रः सुशर्माणमुदायुधः ।। ३५ ।।
हत्वा तां महतीं सेनां त्रिगर्तानां महारथः ।
तदनन्तर महारथी सहदेव त्रिगर्तोंकी उस महासेनाका संहार करके अत्यन्त उग्र रूप धारण किये हाथमें धनुष ले सुशर्मापर चढ़ आये ।। ३५ १/२ ।।
ततो युधिष्ठिरो राजा त्वरमाणो महारथः ।। ३६ ।।
अभिपत्य सुशर्माणं शरैरभ्याहनद् भृशम् ।
तत्पश्चात् महारथी राजा युधिष्ठिर भी बड़ी उतावलीके साथ सुशर्मापर धावा बोलकर उसे बाणोंद्वारा बारंबार बींधने लगे ।। ३६ १/२ ।।
सुशर्मापि सुसंरब्धस्त्वरमाणो युधिष्ठिरम् ।। ३७ ।।
अविध्यन्नवभिर्बाणैश्चतुर्भिश्चतुरो हयान् ।
तब सुशर्माने भी अत्यन्त कुपित हो बड़ी फुर्तीके साथ नौ बाणोंसे राजा युधिष्ठिरको और चार बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको बींध डाला ।। ३७ १/२ ।।
ततो राजन्नाशुकारी कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ।। ३८ ।।
समासाद्य सुशर्माणमश्वानस्य व्यपोथयत् ।
पृष्ठगोपांश्च तस्याथ हत्वा परमसायकैः ।। ३९ ।।
अथास्य सारथिं क्रुद्धो रथोपस्थादपातयत् ।
राजन्! फिर तो शीघ्रता करनेवाले कुन्तीपुत्र भीमने सुशर्माके पास पहुँचकर उत्तम बाणोंसे उसके घोड़ोंको मार डाला। साथ ही उसके पृष्ठरक्षकोंको भी मारकर कुपित हो उसके सारथिको भी रथसे नीचे गिरा दिया ।। ३८-३९ १/२ ।।
चक्ररक्षश्च शूरो वै मदिराक्षोऽतिविश्रुतः ।। ४० ।।
समायाद् विरथं दृष्ट्वा त्रिगर्तं प्राहरत् तदा ।
सुशर्माको रथहीन हुआ देखकर राजा विराटके चक्ररक्षक सुप्रसिद्ध वीर मदिराक्ष भी वहाँ आ पहुँचे और त्रिगर्तनरेशपर बाणोंसे प्रहार करने लगे ।। ४० १/२ ।।
ततो विराटः प्रस्कन्द्य रथादथ सुशर्मणः ।। ४१ ।।
गदां तस्य परामृश्य तमेवाभ्यद्रवद् बली ।
स चचार गदापाणिर्वृद्धोऽपि तरुणो यथा ॥ ४२ ॥
इसी बीचमें बलवान् राजा विराट सुशर्माके रथसे कूद पड़े और उसकी गदा लेकर उसीकी ओर दौड़े। उस समय हाथमें गदा लिये राजा विराट बूढ़े होनेपर भी तरुणके समान रणभूमिमें विचर रहे थे ॥ ४१-४२ ॥
पलायमानं त्रैगतं दृष्ट्वा भीमोऽभ्याभाषत ।
राजपुत्र निवर्तस्व न ते युक्तं पलायनम् ॥ ४३ ॥
इसी बीचमें मौका पाकर त्रिगर्तराज भागने लगा। उसे पलायन करते देख भीमसेन बोले—‘राजकुमार! लौट आओ। तुम्हारा युद्धसे पीठ दिखाकर भागना उचित नहीं है ॥ ४३ ॥
अनेन वीर्येण कथं गास्त्वं प्रार्थयसे बलात् ।
कथं चानुचरांस्त्यक्त्वा शत्रुमध्ये विषीदसि ॥ ४४ ॥
‘इसी पराक्रमके भरोसे तुम विराटकी गौओंको बलपूर्वक कैसे ले जाना चाहते थे? अपने सेवकोंको शत्रुओंके बीचमें छोड़कर क्यों भागते और विषाद करते हो?’ ॥ ४४ ॥
इत्युक्तः स तु पार्थेन सुशर्मा रथयूथपः ।
तिष्ठ तिष्ठेति भीमं स सहसाऽभ्यद्रवद् बली ॥ ४५ ॥
भीमस्तु भीमसंकाशो रथात् प्रस्कन्द्य पाण्डवः ।
प्राद्रवत् तूर्णमव्यग्रो जीवितेप्सुः सुशर्मणः ॥ ४६ ॥ भीमसेनके ऐसा कहनेपर रथियोंके यूथका अधिपति बलवान् सुशर्मा ‘खड़ा रह, खड़ा रह’, ऐसा कहते हुए सहसा भीमसेनपर टूट पड़ा। परंतु पाण्डुनन्दन भीम तो भीम-जैसे ही थे; वे तनिक भी व्यग्र नहीं हुए; अपितु रथसे कूदकर सुशर्माके प्राण लेनेके लिये बड़े वेगसे उसकी ओर दौड़े ॥ ४५-४६ ॥
तं भीमसेनो धावन्तमभ्यधावत वीर्यवान् ।
त्रिगर्तराजमादातुं सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥ ४७ ॥
तब सुशर्मा फिर भाग चला और पराक्रमी भीमसेन त्रिगर्तराजको पकड़नेके लिये उसी प्रकार उसका पीछा करने लगे, जैसे सिंह छोटे मृगोंको पकड़नेके लिये जाता है ॥ ४७ ॥
अभिद्रुत्य सुशर्माणं केशपक्षे परामृशत् ।
समुद्यम्य तु रोषात् तं निष्पिषेष महीतले ॥ ४८ ॥
सुशर्माके पास पहुँचकर भीमने उसके केश पकड़ लिये और क्रोधपूर्वक उसे उठाकर पृथ्वीपर दे मारा। तत्पश्चात् उसे वहीं रगड़ने लगे ॥ ४८ ॥
पदा मूर्ध्नि महाबाहुः प्राहरद् विलपिष्यतः ।
तस्य जानुं ददौ भीमो जघ्ने चैनमरत्निना ।
स मोहमगमद् राजा प्रहारवरपीडितः ॥ ४९ ॥
इससे सुशर्मा विलाप करने लगा। उस समय भीमने उसके मस्तकपर लात मारी और उसके पेटको घुटनोंसे दबाकर ऐसा घूँसा मारा कि उसके भारी आघातसे पीड़ित होकर राजा सुशर्मा मूर्च्छित हो गया ॥ ४९ ॥
तस्मिन् गृहीते विरथे त्रिगर्तानां महारथे ।
अभज्यत बलं सर्वं त्रैगतं तद् भयातुरम् ॥ ५० ॥
त्रिगर्तोका महारथी वीर सुशर्मा जब रथहीन होकर कैद कर लिया गया, तब वह सारी त्रिगर्तसेना भयसे व्याकुल हो तितर-बितर हो गयी ॥ ५० ॥
निवर्त्य गास्ततः सर्वाः पाण्डुपुत्रा महारथाः ।
अवजित्य सुशर्माणं धनं चादाय सर्वशः ॥ ५१ ॥
तदनन्तर पाण्डुके महारथी पुत्र सुशर्माको परास्त करनेके पश्चात् सब गौओंको लौटाकर और लूटका सारा धन वापस लेकर चले ॥ ५१ ॥
स्वबाहुबलसम्पन्ना ह्रीनिषेवा यतव्रताः ।
विराटस्य महात्मानः परिक्लेशविनाशनाः ॥ ५२ ॥
वे सभी अपने बाहुबलसे सम्पन्न, लज्जाशील, संयमपूर्वक व्रतपालनमें तत्पर, महात्मा तथा विराटका सारा क्लेश दूर करनेवाले थे ॥ ५२ ॥
स्थिताः समक्षं ते सर्वे त्वथ भीमोऽभ्यभाषत ॥ ५३ ॥
नायं पापसमाचारो मत्तो जीवितुमर्हति ।
किं तु शक्यं मया कर्तुं यद् राजा सततं घृणी ॥ ५४ ॥
जब वे सब राजाके सामने आकर खड़े हुए, तब भीमसेन बोले—‘यह पापाचारी सुशर्मा मेरे हाथसे छूटकर जीवित रहनेयोग्य तो नहीं है; परंतु मैं कर ही क्या सकता हूँ? हमारे महाराज सदाके दयालु हैं’ ॥ ५३-५४ ॥
गले गृहीत्वा राजानमानीय विवशं वशम् ।
तत एनं विचेष्टन्तं बद्ध्वा पार्थो वृकोदरः ॥ ५५ ॥
रथमारोपयामास विसंज्ञं पांसुगुण्ठितम् ।
इसके बाद भीम राजा सुशर्माका गला पकड़कर ले आये। उस समय वह लाचार होकर उनके वशमें पड़ा था और छूटनेके लिये छटपटा रहा था। कुन्तीपुत्र भीमने सुशर्माको रस्सियोंसे बाँधकर रथपर रख दिया। उसके सारे अंग धूलमें सने थे और चेतना लुप्त-सी हो रही थी ॥ ५५ १/२ ॥
अभ्येत्य रणमध्यस्थमभ्यगच्छद् युधिष्ठिरम् ॥ ५६ ॥
दर्शयामास भीमस्तु सुशर्माणं नराधिपम् ।
इसके बाद भीमने रणभूमिमें स्थित राजा युधिष्ठिरके पास जाकर उन्हें राजा सुशर्माको दिखलाया ॥ ५६ १/२ ॥
प्रोवाच पुरुषव्याघ्रो भीममाहवशोभिनम् ॥ ५७ ॥
तं राजा प्राहसद् दृष्ट्वा मुच्यतां वै नराधमः ।
एवमुक्तोऽब्रवीद् भीमः सुशर्माणं महाबलम् ॥ ५८ ॥
भीम युद्धमें अत्यन्त सुशोभित होते थे। पुरुष-श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर सुशर्माको उस दशामें देखकर हँसे और भीमसेनसे बोले—'इस नराधमको छोड़ दो।' उनके ऐसा कहनेपर भीम महाबली सुशर्मासे बोले ॥ ५७-५८ ॥
भीम उवाच
जीवितुं चेच्छसे मूढ हेतुं मे गदतः शृणु ।
दासोऽस्मीति त्वया वाच्यं संसत्सु च सभासु च ॥ ५९ ॥
**भीमसेनने कहा—**मूर्ख! यदि तू जीवित रहना चाहता है, तो उसका उपाय बताता हूँ; मेरी बात सुन। तुझे संसदों और सभाओंमें जाकर सदा यही कहना होगा कि ‘मैं राजा विराट्का दास हूँ’ ॥ ५९ ॥
एवं ते जीवितं दद्यामेष युद्धजितो विधिः ।
तमुवाच ततो ज्येष्ठो भ्राता सप्रणयं वचः ॥ ६० ॥
ऐसा स्वीकार हो तो तुझे जीवन-दान दूँगा। युद्धमें जीतनेवाले पुरुषोंका यही नियम है। तब बड़े भ्राता युधिष्ठिरने भीमसे प्रेमपूर्वक कहा ॥ ६० ॥
युधिष्ठिर उवाच
मुञ्च मुञ्चाधमाचारं प्रमाणं यदि ते वयम् ।
दासभावं गतो ह्येष विराटस्य महीपतेः ।
अदासो गच्छ मुक्तोऽसि मैवं कार्षीः कदाचन ॥ ६१ ॥
**तब युधिष्ठिर बोले—**भैया! यदि तुम मेरी बात मानते हो, तो इस पापाचारीको ‘छोड़ दो, छोड़ दो’। यह महाराज विराट्का दास तो हो ही चुका है। (इसके बाद वे सुशर्मासे बोले—) ‘तुम दास नहीं रहे, जाओ, छोड़ दिये गये। फिर कभी ‘ऐसा काम न करना’ ॥ ६१ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें दक्षिणदिशाकी गौओंका अपहरण करते समय सुशर्माके निग्रहसे सम्बन्ध रखनेवाला तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ६३ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2355)
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
राजा विराटद्वारा पाण्डवोंका सम्मान, युधिष्ठिरद्वारा राजाका अभिनन्दन तथा विराटनगरमें राजाकी विजयघोषणा
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ते तु सव्रीडः सुशर्माऽऽसीदधोमुखः ।
स मुक्तोऽभ्येत्य राजानमभिवाद्य प्रतस्थिवान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर सुशर्माने लज्जित होकर अपना मुँह नीचे कर लिया और बन्धनसे मुक्त हो राजा विराटके पास जा उन्हें प्रणाम करके अपने देशको प्रस्थान किया ॥ १ ॥
विसृज्य तु सुशर्माणं पाण्डवास्ते हतद्विषः ।
स्वबाहुबलसम्पन्ना ह्रीनिषेवा यतव्रताः ॥ २ ॥
संग्रामशिरसो मध्ये तां रात्रिं सुखिनोऽवसन् ।
इस प्रकार सुशर्माको मुक्त करके शत्रुओंका संहार करनेवाले, अपने बाहुबलसे सम्पन्न, लज्जाशील और संयमपूर्वक व्रतपालनमें तत्पर रहनेवाले वे पाण्डव उस युद्धके मुहानेपर ही रातभर सुखसे रहे ॥ २ ½ ॥
ततो विराटः कौन्तेयानतिमानुषविक्रमान् ।
अर्चयामास वित्तेन मानेन च महारथान् ॥ ३ ॥
तदनन्तर राजा विराटने अतिमानुष (मानवीय शक्तिसे परे) पराक्रम करनेवाले महारथी कुन्तीपुत्रोंका धन और मानदानद्वारा सत्कार किया ॥ ३ ॥
विराट उवाच
यथैव मम रत्नानि युष्माकं तानि वै तथा ।
कार्यं कुरुत वै सर्वे यथाकामं यथासुखम् ॥ ४ ॥
ददाम्यलंकृताः कन्या वसूनि विविधानि च ।
मनसश्चाप्यभिप्रेतं युद्धे शत्रुनिबर्हणाः ॥ ५ ॥
विराटने कहा— युद्धमें शत्रुओंका संहार करनेवाले वीरो! ये रत्न और धन जैसे मेरे हैं, वैसे ही तुमलोगोंके भी। तुम सब लोग यहाँ सुखपूर्वक रहो और जिस कार्यमें तुमलोगोंकी रुचि हो, वही करो। मैं तुम सबको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कन्याएँ, नाना प्रकारके रत्न, धन तथा और भी मनोवांछित पदार्थ देता हूँ ॥ ४-५ ॥
युष्माकं विक्रमादद्य मुक्तोऽहं स्वस्तिमानिह ।
तस्माद् भवन्तो मत्स्यानामीश्वराः सर्व एव हि ॥ ६ ॥ आज मैं तुमलोगोंके ही पराक्रमसे यहाँ शत्रुके पंजेसे कुशलपूर्वक छूटकर आया हूँ। अतः तुमलोग मत्स्यदेशके स्वामी ही हो ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
तथेतिवादिनं मत्स्यं कौरवेयाः पृथक् पृथक् । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे युधिष्ठिरपुरोगमाः ॥ ७ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**इस प्रकार कहनेवाले मत्स्यराजसे युधिष्ठिर आदि सभी कुरुवंशी पृथक्-पृथक् हाथ जोड़कर बोले— ॥ ७ ॥ प्रतिनन्दाम ते वाक्यं सर्वं चैव विशाम्पते । एतेनैव प्रतीताः स्म यत् त्वं मुक्तोऽद्य शत्रुभिः ॥ ८ ॥ 'महाराज! आपका कहना ठीक है। हम आपके सम्पूर्ण वचनोंका अभिनन्दन करते हैं, किंतु हमलोग इतनेसे ही संतुष्ट हैं कि आप आज शत्रुओंसे मुक्त हो गये' ॥ ८ ॥ ततोऽब्रवीत् प्रीतमना मत्स्यराजो युधिष्ठिरम् । पुनरेव महाबाहुर्विराटो राजसत्तमः ॥ ९ ॥ एहि त्वामभिषेक्ष्यामि मत्स्यराजस्तु नो भवान् ॥ १० ॥ तब राजाओंमें श्रेष्ठ मत्स्यनरेश महाबाहु विराट्ने मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न होकर पुनः युधिष्ठिरसे कहा—'कंकजी! आइये, मैं आपका अभिषेक करूँगा। आप ही हमारे मत्स्यदेशके राजा बनें ॥ ९-१० ॥ मनसश्चाप्यभिप्रेतं यथेष्टं भुवि दुर्लभम् । तत् तेऽहं सम्प्रदास्यामि सर्वमर्हति नो भवान् ॥ ११ ॥ 'इस पृथ्वीपर दुर्लभ जो और भी प्रिय तथा मनोवांछित पदार्थ होगा, वह भी मैं आपको दूँगा। आप तो हमारा सब कुछ पानेके अधिकारी हैं ॥ ११ ॥ रत्नानि गाः सुवर्णं च मणिमुक्तमथापि च । वैयाघ्रपद्य विप्रेन्द्र सर्वथैव नमोऽस्तु ते ॥ १२ ॥ 'व्याघ्रपदगोत्रमें उत्पन्न विप्रवर! मेरे रत्न, गौएँ, सुवर्ण, मणि तथा मोती भी आपके अर्पण हैं। आपको हमारा सब प्रकारसे नमस्कार है ॥ १२ ॥ त्वत्कृते ह्यद्य पश्यामि राज्यं संतानमेव च । यतश्च जातसंरम्भो न च शत्रुवशं गतः ॥ १३ ॥ 'आपके कारण ही आज मैं अपने राज्य और संतानका मुख देख पाऊँगा; क्योंकि पकड़े जानेपर मैं भयभीत हो गया था, किंतु आपके पराक्रमसे शत्रुके अधीन नहीं रहा' ॥ १३ ॥ ततो युधिष्ठिरो मत्स्यं पुनरेवाभ्यभाषत ।