महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2343, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिघकी-सी मोटी बाँहोंवाले शूरमा कुपित हो एक-दूसरेपर घातक प्रहार करते हुए भी सच्चे शूरवीरोंको युद्धसे विमुख नहीं कर पाते थे ॥ १८ ॥ शतानीकः शतं हत्वा विशालाक्षश्चतुःशतम् । प्रविष्टौ महतीं सेनां त्रिगर्तानां महारथौ ॥ १९ ॥ इस प्रकार युद्ध करते-करते शतानीक सौ तथा विशालाक्ष (मदिराक्ष) चार सौ त्रिगर्त योद्धाओंको मारकर उनकी भारी सेनामें घुस गये। वे दोनों महारथी थे ॥ १९ ॥ तौ प्रविष्टौ महासेनां बलवन्तौ मनस्विनौ । आच्छेतां बहुसंरब्धौ केशाकेशि रथारथिः ॥ २० ॥ उस विशाल सेनामें घुसे हुए और अत्यन्त क्रुद्ध हुए उन बलवान् एवं मनस्वी वीरोंने उस सारी सेनाको मोहित कर दिया। वे दोनों उन त्रिगर्त सैनिकोंसे एक दूसरेके केश पकड़-पकड़कर तथा रथोंपर बैठे हुए रथियोंको गिरा-गिराकर युद्ध करने लगे ॥ २० ॥ लक्षयित्वा त्रिगर्तानां तौ प्रविष्टौ रथव्रजम् । अग्रतः सूर्यदत्तश्च मदिराक्षश्च पृष्ठतः ॥ २१ ॥ फिर उन दोनोंने त्रिगर्तोंकी रथसेनाको लक्ष्य बनाकर उसमें प्रवेश किया। सूर्यदत्तने आगेकी ओरसे आक्रमण किया और मदिराक्षने पीछेकी ओरसे ॥ २१ ॥ विराटस्तत्र संग्रामे हत्वा पञ्चशतान् रथान् । हयानां च शतान्यष्टौ हत्वा पञ्च महारथान् ॥ २२ ॥ चरन् स विविधान् मार्गान् रथेन रथसत्तमः । त्रिगर्तानां सुशर्माणमाच्छेद् रुक्मरथं रणे ॥ २३ ॥ रथियोंमें श्रेष्ठ राजा विराट्ने रथके द्वारा विविध मार्गोंसे चलते—अनेक प्रकारके रणकौशल दिखाते हुए उस युद्धमें त्रिगर्तोंके पाँच सौ रथी, आठ सौ घुड़सवार तथा पाँच महारथियोंको मार गिरानेके पश्चात् स्वर्णभूषित रथपर बैठे हुए सुशर्मापर धावा किया ॥ २२-२३ ॥ तौ व्यवहरतां तत्र महात्मानौ महाबलौ । अन्योन्यमभिगर्जन्तौ गोष्ठेषु वृषभाविव ॥ २४ ॥ वे दोनों महान् बलवान् और महामनस्वी वीर गर्जते हुए एक-दूसरेसे इस प्रकार जा भिड़े, मानो गोशालामें दो साँड़ लड़ रहे हों ॥ २४ ॥ ततो राजा त्रिगर्तानां सुशर्मा युद्धदुर्मदः । मत्स्यं समायाद् राजानं द्वैरथेन नरर्षभः ॥ २५ ॥ त्रिगर्तराज सुशर्मापर युद्धका घोर उन्माद छाया हुआ था। उस नरश्रेष्ठ वीरने राजा विराटका द्वैरथयुद्धके द्वारा सामना किया ॥ २५ ॥ ततो रथाभ्यां रथिनौ व्यतीयतुरमर्षणौ । शरान् व्यसृजतां शीघ्रं तोयधारा घना इव ॥ २६ ॥