महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2342, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्पोंके शरीरकी भाँति सुशोभित चन्दनचर्चित भुजाओं तथा कुण्डलमण्डित मस्तकोंसे पटी हुई रणभूमि अपूर्व शोभा धारण कर रही थी ॥ १४ १/२ ॥ रथिनां रथिभिश्चात्र सम्प्रहारोऽभ्यवर्तत ॥ १५ ॥ सादिभिः सादिनां चापि पदातीनां पदातिभिः । उपाशाम्यद् रजो भौमं रुधिरेण प्रसर्पता ॥ १६ ॥ वहाँ रथियोंका रथियोंसे, घुड़सवारोंका घुड़सवारोंसे और पैदल योद्धाओंका पैदलोंसे घमासान युद्ध होने लगा। सब ओर रक्तकी धारा बह चली और उसमें सनकर धरतीकी धूल शान्त हो गयी ॥ १५-१६ ॥ कश्मलं चाविशद् घोरं निर्मर्यादमवर्तत । युद्ध करनेवाले वीरोंको मूर्च्छा आने लगी। उनमें मर्यादाशून्य भयंकर युद्ध छिड़ गया ॥ १६ १/२ ॥ (युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितस्तदा । व्यूहं कृत्वा विराटस्य अन्वयुध्यत पाण्डवः ॥ आत्मानं श्येनवत् कृत्वा तुण्डमासीद् युधिष्ठिरः । पक्षौ यमौ च भवतः पुच्छमासीद् वृकोदरः ॥ सहस्रं न्यहनत् तत्र कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । भीमसेनः सुसंक्रुद्धः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ द्विसहस्रं रथान् वीरः परलोकं प्रवेशयत् । नकुलस्त्रिशतं जघ्ने सहदेवश्चतुःशतम् ॥) पाण्डुनन्दन धर्मात्मा युधिष्ठिरने भी भाइयों-सहित व्यूह-रचना करके राजा विराटके लिये त्रिगतोंके साथ युद्ध आरम्भ किया। उन्होंने अपने-आपको श्येन (बाज) पक्षीके रूपमें उपस्थित करके उसकी चोंचका स्थान ग्रहण किया। नकुल और सहदेव दोनों पंखोंके रूपमें हो गये। भीमसेन पूँछके स्थानमें हुए। कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने शत्रुओंके एक सहस्र सैनिकोंका संहार कर डाला। सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ वीर भीमसेनने अत्यन्त कुपित हो दो हजार रथियोंको परलोक पहुँचा दिया। नकुलने तीन सौ और सहदेवने चार सौ सैनिकोंको मार डाला। उपाविशन् गरुत्मन्तः शरैर्गाढं प्रवेजिताः । अन्तरिक्षे गतिर्येषां दर्शनं चाप्यरुध्यत ॥ १७ ॥ आकाशचारी पक्षी भी बाणसमूहोंसे अत्यन्त उद्विग्न होकर इधर-उधर बैठ गये। उनका आकाशमें उड़ना और दूरतक देखना भी बंद हो गया ॥ १७ ॥ ते घ्नन्तः समरेऽन्योन्यं शूराः परिघबाहवः । न शेकुरभिसंरब्धाः शूरान् कर्तुं पराङ्मुखान् ॥ १८ ॥