महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदर्शनीया प्रमुखे यशस्विनी प्रीत्याब्रवीदर्जुनमायतेक्षणा ॥ ४ ॥ विराटकुमारी उत्तरा स्त्रियोंमें रत्नस्वरूपा और मनको प्रिय लगनेवाली थी। वह उस राजभवनमें इन्द्रकी साम्राज्यलक्ष्मीके समान सम्मानित थी। उसके नेत्र बड़े-बड़े थे। वह यशस्विनी बाला सामनेसे देखने ही योग्य थी। वह अर्जुनसे प्रेमपूर्वक बोली— ॥ ४ ॥
सुसंहतोरुं कनकोज्ज्वलत्वचं पार्थः कुमारीं स तदाभ्यभाषत । किमागमः काञ्चनमाल्यधारिणि मृगाक्षि किं त्वं त्वरितेव भामिनि ॥ किं ते मुखं सुन्दरि न प्रसन्न- माचक्ष्व तत्त्वं मम शीघ्रमङ्गने ॥ ५ ॥ सुवर्णके समान सुन्दर एवं गौर त्वचा तथा सटी जाँघोंवाली कुमारी उत्तराको देखकर अर्जुनने पूछा—‘सुवर्णकी माला धारण करनेवाली मृगलोचने! भामिनि! तुम क्यों उतावली-सी चली आ रही हो? सुन्दरि! आज तुम्हारा मुख प्रसन्न क्यों नहीं है? अंगने! मुझे शीघ्र सब बातें ठीक-ठीक बताओ’ ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
स तां दृष्ट्वा विशालाक्षीं राजपुत्रीं सखीं तथा । प्रहसन्नब्रवीद् राजन् किमागमनमित्युत ॥ ६ ॥ तमब्रवीद् राजपुत्री समुपेत्य नरर्षभम् । प्रणयं भावयन्ती सा सखीमध्य इदं वचः ॥ ७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! विशाल नेत्रोंवाली अपनी सखी राजकुमारी उत्तराकी ओर देखकर अर्जुनने हँसते हुए जब उससे अपने पास आनेका कारण पूछा, तब वह राजपुत्री नरश्रेष्ठ अर्जुनके समीप जा अपना प्रेम प्रकट करती हुई सखियोंके बीचमें इस प्रकार बोली— ॥ ६-७ ॥