महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2368, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तत्रिंशोऽध्यायः
बृहन्नलाको सारथि बनाकर राजकुमार उत्तरका रणभूमिकी ओर प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
सा प्राद्रवत् काञ्चनमाल्यधारिणी ज्येष्ठेन भ्रात्रा प्रहिता यशस्विनी । सुदक्षिणा वेदिविलग्नमध्या सा पद्मपत्राभनिभा शिखण्डिनी ॥ १ ॥ तन्वी शुभाङ्गी मणिचित्रमेखला मत्स्यस्य राज्ञो दुहिता श्रिया वृता । तन्नर्तनागारमरालपक्ष्म शतह्रदा मेघमिवान्वपद्यत ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कुमारी उत्तरा सोनेकी माला और मोरपंखका शृंगार धारण किये हुए थी। उसकी अंगकान्ति कमलदलकी-सी आभावाली लक्ष्मीको भी लज्जित कर रही थी। उसकी कमर यज्ञकी वेदीके समान सूक्ष्म थी। शरीरसे भी वह पतली ही थी। उसके सभी अंग शुभ लक्षणोंसे युक्त थे। उसने कटिप्रदेशमें मणियोंकी बनी हुई विचित्र करधनी पहन रखी थी। मत्स्यराजकी वह यशस्विनी कन्या अनुपम शोभासे प्रकाशित हो रही थी। बड़ोंकी आज्ञा माननेवाली कुमारी उत्तरा बड़े भाईके भेजनेसे बड़ी उतावलीके साथ नृत्यशालामें गयी; मानो चपला मेघ-मालामें विलीन हो गयी हो। उसके नेत्रोंकी टेढ़ी-टेढ़ी बरौनियाँ बड़ी भली मालूम होती थीं ॥ १-२ ॥
सा हस्तिहस्तोपमसंहितोरूः स्वनिन्दिता चारुदती सुमध्यमा । आसाद्य तं वै वरमाल्यधारिणी पार्थं शुभा नागवधूरिव द्विपम् ॥ ३ ॥
उसकी परस्पर सटी हुई जाँघें हाथीकी सूँड़के समान सुशोभित होती थीं, दाँत चमकीले और मनोहर थे। शरीरका मध्यभाग बड़ा सुहावना था। वह अनिन्द्य-सुन्दरी सुन्दर हार धारण किये उन कुन्तीनन्दन अर्जुनके पास पहुँचकर गजराजके समीप गयी हुई हथिनीके समान शोभा पा रही थी ॥ ३ ॥
सा रत्नभूता मनसः प्रियार्चिता सुता विराटस्य यथेन्द्रलक्ष्मीः ।