भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2370

गावो राष्ट्रस्य कुरुभिः काल्यन्ते नो बृहन्नले । ता विजेतुं मम भ्राता प्रयास्यति धनुर्धरः ॥ ८ ॥ ‘बृहन्नले! हमारे राष्ट्रकी गौओंको कौरव हाँककर लिये जाते हैं; अतः उन्हें जीतनेके लिये मेरे भैया धनुष धारण करके जानेवाले हैं ॥ ८ ॥ नाचिरं निहतस्तस्य संग्रामे रथसारथिः । तेन नास्ति समः सूतो योऽस्य सारथ्यमाचरेत् ॥ ९ ॥ ‘थोड़े ही दिन हुए, उनके रथका सारथि एक युद्धमें मारा गया। इस कारण कोई ऐसा योग्य सूत नहीं है, जो उनके सारथिका काम सँभाल सके ॥ ९ ॥ तस्मै प्रयतमानाय सारथ्यर्थं बृहन्नले । आचचक्षे हयज्ञाने सैरन्ध्री कौशलं तव ॥ १० ॥ ‘बृहन्नले! वे सारथि ढूँढ़नेका प्रयत्न कर रहे थे, इतनेमें ही सैरन्ध्रीने पहुँचकर यह बताया कि तुम अश्वविद्यामें कुशल हो ॥ १० ॥ अर्जुनस्य किलासीस्त्वं सारथिर्दयितः पुरा । त्वयाजयत् सहायेन पृथिवीं पाण्डवर्षभः ॥ ११ ॥ ‘पहले तुम अर्जुनका प्रिय सारथि रह चुकी हो। तुम्हारी सहायतासे उन पाण्डवशिरोमणिने समूची पृथ्वीपर विजय पायी है ॥ ११ ॥