महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2409, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतं मन्ये मेघपुष्पस्य जवेन सदृशं हयम् ॥ २१ ॥ और भार ढोनेवालोंमें श्रेष्ठ जो यह सुन्दर अश्व बाँयीं धुरीका भार वहन करता है, उसे वेगमें मेघपुष्प नामक अश्वके समान मानता हूँ ॥ २१ ॥ योऽयं काञ्चनसंनाहः पार्ष्णिं वहति शोभनः । समं शैब्यस्य तं मन्ये जवेन बलवत्तरम् ॥ २२ ॥ यह जो सोनेके बख्तरसे सजा हुआ सुन्दर अश्व बाँयीं ओर पिछला जुआ ढो रहा है, इसे वेगमें मैं शैब्य नामक अश्वके समान अत्यन्त बलवान् मानता हूँ ॥ २२ ॥ योऽयं वहति मे पार्ष्णिं दक्षिणामभितः स्थितः । बलाहकादपि मतः स जवे वीर्यवत्तरः ॥ २३ ॥ और यह जो दाहिने भागका पिछला जुआ धारण करके खड़ा है, वह वेगमें बलाहक नामवाले अश्वसे भी अधिक समझा गया है ॥ २३ ॥ त्वामेवायं रथो वोढुं संग्रामेऽर्हति धन्विनम् । त्वं चेमं रथमास्थाय योद्धुमर्हो मतो मम ॥ २४ ॥ यह रथ आप-जैसे धनुर्धर वीरको ही वहन करने योग्य है और मेरी रायमें आप इसी रथपर बैठकर युद्ध करने योग्य हैं ॥ २४ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो विमुच्य बाहुभ्यां वलयानि स वीर्यवान् । चित्र काञ्चनसंनाहे प्रत्यमुञ्चत् तदा तले ॥ २५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर पराक्रमी अर्जुनने हाथोंसे कड़े और चूड़ियाँ उतार दीं और हथेलियोंमें सोनेके बने हुए विचित्र कवच धारण कर लिये ॥ २५ ॥ कृष्णान् भङ्गिमतः केशान् श्वेतेनोद्ग्रथ्य वाससा । अथासौ प्राङ्मुखो भूत्वा शुचिः प्रयतमानसः । अभिदध्यौ महाबाहुः सर्वास्त्राणि रथोत्तमे ॥ २६ ॥ फिर उन्होंने काले-काले घुँघराले केशोंको श्वेत वस्त्रसे बाँध दिया और पूर्वकी ओर मुँह करके पवित्र एवं एकाग्रचित्त हो महाबाहु धनंजयने उस श्रेष्ठ रथपर सम्पूर्ण अस्त्रोंका ध्यान किया ॥ २६ ॥ ऊचुश्च पार्थं सर्वाणि प्राञ्जलीनि नृपात्मजम् । इमे स्म परमोदाराः किंकराः पाण्डुनन्दन ॥ २७ ॥ तब वे सब अस्त्र प्रकट होकर राजकुमार अर्जुनसे हाथ जोड़कर बोले—‘पाण्डुनन्दन! ये हमलोग तुम्हारे परम उदार किंकर हैं’ ॥ २७ ॥ प्रणिपत्य ततः पार्थः समालभ्य च पाणिना । सर्वाणि मानशानीह भवतेत्यभ्यभाषत ॥ २८ ॥