महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 322, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें‘वीर! मैंने इन पाशोंद्वारा तारकामय संग्राममें सहस्रों महाकाय दैत्योंको बाँध लिया था ।। ३० ।। तस्मादिमान् महासत्त्व मत्प्रसादसमुत्थितान् । गृहाण न हि ते मुच्येद्यन्तकोऽप्यातातयिनः ।। ३१ ।। ‘अतः महाबली पार्थ! मेरे कृपाप्रसादसे प्रकट हुए इन पाशोंको तुम ग्रहण करो। इनके द्वारा आक्रमण करनेपर मृत्यु भी तुम्हारे हाथसे नहीं छूट सकती ।। ३१ ।। अनेन त्वं यदास्त्रेण संग्रामे विचरिष्यसि । तदा निःक्षत्रिया भूमिर्भविष्यति न संशयः ।। ३२ ।। ‘इस अस्त्रके द्वारा जब तुम संग्रामभूमिमें विचरण करोगे, उस समय यह सारी वसुन्धरा क्षत्रियोंसे शून्य हो जायगी, इसमें संशय नहीं है’ ।। ३२ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततः कैलासनिलयो धनाध्यक्षोऽभ्यभाषत । दत्तेष्वस्त्रेषु दिव्येषु वरुणेन यमेन च ।। ३३ ।। प्रीतोऽहमपि ते प्राज्ञ पाण्डवेय महाबल । त्वया सह समागम्य अजितेन तथैव च ।। ३४ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वरुण और यमके दिव्यास्त्र प्रदान कर चुकनेपर कैलासनिवासी धनाध्यक्ष कुबेरने कहा—‘महाबली बुद्धिमान् पाण्डुनन्दन! मैं भी तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम अपराजित वीर हो। तुमसे मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है’ ।। ३३-३४ ।। सव्यसाचिन् महाबाहो पूर्वदेव सनातन । सहास्माभिर्भवाञ्छ्रान्तः पुराकल्पेषु नित्यशः ।। ३५ ।। दर्शनात् ते त्विदं दिव्यं प्रदिशामि नरर्षभ । अमनुष्यान् महाबाहो दुर्जयानपि जेष्यसि ।। ३६ ।। ‘सव्यसाचिन्! महाबाहो! पुरातन देव! सनातनपुरुष! पूर्वकल्पोंमें मेरे साथ तुमने सदा तपके द्वारा परिश्रम उठाया है। नरश्रेष्ठ! आज तुम्हें देखकर यह दिव्यास्त्र प्रदान करता हूँ। महाबाहो! इसके द्वारा तुम दुर्जय मानवेतर प्राणियोंको भी जीत लोगे ।। ३५-३६ ।। मत्तश्चैव भवानाशु गृह्णात्वस्त्रमनुत्तमम् । अनेन त्वमनीकानि धार्तराष्ट्रस्य धक्ष्यसि ।। ३७ ।। ‘तुम मुझसे शीघ्र ही इस अत्युत्तम अस्त्रको ग्रहण कर लो। तुम इसके द्वारा दुर्योधनकी सारी सेनाओंको जलाकर भस्म कर डालोगे ।। ३७ ।। तदिदं प्रतिगृह्णीष्व अन्तर्धानं प्रियं मम । ओजस्तेजोद्युतिकरं प्रस्वापनमरातिनुत् ।। ३८ ।।