भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 384

मुझसे बढ़कर अत्यन्त दुःखी मनुष्य दूसरा कोई नहीं है' ।। ५० ।।

बृहदश्व उवाच

यद् ब्रवीषि महाराज न मत्तो विद्यते क्वचित् । अल्पभाग्यतरः कश्चित् पुमानस्तीति पाण्डव ।। ५१ ।। अत्र ते वर्णयिष्यामि यदि शुश्रूषसेऽनघ । यस्त्वत्तो दुःखिततरो राजाऽऽसीत् पृथिवीपते ।। ५२ ।। **बृहदश्व बोले—**महाराज पाण्डुनन्दन! तुम जो यह कह रहे हो कि मुझसे बढ़कर अत्यन्त भाग्यहीन कोई पुरुष कहीं भी नहीं है, उसके विषयमें मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा। अनघ! पृथिवीपते! यदि तुम सुनना चाहो तो मैं उस व्यक्तिका परिचय दूँगा, जो इस पृथिवीपर तुमसे भी अधिक दुःखी राजा था ।। ५१-५२ ।।

वैशम्पायन उवाच

अथैनमब्रवीद् राजा ब्रवीतु भगवानिति । इमामवस्थां सम्प्राप्तं श्रोतुमिच्छामि पार्थिवम् ।। ५३ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिरने मुनिसे कहा—'भगवन्! अवश्य कहिये। जो मेरी-जैसी संकटपूर्ण स्थितिमें पहुँचा हुआ हो, उस राजाका चरित्र मैं सुनना चाहता हूँ' ।। ५३ ।।

बृहदश्व उवाच

शृणु राजन्नवहितः सह भ्रातृभिरच्युत । यस्त्वत्तो दुःखिततरो राजाऽऽसीत् पृथिवीपते ।। ५४ ।। **बृहदश्वने कहा—**राजन्! अपने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले भूपाल! तुम भाइयोंसहित सावधान होकर सुनो। इस पृथिवीपर जो तुमसे भी अधिक दुःखी राजा था, उसका परिचय देता हूँ ।। ५४ ।।

निषधेषु महीपालो वीरसेन इति श्रुतः । तस्य पुत्रोऽभवन्नाम्ना नलो धर्मार्थकोविदः ।। ५५ ।। निषधदेशमें वीरसेन नामसे प्रसिद्ध एक भूपाल हो गये हैं। उन्हींके पुत्रका नाम नल था। जो धर्म और अर्थके तत्त्वज्ञ थे ।। ५५ ।।

स निकृत्या जितो राजा पुष्करेणेति नः श्रुतम् । वनवासं सुदुःखार्तो भार्यया न्यवसत् सह ।। ५६ ।। हमने सुना है कि राजा नलको उनके भाई पुष्करने छलसे ही जूएके द्वारा जीत लिया था और वे अत्यन्त दुःखसे आतुर हो अपनी पत्नीके साथ वनवासका दुःख भोगने लगे थे ।। ५६ ।।

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