महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
नलका दमयन्तीसे वार्तालाप करना और लौटकर देवताओंको उसका संदेश सुनाना
बृहदश्व उवाच
सा नमस्कृत्य देवेभ्यः प्रहस्य नलमब्रवीत् ।
प्रणयस्व यथाश्रद्धं राजन् किं करवाणि ते ॥ १ ॥
**बृहदश्व मुनि कहते हैं—**राजन्! दमयन्तीने अपनी श्रद्धाके अनुसार देवताओंको नमस्कार करके नलसे हँसकर कहा—‘महाराज! आप ही मेरा पाणिग्रहण कीजिये और बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ॥ १ ॥
अहं चैव हि यच्चान्यन्ममास्ति वसु किंचन ।
तत् सर्वं तव विश्रब्धं कुरु प्रणयमीश्वर ॥ २ ॥
‘नरेश्वर! मैं तथा मेरा जो कुछ दूसरा धन है, वह सब आपका है। आप पूर्ण विश्वस्त होकर मेरे साथ विवाह कीजिये ॥ २ ॥
हंसानां वचनं यत् तु तन्मां दहति पार्थिव ।
त्वत्कृते हि मया वीर राजानः संनिपातिताः ॥ ३ ॥
‘भूपाल! हंसोंकी जो बात मैंने सुनी’ वह (मेरे हृदयमें कामाग्नि प्रज्वलित करके सदा) मुझे दग्ध करती रहती है। वीर! आपहीको पानेके लिये मैंने यहाँ समस्त राजाओंका सम्मेलन कराया है ॥ ३ ॥
यदि त्वं भजमानां मां प्रत्याख्यास्यसि मानद ।
विषमग्निं जलं रज्जुमास्थास्ये तव कारणात् ॥ ४ ॥
‘मानद! आपके चरणोंमें भक्ति रखनेवाली मुझ दासीको यदि आप स्वीकार नहीं करेंगे तो मैं आपके ही कारण विष, अग्नि, जल अथवा फाँसीको निमित्त बनाकर अपना प्राण त्याग दूँगी' ॥ ४ ॥
एवमुक्तस्तु वैदर्भ्या नलस्तां प्रत्युवाच ह ।
तिष्ठत्सु लोकपालेषु कथं मानुषमिच्छसि ॥ ५ ॥
दमयन्तीके ऐसा कहनेपर राजा नलने उससे पूछा—‘(तुम्हें पानेके लिये उत्सुक) लोकपालोंके होते हुए तुम एक साधारण मनुष्यको कैसे पति बनाना चाहती हो? ॥ ५ ॥
येषामहं लोककृतामीश्वराणां महात्मनाम् ।
न पादरजसा तुल्यो मनस्ते तेषु वर्तताम् ॥ ६ ॥