महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 514, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंख्यास्यामि फलान्यस्य पश्यतस्ते जनाधिप । मुहूर्तमपि वार्ष्णेयो रश्मीन् यच्छतु वाजिनाम् ॥ १५ ॥ 'जनेश्वर! यदि वार्ष्णेय दो घड़ीतक भी इन घोड़ोंकी लगाम सँभाले तो मैं आपके देखते-देखते इसके फलोंको गिन लूँगा' ॥ १५ ॥ तमब्रवीन्नृपः सूतं नायं कालो विलम्बितुम् । बाहुकस्त्वब्रवीदेनं परं यत्नं समास्थितः ॥ १६ ॥ प्रतीक्षस्व मुहूर्तं त्वमथवा त्वरते भवान् । एष याति शिवः पन्था याहि वार्ष्णेयसारथिः ॥ १७ ॥ तब राजाने सारथिसे कहा—'यह विलम्ब करनेका समय नहीं है।' बाहुक बोला—'मैं प्रयत्नपूर्वक शीघ्र ही गणना समाप्त कर दूँगा। आप दो ही घड़ीतक प्रतीक्षा कीजिये। अथवा यदि आपको बड़ी जल्दी हो तो यह विदर्भदेशका मंगलमय मार्ग है, वार्ष्णेयको सारथि बनाकर चले जाइये' ॥ १६-१७ ॥ अब्रवीदृतुपर्णस्तु सान्त्वयन् कुरुनन्दन । त्वमेव यन्ता नान्योऽस्ति पृथिव्यामपि बाहुक ॥ १८ ॥ कुरुनन्दन! तब ऋतुपर्णने उसे सान्त्वना देते हुए कहा—'बाहुक! तुम्हीं इन घोड़ोंको हाँक सकते हो। इस कलामें पृथ्वीपर तुम्हारे जैसा दूसरा कोई नहीं है ॥ १८ ॥ त्वत्कृते यातुमिच्छामि विदर्भान् हयकोविद । शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि न विघ्नं कर्तुमर्हसि ॥ १९ ॥ 'घोड़ोंके रहस्यको जाननेवाले बाहुक! तुम्हारे ही प्रयत्नसे मैं विदर्भदेशकी राजधानीमें पहुँचना चाहता हूँ। देखो, तुम्हारी शरणमें आया हूँ। इस कार्यमें विघ्न न डालो ॥ १९ ॥ कामं च ते करिष्यामि यन्मां वक्ष्यसि बाहुक । विदर्भान् यदि यात्वाद्य सूर्यं दर्शयितासि मे ॥ २० ॥ 'बाहुक! यदि आज विदर्भदेशमें पहुँचकर तुम मुझे सूर्यका दर्शन करा सको तो तुम जो कहोगे, तुम्हारी वही इच्छा पूर्ण करूँगा' ॥ २० ॥ अथाब्रवीद् बाहुकस्तं संख्याय च बिभीतकम् । ततो विदर्भान् यास्यामि कुरुष्वैवं वचो मम ॥ २१ ॥ यह सुनकर बाहुकने कहा—'मैं बहेड़ेके फलोंको गिनकर विदर्भदेशको चलूँगा। आप मेरी यह बात मान लीजिये' ॥ २१ ॥ अकाम इव तं राजा गणयस्वेत्युवाच ह । एकदेशं च शाखायाः समादिष्टं मयानघ ॥ २२ ॥ गणयस्वाश्वतत्त्वज्ञ ततस्त्वं प्रीतिमावह । सोऽवतीर्य रथात् तूर्णं शातयामास तं द्रुमम् ॥ २३ ॥