भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य

पुलस्त्य उवाच

अथ संध्यां समासाद्य संवेद्यं तीर्थमुत्तमम् ।
उपस्पृश्य नरो विद्यां लभते नात्र संशयः ॥ १ ॥
पुलस्त्यजी कहते हैं—भीष्म! तदनन्तर प्रातः-संध्याके समय उत्तम संवेद्यतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य विद्यालाभ करता है; इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥

रामस्य च प्रभावेण तीर्थं राजन् कृतं पुरा ।
तल्लौहित्यं समासाद्य विन्द्याद् बहु सुवर्णकम् ॥ २ ॥
राजन्! पूर्वकालमें श्रीरामके प्रभावसे जो तीर्थ प्रकट हुआ उसका नाम लौहित्यतीर्थ है। उसमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्यको बहुत-सी सुवर्णराशि प्राप्त होती है ॥ २ ॥

करतोयां समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ।
अश्वमेधमवाप्नोति प्रजापतिकृतो विधिः ॥ ३ ॥
करतोयामें जाकर स्नान करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता है। यह ब्रह्माजीद्वारा की हुई व्यवस्था है ॥ ३ ॥

गङ्गायास्तत्र राजेन्द्र सागरस्य च संगमे ।
अश्वमेधं दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! वहाँ गंगासागरसंगममें स्नान करनेसे दस अश्वमेधयज्ञोंके फलकी प्राप्ति होती है, ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ॥ ४ ॥

गङ्गायास्त्वपरं पारं प्राप्य यः स्नाति मानवः ।
त्रिरात्रमुषितो राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५ ॥
राजन्! जो मानव गंगासागरसंगममें गंगाके दूसरे पार पहुँचकर स्नान करता है और तीन रात वहाँ निवास करता है, वह सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ५ ॥

ततो वैतरणीं गच्छेत् सर्वपापप्रमोचनीम् ।
विरजं तीर्थमासाद्य विराजति यथा शशी ॥ ६ ॥
तदनन्तर सब पापोंसे छुड़ानेवाली वैतरणीकी यात्रा करे। वहाँ विरजतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है ॥ ६ ॥

प्रतरेच्च कुलं पुण्यं सर्वपापं व्यपोहति ।
गोसहस्रफलं लब्ध्वा पुनाति स्वकुलं नरः ॥ ७ ॥