भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 2580 में से

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चतुर्थोऽध्यायः

विदुरजीका धृतराष्ट्रको हितकी सलाह देना और धृतराष्ट्रका रुष्ट होकर महलमें चला जाना

वैशम्पायन उवाच

वनं प्रविष्टेष्वथ पाण्डवेषु प्रज्ञाचक्षुस्तप्यमानोऽम्बिकेयः । धर्मात्मानं विदुरमगाधबुद्धिं सुखासीनो वाक्यमुवाच राजा ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जब पाण्डव वनमें चले गये, तब प्रज्ञाचक्षु अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र मन-ही-मन संतप्त हो उठे। उन्होंने अगाधबुद्धि धर्मात्मा विदुरको बुलाकर स्वयं सुखद आसनपर बैठे हुए उनसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव शुद्धा धर्मं च त्वं परमं वेत्थ सूक्ष्मम् । समश्च त्वं सम्मतः कौरवाणां पथ्यं चैषां मम चैव ब्रवीहि ॥ २ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**विदुर! तुम्हारी बुद्धि शुक्राचार्यके समान शुद्ध है। तुम सूक्ष्म-से-सूक्ष्म श्रेष्ठ धर्मको जानते हो। तुम्हारी सबके प्रति समान दृष्टि है और कौरव तथा पाण्डव सभी तुम्हारा सम्मान करते हैं। अतः मेरे तथा इन पाण्डवोंके लिये जो हितकर कार्य हो, वह मुझे बताओ ॥ २ ॥

एवंगते विदुर यदद्य कार्यं पौराश्च मे कथमस्मान् भजेरन् । ते चाप्यस्मान् नोद्धरेयुः समूलां- स्तत्त्वं ब्रूयाः साधुकार्याणि वेत्सि ॥ ३ ॥
विदुर! ऐसी दशामें अब हमारा जो कर्तव्य हो वह बताओ। ये पुरवासी कैसे हमलोगोंसे प्रेम करेंगे। तुम ऐसा कोई उपाय बताओ जिससे वे पाण्डव हमलोगोंको जड़-मूलसहित उखाड़ न फेंकें। तुम अच्छे कार्योंको जानते हो। अतः हमें ठीक-ठीक कर्तव्यका निर्देश करो ॥ ३ ॥

विदुर उवाच

त्रिवर्गोऽयं धर्ममूलो नरेन्द्र

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