भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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यज्ञियार्थाः प्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणतः ॥ ८५ ॥

युधिष्ठिरको भोजन कराकर द्रौपदी शेष अन्न स्वयं खाती थी। द्रौपदीके भोजन कर लेनेपर उस पात्रका अन्न समाप्त हो जाता था। इस प्रकार सूर्यसे मनोवांछित वरोंको पाकर उन्हींके समान तेजस्वी प्रभावशाली राजा युधिष्ठिर ब्राह्मणोंको नियमपूर्वक अन्नदान करने लगे। पुरोहितोंको आगे करके उत्तम तिथि, नक्षत्र एवं पर्वोंपर विधि और मन्त्रके प्रमाणके अनुसार उनके यज्ञसम्बन्धी कार्य होने लगे ॥ ८४-८५ ॥

ततः कृतस्वस्त्ययना धौम्येन सह पाण्डवाः । द्विजसङ्घैः परिवृताः प्रययुः काम्यकं वनम् ॥ ८६ ॥

तदनन्तर स्वस्तिवाचन कराकर ब्राह्मणसमुदायसे घिरे हुए पाण्डव धौम्यजीके साथ काम्यकवनको चले गये ॥ ८६ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि काम्यकवनप्रवेशे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें काम्यकवनप्रवेशविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥


१. बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु, इन्द्र और प्रजापति—ये तैंतीस देवता हैं। २. सभापर्वके ११ वें अध्याय श्लोक ४६, ४७ में सात पितरोंके नाम इस प्रकार बताये हैं—वैराज, अग्निष्वात्त, सोमपा, गार्हपत्य, एकशृंग, चतुर्वेद और कला। * जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर—ये सात प्रधान द्वीप माने गये हैं। इनके सिवा, कई उपद्वीप हैं। उनको लेकर यहाँ १३ द्वीप बताये गये हैं।