महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यस्तु तदनन्तरम् । धौम्याद् युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान् कामानवाप्तवान् ॥ ७८ ॥ यह स्तुति सबसे पहले ब्रह्माजीने महात्मा इन्द्रको दी, इन्द्रसे नारदजीने और नारदजीसे धौम्यने इसे प्राप्त किया। धौम्यसे इसका उपदेश पाकर राजा युधिष्ठिरने अपनी सब कामनाएँ प्राप्त कर लीं ॥ ७८ ॥ संग्रामे च जयेन्नित्यं विपुलं चाप्नुयाद् वसु । मुच्यते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं स गच्छति ॥ ७९ ॥ जो इसका अनुष्ठान करता है वह सदा संग्राममें विजयी होता है, बहुत धन पाता है, सब पापोंसे मुक्त होता और अन्तमें सूर्यलोकको जाता है ॥ ७९ ॥
वैशम्पायन उवाच
लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो जलादुत्तीर्य धर्मवित् । जग्राह पादौ धौम्यस्य भ्रातॄंश्च परिषस्वजे ॥ ८० ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पूर्वोक्त वर पाकर धर्मके ज्ञाता कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर गंगाजीके जलसे बाहर निकले। उन्होंने धौम्यजीके दोनों चरण पकड़े और भाइयोंको हृदयसे लगा लिया ॥ ८० ॥ द्रौपद्या सह संगम्य वन्द्यमानस्तया प्रभुः । महानसे तदानीं तु साधयामास पाण्डवः ॥ ८१ ॥ द्रौपदीने उन्हें प्रणाम किया और वे उससे प्रेमपूर्वक मिले। फिर उसी समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने चूल्हेपर बटलोई रखकर रसोई तैयार करायी ॥ ८१ ॥ संस्कृतं प्रसवं याति स्वल्पमन्नं चतुर्विधम् । अक्षय्यं वर्धते चान्नं तेन भोजयते द्विजान् ॥ ८२ ॥ उसमें तैयार की हुई चार प्रकारकी थोड़ी-सी भी रसोई उस पात्रके प्रभावसे बढ़ जाती और अक्षय हो जाती थी। उसीसे वे ब्राह्मणोंको भोजन कराने लगे ॥ ८२ ॥ भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोजयित्वानुजानपि । शेषं विघससंज्ञं तु पश्चाद् भुङ्क्ते युधिष्ठिरः ॥ ८३ ॥ ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर अपने छोटे भाइयोंको भी भोजन करानेके पश्चात् 'विघस' संज्ञक अवशिष्ट अन्नको युधिष्ठिर सबसे पीछे खाते थे ॥ ८३ ॥ युधिष्ठिरं भोजयित्वा शेषमश्नाति पार्षती । द्रौपद्यां भुज्यमानायां तदन्नं क्षयमेति च । एवं दिवाकरात् प्राप्य दिवाकरसमप्रभः ॥ ८४ ॥ कामान् मनोऽभिलषितान् ब्राह्मणेभ्योऽददात् प्रभुः । पुरोहितपुरोगाश्च तिथिनक्षत्रपर्वसु ।